तृणमूल कांग्रेस बुरे दौर से गुजर रही है. पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद पार्टी में फूट पड़ चुकी है और अब स्थिति और ज्यादा खराब हो गई है. टीएमसी के 28 सालों के इतिहास में पहली बार फूट पड़ने के बाद पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी पर पकड़ मजबूत करने के संकेत देते हुए कई बड़े बदलाव किए हैं. उन्होंने अपने वफादारों और अनुभवी नेताओं पर भरोसा जताया है.

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ममता के कालीघाट स्थित आवास पर पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद एक नई संगठनात्मक कमेटी की घोषणा की गई. इस नई कमेटी से यह साफ संकेत मिलता है कि पार्टी हाल के वर्षों में राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में उभरे नई पीढ़ी के नेताओं से कुछ दूरी बना रही है. अभिषेक बनर्जी को हालांकि राष्ट्रीय महासचिव के पद पर बरकरार रखा गया लेकिन पार्टी ने उनकी सहायता के लिए राज्यसभा सदस्यों डेरेक ओ'ब्रायन और डोला सेन को राष्ट्रीय संयुक्त सचिव नियुक्त किया.

तृणमूल नेतृत्व के पूरे पश्चिम बंगाल में पार्टी की सभी समितियों और अग्रिम मोर्चों को भंग किये जाने के दो दिन बाद ये बदलाव किये गये. यह कदम पार्टी के विधायकों के एक बड़े समूह के विद्रोह के बाद उठाया गया है, जिन्होंने हाल में चुनावी हार के बाद पार्टी नेतृत्व को चुनौती दी है.

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चंद्रिमा भट्टाचार्य को ममता ने सौंपी अहम जिम्मेदारी

एक अन्य महत्वपूर्ण निर्णय में, वरिष्ठ मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य को पार्टी प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया और उन्होंने सुब्रत बक्शी का स्थान लिया. पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक पार्टी सूत्रों ने बताया कि बख्शी ने उम्र और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण संगठनात्मक जिम्मेदारियों से मुक्त होने के लिए बार-बार अनुरोध किया था.

नई राज्य कमेटी में ममता बनर्जी का पुराने सदस्यों और वफादारों पर भरोसा साफ तौर पर दिखाई देता है. पुनर्गठित संगठनात्मक संरचना से फिरहाद हकीम की अनुपस्थिति भी उतनी ही चौंकाने वाली है. ममता बनर्जी के दो दशकों से अधिक समय तक भरोसेमंद सहयोगी और पार्टी के सबसे जाने-माने अल्पसंख्यक चेहरों में से एक हकीम ने कोलकाता के महापौर पद से इस्तीफा दे दिया है.

इनपुट - पीटीआई

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