उत्तर प्रदेश में लगातार हो रही मानसूनी बारिश से हालात बिगड़ गए. काशी में गंगा का जलस्तर बढ़ने से 84 घाट डूब गए. बिहार के बेगूसराय में गंगा उफान पर है. 50 हजार से ज्यादा लोग बाढ़ के पानी से घिरे हुए हैं. मध्य प्रदेश में पूर्वी हिस्से के बाद अब उत्तरी, पश्चिमी और मध्य हिस्सों में मानसून एक्टिव होगा. इससे एक दिन पहले गुरुग्राम भी पानी-पानी हो गया. घुटनों तक पानी और जाम में फंसी गाड़ियों की तस्वीर अब हर साल दोहराई जाती है. यह भारत के हर बड़े शहर की कहानी है, जो अब सिर्फ बारिश से नहीं, बल्कि अपने बुनियादी ढांचे से भी लड़ रहा है...

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सिर्फ 'ज्यादा पानी' नहीं, 'तेज पानी' की समस्या

पहली बात जो समझनी चाहिए वो ये कि बाढ़ का मतलब सिर्फ ज्यादा बारिश नहीं है. बारिश का तरीका बदल गया है. सालों पहले जो बारिश कई दिनों में होती थी, वो अब कुछ घंटों में हो रही है.

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ऊर्जा और जल संस्थान (CEEW) की स्टडी ने देश भर के 4,500 से ज्यादा तहसीलों के आंकड़े खंगाले. नतीजा चौंकाने वाला है. 2012 से 2022 के बीच 55% तहसीलों में दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश में भारी इजाफा हुआ है. इससे ज्यादा खतरनाक बात ये कि 31% तहसीलों में भारी बारिश वाले दिनों की संख्या पिछले 30 सालों के औसत से चार गुना से भी ज्यादा बढ़ गई है. यानी, जो बारिश पहले पूरे सीजन में होती थी, वो अब कुछ दिनों में ही हो जा रही है.

यही सबसे बड़ी चुनौती है. एक शहर अगर कम समय में बहुत सारा पानी झेलने के लिए नहीं बना है, तो मुसीबत आ जाती है. यहीं से शुरू होती है हमारे बुनियादी ढांचे की कमजोरी की कहानी.

गुरुग्राम: जितनी तेजी से बना शहर, उससे भी तेजी से डूबा नाली तंत्र

गुरुग्राम की कहानी एक मिसाल है. एक छोटा सा गांव, जो कुछ दशकों में देश का सबसे बड़ा कारोबारी केंद्र बन गया. यहां आज गगनचुंबी इमारतें, मॉल, चौड़ी सड़कें और लाखों लोगों की रिहायशी कॉलोनियां हैं. लेकिन यह विकास किस कीमत पर हुआ? कीमत चुकानी पड़ी उस जमीन की जो कभी पानी को सोख लेती थी.

एक स्टडी में पाया गया कि गुरुग्राम की झीलों, तालाबों और प्राकृतिक नालियों की संख्या में भारी कमी आई है. इसकी वजह से बारिश का पानी इकट्ठा करने की जगह नहीं रही. जो पानी पहले जमीन में समाता था, वो अब सड़कों, छतों और पार्किंग पर गिरकर सीधे नाली तंत्र में पहुंचता है. ये नाली तंत्र इतने पानी को नहीं झेल पाता.

गुरुग्राम की आठ सबसे ज्यादा पानी वाली जगहों पर 'हरित छतों' औऱ 'पारगम्य फुटपाथ' जैसे उपाय अपनाने से पानी का बहाव 72% तक कम हो सकता है. यानी, उपाय मौजूद हैं, लेकिन अपनाए नहीं जा रहे.

मुंबई: जब 50 मिमी बारिश भी बोझ बन जाए

अब मुंबई की बात करते हैं. उम्मीद से ज्यादा बारिश और पुराना इंफ्रास्ट्रक्चर.

