बिहार में 42 फीसदी कम बारिश, आंध्र प्रदेश में 40 फीसदी की कमी और पंजाब में 34 फीसदी का गहरा संकट. राजस्थान के 17 जिलों में सूखे जैसे हालात, जबकि मध्य प्रदेश में 63 फीसदी तक की भारी कमी. दिल्ली में अब तक सिर्फ 32.3 मिलीमीटर बारिश हुई, यानी 39 फीसदी की कमी. महाराष्ट्र की बात करें तो हालात और भी बदतर यानी 85 फीसदी तक का रिकॉर्ड घाटा. यह किसी एक शहर या प्रदेश की कहानी नहीं है. ये पूरे देश का हाल है. 2026 का मानसून 17 सालों का सबसे कमजोर मानसून साबित हो सकता है. देशभर में बारिश की कमी 13 से 14 फीसदी तक पहुंच चुकी है. आखिर क्यों कमजोर पड़ा मानसून, किसको कितना नुकसान होगा और क्या कोई उम्मीद बची है...
क्यों कमजोर पड़ा इस साल मानसून?
इस साल मानसून के कमजोर रहने की सबसे बड़ी वजह अल नीनो है. ये प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के गर्म होने की एक स्थिति है. जब अल नीनो आता है, तो ये दुनिया भर के मौसम पैटर्न को बिगाड़ देता है. भारत के लिए इसका मतलब है कमजोर मानसूनी हवाएं और कम बारिश.
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने पहले ही इस साल कमजोर मानसून की भविष्यवाणी कर दी थी. सामान्य का सिर्फ 90 फीसदी बारिश होने का अनुमान लगाया था. जून महीना तो 146 सालों का सबसे सूखा जून रहा. जून के अंत तक देशभर में 45 फीसदी की भारी कमी दर्ज की गई थी.
हालांकि जुलाई में कुछ राहत मिली और कमी घटकर 11-13 फीसदी पर आ गई. लेकिन अगस्त में फिर से बारिश थम गई और कमी 14 फीसदी तक पहुंच गई.
इसके अलावा, हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) भी इस बार मानसून को कोई राहत नहीं दे रहा. यानी, सारी मौसमी परिस्थितियां एक साथ मानसून के खिलाफ जुट गई हैं.
कुछ राज्यों को राहत भी मिली है. ओडिशा में 27 फीसदी ज्यादा बारिश हुई है और पश्चिम बंगाल में 3 फीसदी की मामूली बढ़त है. बाकी देश भीषण संकट से जूझ रहा है.
कमजोर मानसून का सबसे ज्यादा असर किस पर होगा?
भारत की करीब आधी खेती सीधे मानसून पर निर्भर है. जब बारिश कम होती है, तो सबसे पहले किसानों की मुश्किलें बढ़ती हैं. ऐसे में सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ेगा.
धान, दलहन, तिलहन, कपास और मक्का जैसी खरीफ फसलें मानसून पर निर्भर हैं. इस साल बारिश कम होने की वजह से बुवाई में भारी गिरावट आई है:
- धान (चावल) और गेहूं जैसी मुख्य फसलों वाले बिहार, आंध्र प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है.
- खरीफ फसल का रकबा पिछले साल की तुलना में करीब 2 फीसदी कम रहा.
- मक्के की बुवाई में 4 फीसदी से ज्यादा की गिरावट हुई है.
हालांकि, बुवाई में कुछ सुधार भी आया है. जुलाई की शुरुआत में 23 फीसदी की कमी थी, जो अगस्त के अंत तक घटकर 1.5 फीसदी रह गई. लेकिन फसलों का मिश्रण बदल गया है. दलहन, कपास और तिलहन का रकबा बढ़ा है, जबकि चावल, मोटे अनाज और गन्ने का रकबा घटा है.
फसलों के विकास पर खतरा
जो फसल बोई गई है, उसके विकास पर भी खतरा है. खरीफ फसलें अब ऐसे फेज में हैं, जहां अंतिम उपज तय होती है. अगर अगले कुछ हफ्तों में अच्छी बारिश नहीं हुई, तो पैदावार बुरी तरह प्रभावित हो सकती है.
जब फसलें खराब होंगी, तो किसानों की आय पर सीधा असर पड़ेगा. किसानों को सिंचाई के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ेगा, क्योंकि बारिश कम है तो उन्हें ट्यूबवेल और नहरों पर निर्भर रहना होगा. इससे खेती की लागत बढ़ेगी और मुनाफा घटेगा.
