लद्दाख प्रशासन ने केंद्र शासित प्रदेश के सभी सात जिलों में लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (LAHDC) का ढांचा लागू करने का फैसला किया है. अब तक यह व्यवस्था केवल लेह और करगिल तक सीमित थी, लेकिन नए फैसले के बाद शाम, नुब्रा, चांगथांग, ज़ंस्कार और द्रास में भी निर्वाचित स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषदें बनाई जाएंगी. प्रशासन इसे लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण और स्थानीय विकास की दिशा में बड़ा कदम बता रहा है, जबकि लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) ने इसे लद्दाख की संवैधानिक मांगों को कमजोर करने की कोशिश करार दिया है.

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सभी सात जिलों में लागू होगा LAHDC मॉडल

लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा के मुताबिक, इस फैसले का मकसद स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करना, सरकारी सेवाओं की पहुंच बढ़ाना और क्षेत्र की जनजातीय व सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करना है. नई व्यवस्था के तहत लेह और करगिल के अलावा पांच नए जिलों—शाम, नुब्रा, चांगथांग, ज़ंस्कार और द्रास—में भी अपनी-अपनी निर्वाचित पहाड़ी परिषद होगी.

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नई परिषदों को मिलेंगी व्यापक शक्तियां

प्रशासन के अनुसार, नई परिषदों को वही कार्यकारी, वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार दिए जाएंगे, जो पहले से लेह (1995) और करगिल (2003) की परिषदों को प्राप्त हैं. ये परिषदें भूमि आवंटन, स्थानीय भर्ती और पदोन्नति, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं, स्कूलों का संचालन, पर्यटन, बुनियादी ढांचा, स्थानीय कर वसूली और जिला विकास योजनाओं जैसे अहम विषयों पर निर्णय ले सकेंगी.

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नए कानून की जरूरत नहीं

यह विस्तार मौजूदा LAHDC अधिनियम की धारा 3(1) के तहत किया जाएगा. यानी इसके लिए नए कानून की आवश्यकता नहीं होगी. प्रशासन केवल अधिसूचना जारी करेगा, आवश्यक संशोधन करेगा और नए निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन कराया जाएगा.

17 नई तहसीलों का भी गठन

स्थानीय प्रशासन को और मजबूत बनाने के लिए लद्दाख में 17 नई तहसीलें बनाई गई हैं. इसके साथ ही केंद्र शासित प्रदेश में कुल तहसीलों की संख्या बढ़कर 32 हो गई है. प्रशासन का कहना है कि इससे दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों तक सरकारी सेवाओं की पहुंच बेहतर होगी.

अनुच्छेद 371 के तहत नई व्यवस्था की तैयारी

गृह मंत्रालय (MHA) लद्दाख के लिए अनुच्छेद 371 के तहत एक विशेष संवैधानिक ढांचे पर भी काम कर रहा है. इसके तहत केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर एक शीर्ष संस्था बनाई जाएगी, जो सभी सात पहाड़ी परिषदों के ऊपर कार्य करेगी. इस संस्था को विधायी, कार्यकारी और वित्तीय अधिकार दिए जाने की योजना है.

अधिकारियों का कहना है कि यह मॉडल लद्दाख के लोगों की लंबे समय से चली आ रही छठी अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग के विकल्प के रूप में तैयार किया जा रहा है.

LAB और KDA ने किया विरोध

लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) इस फैसले का लगातार विरोध कर रहे हैं. दोनों संगठनों का कहना है कि सभी जिलों में अलग-अलग पहाड़ी परिषदें बनाकर केंद्र सरकार लद्दाख की राजनीतिक एकता को कमजोर करना चाहती है.

LAB के सह-अध्यक्ष छेरिंग दोरजे लाक्रुक ने कहा कि यदि सारी शक्तियां जिला परिषदों को दे दी जाएंगी, तो अनुच्छेद 371 के तहत प्रस्तावित प्रतिनिधि सरकार के पास कोई वास्तविक अधिकार नहीं बचेंगे. उनके अनुसार लद्दाख की आबादी इतनी अधिक नहीं है कि इतने बड़े स्तर पर विकेंद्रीकरण की जरूरत पड़े.

तीन-स्तरीय प्रतिनिधि व्यवस्था बनेगी

नई व्यवस्था लागू होने के बाद लद्दाख में तीन स्तर की लोकतांत्रिक प्रणाली होगी. इसमें सबसे नीचे पंचायतें, उसके ऊपर जिला स्तर की पहाड़ी परिषदें और सबसे ऊपर केंद्र शासित प्रदेश स्तर की प्रतिनिधि संस्था होगी. हालांकि, इस घोषणा में लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने या विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाने जैसी मांगों पर कोई फैसला नहीं लिया गया है.

LAB-KDA की चार प्रमुख मांगें

LAB और KDA लंबे समय से लद्दाख के लिए चार प्रमुख संवैधानिक मांगें उठा रहे हैं. इनमें प्रमुख रूप से-

  • लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा या विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाए.
  • क्षेत्र को छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक संरक्षण देकर भूमि, संसाधनों और स्थानीय जनजातीय अधिकारों की रक्षा की जाए.
  • स्थानीय युवाओं के लिए अलग लोक सेवा आयोग (PSC) और भर्ती बोर्ड बनाया जाए.
  • लेह और करगिल के लिए अलग-अलग लोकसभा सीटें बनाई जाएं ताकि दोनों क्षेत्रों को स्वतंत्र संसदीय प्रतिनिधित्व मिल सके.'बड़ी मांगों से ध्यान भटकाने की कोशिश'

स्थानीय नेताओं का आरोप है कि पांच नए प्रशासनिक क्षेत्र बनाकर केंद्र सरकार स्थानीय स्तर की अपेक्षाओं को तो पूरा करने की कोशिश कर रही है, लेकिन लद्दाख की बड़ी संवैधानिक और लोकतांत्रिक मांगों को नजरअंदाज किया जा रहा है. उनका कहना है कि क्षेत्र के भविष्य को लेकर स्थायी समाधान केवल संवैधानिक सुरक्षा और व्यापक राजनीतिक अधिकारों से ही संभव है.