नई दिल्ली: हिन्दुस्तानी मुसलमानों के पर्सनल कानून की बड़ी संस्था ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बहुत जल्द देश के हर जिले में दारुल कजा शुरू करने जा रहा है. जिसमें तीन तलाक और उससे जुड़े मुद्दों की समस्या हल करने का दावा किया जा रहा है. दारुल का मतलब है जगह और कजा का मतलब है इंसाफ, यानि इंसाफ की जगह. खबर है कि इस साल 10 नई शरिया अदालत शुरू की जाएंगी.
खबर के मुताबिक 23 जुलाई को गुजरात के सूरत में शरिया अदालत खुलेगी और 16 जुलाई को यूपी के कन्नौज से इसकी शुरूआत हुई. देश में एक कच्चे अनुमान के मुताबिक 200 दारुल कजा पहले से काम कर रहे हैं. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का तर्क है कि ये दारुल कजा है जहां मुस्लिम परिवारों के घरेलू झगड़ों, पति पत्नी के मन मुटाव को दूर किया जाता है. और तलाक के कई मामले दारुल कजा में आकर खत्म हो जाते हैं. क्या शरिया अदालतों को अदालत का दर्जा दिया जा सकता है? वकील सुशील वर्मा के मुताबिक, ''इसे हम अदालत तो बिल्कुल नहीं कह सकते हैं, ये पंचायत व्यवस्था जैसी चीज है लेकिन इसका फैसला अदालत के बराबर नहीं होगा. व्यक्ति माने तो ठीक नहीं माने तो कोई बाध्यता नहीं होगी. इन पंचायतों का संविधान से कोई मतलब नहीं है, इनके फैसले भी मान्य नहीं होते हैं. बहुत से गैरकानूनी फैसले हो जाते हैं जिन्हें कोर्ट खत्म कर देती है. संवैधानिक या कानूनी मान्यता इस अदालत को नहीं मिलेगी, जिसकी इजाजत संविधान में नहीं दी गई है.'' खुद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहीं ये भी नहीं कहा है कि ये दारुल कजा शरिया अदालत है इसलिए जो लोग दारुल कजा को अदालत कहकर देश के इस्लामीकरण की साजिश का भ्रम फैला रहे हैं उनसे बचने की जरूरत है. इसलिए हमारी पड़ताल में देश में मुसलमानों के लिए अलग अदालत खुलने का दावा झूठा साबित हुआ है.