नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजरायल की यात्रा पर जाने वाले हैं. यह यात्रा 4 जुलाई से 6 जुलाई के बीच होगी. प्रधानमंत्री की इस यात्रा के कई कूटनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. एशिया के साथ ही विश्व राजनीति पर भी इसका खासा असर होना माना जा रहा है. इस बीच इजरायल की मीडिया पीएम मोदी को कार्यक्रम को ऐतिहासिक बता रही है. यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला दौरा होगा.
मोदी के दौरे को डोनाल्ड ट्रंप से भी ज्यादा तरजीह
यही नहीं दावा किया जा रहा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौरे से भी ज्यादा तरजीह मोदी के टूर को दी जा रही है. इस दौरे को लेकर भव्य तैयारी की जा रही है. इजरायल के उच्चायोग द्वारा यहां जारी एक बयान में कहा गया, 'इजरायली राष्ट्रपति रूवेन रिवलिन से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुलाकात करेंगे. इजरायल के प्रधानमंत्री के साथ एक बैठक और रात्रिभोज शामिल है.'
25 सालों के कूटनीतिक संबंध को नई पहचान मिलेगी
प्रधानमंत्री के इजरायल दौरे को लेकर कहा जा रहा है कि दोनों देशों के बीच पिछले 25 सालों से जो कुटनीतिक संबंध स्थापित हैं उन्हें नई पहचान मिलेगी. इस बीच फिलिस्तीन न जाकर भारत साफ संदेश दे रहा है. कयास लगाए जा रहे हैं कि भारत ने लगभग साफ कर दिया है कि फिलीस्तीन से ज्यादा महत्व वह अब इजरायल को देगा.
6 हजार यहूदियों को अल्पसंख्यक दर्जा मिलने की उम्मीद
इस बीच भारत में रहने वाले करीब 6 हजार यहूदियों को भी अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने की उम्मीद है. गौरतलब है कि दिल्ली के साथ-साथ महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात और केरल के अलग-अलग शहरों में यहूदी समुदाय के लोग रहते हैं.
पाकिस्तान के लिए यह बड़ा झटका
रक्षा विशेषज्ञों ने भी इस दौरे को काफी अहम बताया है. उनका मानना है कि इस दौरे के बाद दोनों देशों के संबंध मजबूत होंगे और भारत कूटनीति के साथ-साथ सामरिक दृष्टि से भी अपनी स्थिति को मजबूत करेगा. साथ ही पाकिस्तान के लिए यह बड़ा झटका भी होगा.
एक नजर में भारत-इजरायल संबंध :
भारत ने इजरायल को 1950 में मान्यता दी थी लेकिन दोनों देशों के बीच 1992 में ही कूटनीतिक संबंध बन पाए थे. इसका कारण यह था कि भारत, इजरायल के विरोधी फिलिस्तीन के करीब था. इसके साथ ही चाहें वह चीन के साथ 1962 का युद्ध रहा हो या पाकिस्तान के साथ 65 और 71 का या फिर कारगिल युद्ध, इजरायल से काफी आयुध भारत ने लिया था. 1977 में भारत ने दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की कवायद तेज की थी. जिसे राजीव गांधी ने भी प्रधानमंत्री रहते हुए आगे बढ़ाया. 1992 में नरसिम्हा राव ने पूर्ण राजनीतिक रिश्ते शुरू किए. इसके बाद 2015 में पहली बार राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने इजरायल का दौरा किया. इस तरह से दोनों देशों की बीच रिश्ते लगातार अच्छे होते रहे हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा इसीलिए ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि यह दोनों देशों के बीच कूटनीति रिश्तों की नई इबारत लिखी जाएगी.इस यात्रा के मायनें :
- प्रधानमंत्री के इजरायल दौरे से भारत को आतंकवाद से लड़ने में मदद मिलेगी. क्योंकि, इजरायल की रक्षा सम्बन्धी टेक्नॉलॉजी काफी मजबूत है.
- इस दौरे से अमेरिका और पश्चिमी देशों को खुशी होगी और पाकिस्तान को परेशानी महसूस होगी.
- पाकिस्तान से इजरायल के सम्बन्ध सामान्य किस्म के हैं.
- प्रधानमंत्री के इजरायल दौरे से निश्चित रूप से भारत को कई क्षेत्रों में व्यापारिक लाभ मिल सकता है.
- दोस्ती बढ़ने से इजरायल को ही अधिक लाभ मिलेगा क्योंकि भारत एक विशाल और सक्षम देश है.
- इजरायल से हमारे बहुत पुराने सम्बन्ध हैं. रक्षा के सम्बन्ध में चीजों की एक लम्बी लिस्ट है जो हम इजरायल से लेते रहे हैं.
- इससे पहले कोई भारतीय प्रधानमंत्री इजरायल नहीं गया तो ये कोई बड़ी बात नहीं है. अंतर्राष्ट्रीय वक्त और हालात के अनुसार जो विदेशनीति बनती है उसी के अनुसार पीएम यात्राएं करते हैं.
- भारत के अंतर्राष्टीय रिश्ते अपने दम पर हैं. पश्चिमी देशों से सम्बन्ध रखने के लिए हम इजरायल जैसे किसी भी देश पे डिपेंड नहीं करते.
- इजरायल में हमारे युवाओं के लिए नौकरियों की कोई खास गुंजाइश नहीं है. वहाँ बहुत कम भारतीय रहते हैं.
- प्रधानमंत्री वहाँ विपक्ष के नेता से भी मिलेंगे क्योंकि इजरायल की सभी पार्टियाँ भारत के पक्ष में रहती हैं.
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मोदी को लेकर इजरायल किस कदर तैयार है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वहां से लोगों ने हिंदी में संदेश भेजे हैं. इसे लेकर काफी तैयारियां की जा रही हैं. साथ ही दुनिया के कई देशों की नजर इसपर है. आप भी देखिए इजरायल के लोगों ने कैसे हिंदी में किया है पीएम मोदी का स्वागत ....