मुंबई में नालियां पारंपरिक रूप से 25 मिमी प्रति घंटे की दर से होने वाली बारिश को झेलने के लिए बनाई गई थीं. मानसून में तो बारिश इससे कई गुना तेज होती है. बाद में BMC ने एक प्रोजेक्ट के तहत इस क्षमता को बढ़ाकर 50 मिमी प्रति घंटा कर दिया. लेकिन क्या यह काफी है?

नहीं. एक स्टडी के मुताबिक, 2002 में मुंबई का 37% हिस्सा बाढ़ वाला था, जो 2022 में बढ़कर 55% हो गया. इस दौरान शहर में कंक्रीट 16.4 वर्ग किमी प्रति साल की रफ्तार से बढ़ा. यानी, जितना शहर पक्का हो रहा है, उतनी ही तेजी से बारिश का पानी निकलने के रास्ते बंद हो रहे हैं और बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है. मुंबई में 2005 की भयानक बाढ़ ने इस कमजोरी को उजागर किया, जिसके बाद भी पूरी तरह सुधार नहीं हो पाया.

बेंगलुरु: जिसने अपनी ही नसें बंद कर लीं

बेंगलुरु की समस्या उसके झील तंत्र से जुड़ी है. बेंगलुरु की पहचान उसकी झीलें थीं, जो अब या तो गायब हैं या बुरी हालत में हैं. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) की रिसर्च चौंकाने वाली है. 1973 से 2023 के बीच:

  • पक्की सतह (कंक्रीट/सड़क) में 1,055% की बढ़ोतरी हुई
  • हरियाली में 88% की गिरावट हुई
  • जलीय क्षेत्र (तालाब/झील) में 79% की गिरावट हुई

यानी, जो नैचुरल स्पंज कभी बारिश का पानी सोख लेता था, वो अब नहीं रहा. इस वजह से जब भी तेज बारिश होती है, तो पानी को जाने के लिए जगह नहीं मिलती और सड़कों पर आ जाता है.

चेन्नई: जब दलदल को ही खत्म कर दिया

चेन्नई ने अपने प्राकृतिक बचाव कवच को ही खत्म कर दिया. पल्लीकरणई मार्श इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. ये चेन्नई का आखिरी बड़ा दलदली इलाका था, जो 250 वर्ग किमी के इलाके का पानी सोखता था और 65 तालाबों से जुड़ा था.

इसका जो ऐतिहासिक विस्तार था, वो लगातार घटता गया. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के मुताबिक, ये दलदल कभी 5,000 हेक्टेयर में फैला था, जो 2010-11 के आसपास घटकर महज 600 हेक्टेयर रह गया. इसकी वजह से बारिश का पानी संभालने की क्षमता खत्म हो गई और बाढ़ का खतरा बढ़ गया. 

आखिर क्या करना होगा?

ये सब कहानियां एक ही बात कहती हैं: हमारे शहर पुरानी सोच पर बने हैं, लेकिन मानसून नया हो गया है. 

एक्सपर्ट्स अब 'स्पंज सिटी' और 'वाटर-सेंसिटिव अर्बन डिजाइन' (WSUD) की बात करते हैं . यानी, शहर इस तरह बनाए जाएं कि:

  • पानी को रोका जा सके: झीलों, तालाबों को बचाया जाए और नालियों को दोबारा खोला जाए.
  • पानी को जमीन में समाया जाए: पारगम्य सड़कें, हरित क्षेत्र और ऐसी तकनीक जो पानी को बहने की बजाय सोखने में मदद करें.
  • तकनीक का इस्तेमाल हो: हर मोहल्ले में माइक्रो-वेदर स्टेशन, रियल-टाइम ड्रेनेज सेंसर और रडार से पहले से पता चल सके कि कब और कितनी बारिश होगी, ताकि इंतजाम पहले से किए जा सकें.

दिल्ली ने 50 सालों में पहली बार एक नया ड्रेनेज मास्टर प्लान बनाया है, जो 65-70 मिमी बारिश को झेलने के लिए डिजाइन किया गया है. ये एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन यह भी एक संकेत है कि हम अब अपने पुराने अनुमानों से काफी पीछे हैं.