CJP प्रोटेस्ट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सेल्फी स्टाइल वीडियो फेसबुक पर पोस्ट किया. यह उनका युवाओं से पहला सीधा संवाद था. लेकिन कुछ ही घंटों में यह वीडियो फेसबुक से गायब हो गया. पांच घंटे बाद वापस आया तो मेटा ने इसे 'तकनीकी खराबी' करार दिया. सरकार को यह स्पष्टीकरण 'नाजायज' लगा. संसदीय समिति ने इसे 'लोकतंत्र पर हमला' बताते हुए जुकरबर्ग को तीन दिन का अल्टीमेटम दे दिया. 5 अगस्त को मेटा के ग्लोबल अफेयर्स ऑफिसर जोएल कपलान ने आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव से मुलाकात की और माफी मांगी. यह सिर्फ एक माफी नहीं थी, बल्कि 22 साल के सफर का नतीजा था, जिसमें फेसबुक भारत की राजनीति का सबसे बड़ा अखाड़ा बन गया...
पार्ट-1: PM मोदी का वीडियो ब्लॉक और फेसबुक की माफी
असल में हुआ क्या था?
PM मोदी के वीडियो को मेटा ने 'ऑपरेशनल एरर' बताते हुए हटा दिया और करीब पांच घंटे बाद वापस रिस्टोर किया. लेकिन सरकार को यह जवाब कतई रास नहीं आया. आईटी सेक्रेटरी एस कृष्णन ने साफ कहा, 'मेटा जैसी टेक्नोलॉजी कंपनी को ऐसी गलतियों के लिए सिस्टम मजबूत करने चाहिए.'
बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे की अगुआई वाली संसदीय समिति ने 3 अगस्त को मेटा को चेतावनी देते हुए कहा कि या तो जुकरबर्ग माफी मांगें या फिर सेफ हार्बर प्रोटेक्शन खतरे में. समिति ने इसे '1.4 अरब भारतीयों के प्रतिनिधि पर हमला' करार दिया.
सेफ हार्बर का मतलब है वो आईटी एक्ट 2000 की धारा 79, जिसके तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को यूजर कंटेंट के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता. अगर यह सुरक्षा हट गई तो मेटा के अधिकारियों पर सीधे FIR दर्ज हो सकती है.
5 अगस्त को मेटा की ग्लोबल टीम ने आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव और आईटी सेक्रेटरी एस कृष्णन से मुलाकात की. करीब 45 मिनट की इस बैठक में मेटा ने तीन बड़ी बातें मानीं:
- PM मोदी का वीडियो गलती से हटाया गया
- इंस्टाग्राम पर चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज मटीरियल (CSAM) वाले विज्ञापन चले
- डीपफेक कंटेंट प्लेटफॉर्म पर मौजूद था
सरकार ने मेटा को कहा, 'आप 'इंटरमीडियरी' की परिभाषा में नहीं आते क्योंकि आपके एल्गोरिदम एक्टिवली क्यूरेट करते हैं कि किसे क्या कंटेंट दिखे.' यानी अगर आप सिर्फ होस्ट नहीं कर रहे, बल्कि कंटेंट को चुन-चुनकर दिखा रहे हो तो सेफ हार्बर का दावा नहीं कर सकते.
मेटा ने यह भी माना कि 'कुछ खास कंटेंट को बूस्ट करने के लिए काफी पैसे लिए गए' और 'पेड प्रमोशन के जरिए गैरकानूनी कंटेंट को बढ़ावा दिया गया.' फेसबुक से इतना बवाल इस वजह से भी हुआ क्योंकि बीते 22 साल में फेसबुक ने राजनीति को जंग के लिए मैदान दिया.
पार्ट-2: 22 साल में फेसबुक बना भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा 'अखाड़ा'
2004-2009: जब फेसबुक सिर्फ 'नया खिलौना' था
2004 में जब ऑर्कुट भारत में आया और 2006 में फेसबुक ने दस्तक दी, तब राजनीतिक दलों ने इन प्लेटफॉर्म्स को गंभीरता से नहीं लिया. उस समय इंटरनेट यूजर्स की संख्या मुश्किल से कुछ करोड़ थी. राजनीति पारंपरिक माध्यमों अखबार, टीवी, रैलियों और पोस्टरों तक सीमित थी. 2009 का चुनाव भी काफी हद तक पुराने तरीकों से लड़ा गया.
वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, फेसबुक की साउथ और सेंट्रल एशिया की पब्लिक पॉलिसी चीफ अंखी दास ने 2014 के चुनाव से एक दिन पहले अपने सहयोगियों को लिखा, 'हमने उनके (नरेंद्र मोदी) सोशल मीडिया अभियान में आग लगा दी और बाकी इतिहास है).'
यही वह दौर था जब फेसबुक-बीजेपी का रिश्ता गहराना शुरू हुआ. फेसबुक ने 2014 के चुनाव से पहले ही बीजेपी नेताओं से संपर्क बनाना शुरू कर दिया था. सोशल मीडिया अब सिर्फ 'चैटिंग' नहीं रहा. यह सत्ता का औजार बन गया.
2019: 'व्हाट्सएप इलेक्शन' से प्लेटफॉर्म बदला, पर खेल वही रहा
अगर 2014 फेसबुक और ट्विटर का दौर था, तो 2019 'व्हाट्सएप इलेक्शन' बन गया. व्हाट्सएप भारत में सबसे पॉपुलर मैसेजिंग ऐप है. इसके करीब 40 करोड़ से ज्यादा यूजर्स हैं. यह सिक्योर और एन्क्रिप्टेड नेटवर्क रहा है, जिसमें रिसर्चर्स और जर्नलिस्ट्स के लिए एंट्री मुश्किल है. इससे फेक न्यूज और गलत सूचनाएं तेजी से फैलीं. बीजेपी ने इसका इस्तेमाल रणनीति के तहत किया:
- बीजेपी ने 600 से ज्यादा व्हाट्सएप ग्रुप्स का नेटवर्क बनाया, जो ट्विटर पर कोऑर्डिनेटेड पोस्टिंग के जरिए ट्रेंड्स को मैनिपुलेट करते थे.
- कांग्रेस ने राजस्थान में 90,000 व्हाट्सएप ग्रुप्स चलाने का दावा किया, जबकि बीजेपी ने 15,000 ग्रुप्स को सीधे कंट्रोल करने की बात कही.
- बीजेपी ने 2019 के लिए करीब 9 लाख व्हाट्सएप ग्रुप्स तैयार किए.
2019 में भी बीजेपी ने 303 सीटें जीतकर अपना बहुमत और मजबूत किया.
2024: जब हर प्लेटफॉर्म बना युद्धक्षेत्र
2024 का चुनाव सबसे डिजिटल-प्रधान चुनाव था. करीब 64.2 करोड़ वोटरों ने वोट डाला और डिजिटल विज्ञापन वोटरों के व्यवहार को आकार देने में अहम बन गया. पिछले 5 साल में सिर्फ फेसबुक पर राजनीतिक प्रचार के लिए 360 करोड़ रुपये खर्च किए गए. 2024 के चुनाव में अकेले मेटा प्लेटफॉर्म्स (फेसबुक और इंस्टाग्राम) पर टॉप 20 एडवरटाइजर्स ने करीब 17 करोड़ रुपये सिर्फ 13 दिनों में खर्च किए. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म राजनीतिक दलों के प्रचार में मुख्य भूमिका निभाते रहे. इसके बाद से:
- इंस्टाग्राम और यूट्यूब युवाओं के बीच ज्यादा भरोसेमंद माने जाने लगे.
- इंफ्लुएंसर्स के दौर में हर पार्टी ने सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स को अपने पक्ष में करने के लिए पैसे लगाए.
- लगभग 2 करोड़ यूट्यूबर्स, ब्लॉगर्स और इन्फ्लूएंसर्स चिह्नित किए गए.
- AI-जनरेटेड डीपफेक की वजह से 2024 का चुनाव 'डीपफेक इलेक्शन' कहलाने लगा.
- चुनाव आयोग ने सोशल मीडिया पर सैकड़ों पोस्ट हटवाए.
सोशल मीडिया अब चुनावी रणनीति का केंद्र बन चुका था.
2026: जब सोशल मीडिया 'अखाड़े' की सीमाएं टूटीं
आज सोशल मीडिया राजनीति का ऐसा अखाड़ा बन गया है जहां छवि बनाने और बिगाड़ने से लेकर जासूसी तक सबकुछ हो रहा है. 2013 में एक अखबार ने लिखा था, 'गूगल, फेसबुक और ट्विटर के युग में सोशल मीडिया राजनीति का अखाड़ा बन चुका है.' 2026 में यह बात और भी सच हो गई है.