शहरों से लेकर गांवों तक पानी का संकट
मानसून कमजोर होने का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है. शहरों में पीने का पानी भी संकट में है:
1. जलाशयों में पानी घटा
केंद्रीय जल आयोग (CWC) के मुताबिक, देश के 176 प्रमुख जलाशय अब तक अपनी कुल क्षमता के सिर्फ 64 फीसदी ही भरे हैं. पिछले साल की तुलना में ये 78 फीसदी थे. यानी जलाशयों में पानी काफी कम है.
वहीं, पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों में जलाशय पिछले साल के स्तर तक भरे हैं, लेकिन उत्तर भारत में हालात बेहद गंभीर हैं. यहां जलाशय सिर्फ 57 फीसदी भरे हैं, जो पिछले साल के 68 फीसदी से काफी कम है.
2. दिल्ली में पानी की किल्लत
दिल्ली में पानी की आपूर्ति कुल मांग के सिर्फ 70 फीसदी तक रह गई है. दिल्ली की कुल मांग 1,250 मिलियन गैलन प्रतिदिन है, लेकिन आपूर्ति इससे कहीं कम है.
3. नदी बेसिनों पर दबाव
11 में से 15 प्रमुख नदी बेसिन पहले से ही जल-तनाव का सामना कर रहे हैं. कृष्णा, कावेरी, मही और तापी जैसे बेसिन तो पानी की कमी की सीमा से भी नीचे चले गए हैं.
भारत में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1950 में 5,000 घन मीटर थी, जो अब घटकर 1,500 घन मीटर रह गई है. 1,700 घन मीटर से कम को जल-तनाव माना जाता है. यानी भारत इस सीमा को पार कर चुका है और 1,000 घन मीटर की ओर बढ़ रहा है, जो जल-अकाल की स्थिति है.
नीति आयोग का अनुमान है कि 2050 तक भारत में पानी की मांग, आपूर्ति से दोगुनी हो जाएगी.
इससे आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?
इस संकट से आम आदमी पर 3 बड़े असर होंगे:
- खाने की कीमतें बढ़ेंगी: जब फसलें कम होंगी, तो बाजार में खाने-पीने की चीजों की किल्लत होगी और कीमतें बढ़ेंगी.
- खाद्य मुद्रास्फीति का खतरा: एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि बारिश की कमी का पूरा असर फसल कटने के बाद सामने आएगा. यानी, कीमतों में बढ़ोतरी अभी आने वाले महीनों में दिखेगी. UBI ने अपना उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) अनुमान 5 फीसदी पर रखा है, लेकिन चेतावनी दी है कि अगर अल नीनो और मजबूत हुआ, तो खाद्य मुद्रास्फीति 5.5 फीसदी या उससे ज्यादा हो सकती है.
- खाद्य उत्पादन में गिरावट: एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि खाद्यान्न उत्पादन में 3 से 8 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है. यानी, कम फसल, ज्यादा कीमत और आम आदमी के लिए मुश्किल.
अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा?
मानसून सिर्फ खेती नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. जब किसानों की आय घटेगी, तो ग्रामीण इलाकों में खर्च करने की ताकत कम हो जाएगी. इसका असर ग्रामीण बाजारों, छोटे कारोबारियों और पूरी आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ेगा.
अगर खाने-पीने की चीजें महंगी होंगी, तो महंगाई बढ़ेगी. महंगाई बढ़ने पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं. इससे कर्ज महंगा हो जाएगा और आम आदमी की EMI बढ़ जाएगी.
इसके अलावा सरकार को खाद्य सब्सिडी और राहत पैकेज पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है.
तो क्या कोई उम्मीद बची है?
मानसून का सीजन सितंबर तक चलता है, यानी अभी भी कुछ उम्मीद बची है.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि सितंबर का प्रदर्शन पूरे सीजन की तस्वीर तय करेगा. खासकर दलहन, तिलहन और देर से बोई गई खरीफ फसलों के लिए सितंबर की बारिश बेहद खास है. अगर सितंबर में अच्छी बारिश हो जाती है, तो कुछ हद तक नुकसान की भरपाई हो सकती है. लेकिन अगर सितंबर में भी बारिश कम रही, तो पूरा सीजन 'डिफिशिएंट' (सामान्य से 10 फीसदी से ज्यादा कम) घोषित हो सकता है.
IMD ने पहले अप्रैल में 92 फीसदी और जून में संशोधित कर 90 फीसदी बारिश का अनुमान लगाया था. उन्होंने कमजोर मानसून की 60 फीसदी संभावना जताई थी.
