दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में एलपीजी सिलेंडर की उपलब्धता और बढ़ती कीमतों को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है. चुनावी माहौल के बीच जहां सरकार महंगाई पर नियंत्रण के दावे करती रही है, वहीं चुनाव खत्म होने के बाद अचानक कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है.

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तृणमूल कांग्रेस के सांसद कीर्ति आजाद ने LPG संकट और ईंधन कीमतों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि यह समस्या नई नहीं है, बल्कि चुनावों के बाद बार-बार सामने आती रही है. कीर्ति आजाद ने कहा, “तीन चुनाव हुए हैं, एक 2019 में लोकसभा का, दूसरा 2024 में और उससे पहले कुछ राज्यों में भी चुनाव हुए थे. उन समयों पर भी इसी तरह की समस्याएं देखने को मिली थीं. जैसे ही चुनाव खत्म हुए, अचानक दरें लगभग 20–25 प्रतिशत बढ़ा दी गईं. मैं कहना चाहता हूं कि अगर वास्तव में कोई समस्या नहीं है, जैसा कि मोदी जी के संदर्भ में कहा जाता है, तो फिर एलपीजी सिलेंडरों के लिए इतनी लंबी कतारें क्यों लग रही हैं और लोग क्यों परेशान हो रहे हैं? लोग एक गैस सिलेंडर के लिए करीब 2,500–3,000 रुपये अतिरिक्त भुगतान कर रहे हैं.”

क्यों है चिंता

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यह बयान ऐसे समय आया है जब कई शहरों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारों की खबरें सामने आ रही हैं. हालांकि सरकार की ओर से अभी तक किसी बड़े संकट या आपूर्ति बाधा की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है. फिर भी, आम उपभोक्ताओं के बीच यह आशंका गहराती जा रही है कि चुनावी प्रक्रिया के बाद कीमतों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें, डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति और सब्सिडी नीति जैसे कई कारक घरेलू ईंधन कीमतों को प्रभावित करते हैं. लेकिन राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप के कारण यह मुद्दा चुनावी बहस का हिस्सा बनता जा रहा है. 

इकोनॉमिक एक्सपर्ट् की राय

इकोनॉमिक एक्सपर्ट् के मुताबिक, अगर एलपीजी और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी होती है, तो इसका सीधा असर घरेलू बजट, परिवहन लागत और महंगाई दर पर पड़ेगा. खासकर मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर इसका प्रभाव अधिक देखने को मिल सकता है. विपक्ष का कहना है कि चुनाव के दौरान कीमतों को नियंत्रित रखा जाता है और परिणाम आने के बाद बाजार में झटका दिया जाता है. वहीं सरकार और उसके समर्थक इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते हैं और आपूर्ति-श्रृंखला व वैश्विक बाजार स्थितियों को प्रमुख कारण बताते हैं.

प्रधानमंत्री ने दिया है भरोसा

सरकार की तरफ से साफ किया गया है कि पश्चिम एशिया के हालात के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है, क्योंकि भारत को बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, गैस और फर्टिलाइजर इसी मार्ग से मिलते हैं. इस स्थिति को देखते हुए सरकार घरेलू एलपीजी खपत को प्राथमिकता दे रही है और देश में उत्पादन बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं. ईरान युद्ध के बीच एलपीजी, पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति को लेकर उठी चिंताओं पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में 23 मार्च को आश्वस्त किया था कि सरकार देश में ऊर्जा संकट की स्थिति नहीं बनने देगी. उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर डाला है, लेकिन भारत ने हालात से निपटने के लिए पहले से तैयारी की है.

प्रधानमंत्री ने लोकसभा क्या कहा?

प्रधानमंत्री ने लोकसभा में कहा कि सरकार का सबसे बड़ा फोकस आम नागरिकों और घरेलू उपभोक्ताओं को राहत देना है. उनके अनुसार, देश में पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की आपूर्ति सुचारू बनाए रखने के लिए लगातार काम किया जा रहा है, ताकि आम परिवारों को मुश्किलों का सामना न करना पड़े. पिछले एक दशक में भारत ने अपने ऊर्जा आयात स्रोतों का विस्तार किया है और अब देश 41 देशों से तेल व गैस आयात करता है, जिससे किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हुई है. उन्होंने यह भी बताया कि देश के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार मौजूद हैं और भविष्य के लिए अतिरिक्त भंडारण क्षमता विकसित की जा रही है. इसके साथ ही सरकार वैश्विक साझेदारों के साथ संवाद बनाए रखते हुए समुद्री आपूर्ति मार्गों को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रही है.

फिलहाल, एलपीजी संकट की खबरों और कीमतों को लेकर बनी आशंकाओं के बीच उपभोक्ताओं की नजर सरकार की अगली नीति पर टिकी है. सवाल यही है कि क्या चुनावी चक्र के बाद वाकई महंगाई का दबाव बढ़ेगा, या यह केवल राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा है. आने वाले दिनों में बाजार के रुझान और सरकारी फैसले ही इस आशंका की सच्चाई तय करेंगे.

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