केरल में घर के बगीचे की देखभाल, खेत में काम करने या घर के बाहर रोजमर्रा के काम करने के दौरान भी एक अनचाहा स्वास्थ्य खतरा छिपा हो सकता है. लेप्टोस्पायरोसिस, जिसे आम बोलचाल में ‘रैट फीवर’ भी कहा जाता है, बारिश और बाढ़ के मौसम में ज्यादा फैल सकता है. हालिया सरकारी डेथ ऑडिट के आंकड़े बताते हैं कि यह बीमारी राज्य में संक्रमण से होने वाली मौतों की एक बड़ी वजह बनकर उभरी है.

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अस्पतालों के रिकॉर्ड से जुटाए गए डेथ ऑडिट डेटा के मुताबिक, 2025 में लेप्टोस्पायरोसिस से हुई मौतों में सबसे बड़ी संख्या शारीरिक मेहनत करने वाले मजदूरों की थी. कुल 390 मौतों में से 37 फीसदी यानी 47 मौतें इस वर्ग से जुड़ी थीं. वहीं, 14 मौतें यानी करीब 11 फीसदी कृषि मजदूरों की और 13 मौतें यानी करीब 10 फीसदी घरेलू काम करने वाली महिलाओं की थीं.

आंकड़ों के मुताबिक, 40 से 69 साल की उम्र के लोग इस बीमारी से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि लेप्टोस्पायरोसिस से होने वाली वास्तविक मौतों की संख्या सरकारी आंकड़ों से अधिक हो सकती है, क्योंकि कई मामलों में बीमारी की सही पहचान समय पर नहीं हो पाती.

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लेप्टोस्पायरोसिस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत

डेंगू जैसी बीमारियों के बड़े प्रकोप के बीच लेप्टोस्पायरोसिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है. लेकिन केरल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (K-CDC) के निदेशक और तिरुवनंतपुरम गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज अस्पताल के प्रोफेसर डॉ. अल्थाफ ए के अनुसार, इस बीमारी पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है.

उनका कहना है कि राज्य में संक्रामक बीमारियों से होने वाली कुल मौतों में लेप्टोस्पायरोसिस की हिस्सेदारी 52 फीसदी तक है. उन्होंने यह भी कहा कि सही जानकारी और शुरुआती स्तर पर उचित उपचार से बड़ी संख्या में मौतों को रोका जा सकता है.

केरल में स्वास्थ्य सेवाओं का मजबूत नेटवर्क होने के बावजूद लेप्टोस्पायरोसिस संक्रमण से होने वाली गंभीर मौतों का एक महत्वपूर्ण कारण बना हुआ है.

पांच साल में चार गुना से ज्यादा बढ़ीं मौतें

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2016-20 के दौरान लेप्टोस्पायरोसिस से 319 मौतें दर्ज की गई थीं. यह संख्या 2021-25 में बढ़कर 1,455 हो गई.इस अवधि में बीमारी की मृत्यु दर भी करीब 4.2 फीसदी से बढ़कर 6 फीसदी हो गई. इसी दौरान रिपोर्ट किए गए मामलों की संख्या भी तीन गुना से ज्यादा बढ़ी.

यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि केरल में मानसून के दौरान भारी बारिश, जलभराव और बाढ़ जैसी परिस्थितियां बार-बार बनती हैं, जिससे दूषित पानी और मिट्टी के संपर्क में आने का जोखिम बढ़ जाता है.

2026 में भी जारी है खतरा

लेप्टोस्पायरोसिस का खतरा 2026 में भी बना हुआ है. डायरेक्टरेट ऑफ हेल्थ सर्विसेज (DHS) के आंकड़ों के अनुसार, 29 जुलाई 2026 तक केरल में 1,352 कन्फर्म मामले और 58 मौतें दर्ज की गई थीं.

स्थिति को देखते हुए K-CDC ने जोखिम वाले कामगारों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के साथ-साथ कृषि और श्रम विभाग के साथ मिलकर काम करने को प्राथमिकता दी है.

राज्य में लेप्टोस्पायरोसिस की रोकथाम और समय पर इलाज को लेकर दिशानिर्देशों में भी बदलाव किए जा रहे हैं. इनमें जोखिम वाले लोगों में डॉक्सीसाइक्लिन (Doxycycline) के इस्तेमाल को लेकर विशेष जोर दिया जा रहा है. हालांकि किसी भी व्यक्ति को एंटीबायोटिक खुद से नहीं लेना चाहिए और इसका इस्तेमाल स्वास्थ्यकर्मी की सलाह के अनुसार ही किया जाना चाहिए.

क्या होता है लेप्टोस्पायरोसिस?

लेप्टोस्पायरोसिस एक बैक्टीरियल संक्रमण है, जो Leptospira नाम के बैक्टीरिया से होता है. संक्रमित चूहे और दूसरे जानवर इसके महत्वपूर्ण वाहक हो सकते हैं.

यह बीमारी खासकर भारी बारिश और बाढ़ के दौरान चिंता का विषय बन जाती है, क्योंकि इस दौरान संक्रमित जानवरों का पेशाब पानी और मिट्टी को दूषित कर सकता है.

कैसे फैलता है लेप्टोस्पायरोसिस?

संक्रमित जानवरों के पेशाब से दूषित पानी या मिट्टी के संपर्क में आने से संक्रमण हो सकता है. बैक्टीरिया शरीर में मुख्य रूप से कट या खुले घाव, कटी-फटी त्वचा,आंख, नाक और मुंह के रास्ते प्रवेश कर सकता है.

इसी वजह से खेतों, बगीचों, नालियों, सीवर या बाढ़ प्रभावित इलाकों में काम करने वाले लोगों को ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत होती है.

लेप्टोस्पायरोसिस के मुख्य लक्षण क्या हैं?

शुरुआती लक्षण कई बार सामान्य वायरल बुखार जैसे दिखाई दे सकते हैं. इनमें शामिल हैं:

-तेज बुखार-सिरदर्द-मांसपेशियों में तेज दर्द, खासकर पिंडलियों में-ठंड लगना-कमजोरी और थकान-मतली या उल्टी-आंखों का लाल होना

गंभीर मामलों में संक्रमण किडनी और लिवर को नुकसान, पीलिया, सांस लेने में परेशानी, रक्तस्राव और दूसरे गंभीर अंगों से जुड़े complications पैदा कर सकता है.

इसलिए मानसून के दौरान बुखार के साथ अगर किसी व्यक्ति का बाढ़ के पानी, गंदे पानी, मिट्टी या खेतों में काम करने का इतिहास है, तो डॉक्टर को इसकी जानकारी देना जरूरी है.

मानसून में खतरा क्यों बढ़ता है?

भारी बारिश और बाढ़ के दौरान सीवर, नालियों या जमीन का दूषित पानी आसपास फैल सकता है. लोग जब इस पानी या गीली मिट्टी में चलते हैं या काम करते हैं, तो बैक्टीरिया के संपर्क में आने की संभावना बढ़ जाती है.

लेप्टोस्पायरोसिस से बचाव कैसे करें?-बाढ़ के पानी और संदिग्ध रूप से दूषित पानी से अनावश्यक संपर्क से बचें.-पानी में उतरना जरूरी हो तो गमबूट और दस्ताने पहनें.-हाथ-पैर में कट या घाव हो तो उसे अच्छी तरह ढककर रखें.-घर और आसपास के इलाके में चूहों की मौजूदगी को नियंत्रित करें.-बाढ़ या जलभराव वाले इलाकों में काम करने के बाद शरीर और हाथ-पैर को अच्छी तरह साफ करें.-तेज बुखार के साथ दूषित पानी या मिट्टी के संपर्क का इतिहास हो तो जल्द डॉक्टर से संपर्क करें.सबसे जरूरी बात

लेप्टोस्पायरोसिस से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है दूषित पानी और मिट्टी के संपर्क को कम करना और संक्रमण के लक्षण दिखाई देने पर समय पर चिकित्सा सहायता लेना. मानसून में इसे सामान्य बुखार समझकर नजरअंदाज करना गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है.