तसलीमा नसरीन, इस नाम से शायद ही कोई हो जो परिचित न हो. दुनियाभर में मशहूर लेखिका पिछले दिनों 19 साल बाद कोलकाता वापसी को लेकर चर्चा में रहीं. उनकी कोलकाता वापसी पर कोलकाता पुलिस ने कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की थी. वहां एक बार फिर तसलीमा ने मदरसों, मस्जिदों और धर्म पर खुलकर अपनी बात रखी. उन्होंने बांग्लादेश की राजनीति पर भी टिप्पणी की.

Continues below advertisement

उन्होंने बांग्लादेश में शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव की आलोचना की. उनका कहना था कि किसी बड़े राजनीतिक दल पर प्रतिबंध लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है और लोकतंत्र में सभी दलों को राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा रहने का अवसर मिलना चाहिए.

इस दौरान उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी बयान दिया. कवि जॉय गोस्वामी से जुड़े एक कार्यक्रम में विवाद के बाद तसलीमा नसरीन ने कहा कि किसी भी विचारधारा के व्यक्ति को अपनी बात रखने का अधिकार होना चाहिए और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए.

Continues below advertisement

हालांकि, उनके बयानों पर बंगाल जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष सिद्दीकुल्लाह चौधरी समेत कई मुस्लिम संगठन भड़क गए. यह कोई पहला मौका नहीं था, जब तसलीमा के लेख या बयान पर मुस्लिम संगठन भड़के हों. अपनी बेबाक राय के कारण उन्हें उनके पहले उपन्यास 'लज्जा' के प्रकाशन के बाद से ही निशाना बनाया जाने लगा था. बाद में विवाद इतना बढ़ गया कि उन्हें अपना देश तक छोड़ना पड़ा. आइए आपको बताते हैं कि आखिर उनके इस बहुचर्चित उपन्यास में ऐसा क्या था, जिससे कट्टर इस्लामिक संगठन भड़क गए और उनके नाम का फ़तवा तक जारी कर हो गया.

लज्जा में आखिर ऐसा क्या था कि तसलीमा को बनाया जाने लगा निशाना?

तसलीमा नसरीन की उपन्यास 'लज्जा' वर्ष 1993 में प्रकाशित हुई. उपन्यास के प्रकाशित होते ही विवाद शुरू हो गया. विवाद का कारण यह था कि इसमें 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ हुए अत्याचारों का उल्लेख था.

तसलीमा ने 'लज्जा' में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हुए हमलों, हिंसा, लूट, बलात्कार और पलायन का चित्रण किया है. उपन्यास का केंद्रीय संदेश धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिक हिंसा की आलोचना है. यही इसका सबसे बड़ा विवाद बना. मुस्लिम संगठनों का कहना था कि इस उपन्यास के माध्यम से तसलीमा ने इस्लाम को बदनाम करने की कोशिश की है. उन पर मुसलमानों की नकारात्मक छवि प्रस्तुत करने का आरोप लगाया गया.

इस उपन्यास में तसलीमा ने सवाल उठाया कि जिस बांग्लादेश की स्थापना धर्मनिरपेक्षता के आधार पर हुई, वहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा क्यों नहीं हो सकी. उपन्यास में कई वास्तविक घटनाओं, मंदिरों पर हमलों और सांप्रदायिक हिंसा का उल्लेख किया गया. समर्थकों ने इसे दस्तावेज़ी यथार्थ माना, जबकि आलोचकों ने इसे एकतरफा और समाज को बदनाम करने वाला बताया.

लज्जा उपन्यास की कहानी में क्या है?

'लज्जा' उपन्यास के केंद्र में सुधामय दत्ता का परिवार है, जिसमें उनकी पत्नी किरणमयी, बेटा सुरंजन और बेटी माया हैं. यह परिवार धर्मनिरपेक्ष सोच वाला है और किसी भी दबाव में देश छोड़ने को तैयार नहीं होता.

बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद बांग्लादेश के कई इलाकों में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले शुरू हो जाते हैं. हिंसा भयानक रूप ले लेती है और हिंदुओं के मंदिरों, घरों तर दुकानों पर हमले किए जाते हैं.

अंततः माया का अपहरण हो जाता है और दत्ता परिवार पूरी तरह टूट जाता है. आखिर में सुधामय, जो कभी देश छोड़ना नहीं चाहते थे, मजबूर होकर भारत आने का फैसला करते हैं.

विवाद की सबसे बड़ी वजह यही रही कि तसलीमा ने उपन्यास में दिखाया कि किस तरह बाबरी मस्जिद की घटना का बदला बांग्लादेश के निर्दोष हिंदुओं से लिया गया.

आइए देखें, 'लज्जा' प्रकाशित होने के बाद क्या-क्या हुआ

1993

बांग्लादेश सरकार ने 'लज्जा' पर प्रतिबंध लगा दिया. पूरे देश में तसलीमा के खिलाफ कई कट्टरपंथी संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किए. यहां तक कि उन्हें जान से मारने की धमकियां भी दी गईं.

1994 मई

लगातार मिल रही धमकियों के बीच उनका एक साक्षात्कार प्रकाशित हुआ. एक अखबार में छपे इस साक्षात्कार के बाद उन पर इस्लाम की आलोचना करने का आरोप लगा. कुछ संगठनों ने उनकी हत्या की धमकी दी और उनके सिर पर इनाम घोषित कर दिया. सरकार ने धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप में उनके खिलाफ मामला दर्ज किया.

5 जून 1994

गिरफ्तारी से बचने के लिए तसलीमा नसरीन सार्वजनिक जीवन से गायब हो गईं और छिपकर रहने लगीं.

अगस्त 1994

उन्होंने ढाका हाई कोर्ट में आत्मसमर्पण किया, जहां उन्हें जमानत मिल गई. लेकिन लगातार मिल रही जान से मारने की धमकियों के कारण वे फिर से छिप गईं.

10 अगस्त 1994

इसी महीने उन्हें देश छोड़ना पड़ा. तसलीमा नसरीन गुप्त रूप से स्वीडन चली गईं. यहीं से उनका लंबा निर्वासन (Exile) शुरू हुआ.

2004

भारत ने उन्हें अस्थायी रिहायशी अनुमति दी और वे कोलकाता आकर रहने लगीं.

2007

कोलकाता में विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें पश्चिम बंगाल छोड़ना पड़ा. इसके बाद वे दिल्ली सहित भारत के अन्य स्थानों पर रहीं.

2025

लगभग 19 वर्ष बाद तसलीमा नसरीन कोलकाता लौटीं. उन्होंने कहा कि यदि सुरक्षा का भरोसा मिले, तो वे वहां स्थायी रूप से रहना चाहेंगी.

'लज्जा' को लेकर विवाद पर तसलीमा ने क्या कहा था?

तसलीमा नसरीन ने 'लज्जा' को लेकर अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों को खारिज किया. उन्होंने कहा कि उन्होंने इस्लाम की आलोचना नहीं की, बल्कि धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा का विरोध किया था.  उनके अनुसार, उनके खिलाफ जारी फ़तवों और विरोध का बड़ा कारण उनकी अन्य किताबें और लेख थे, जिनमें उन्होंने धर्म, विशेषकर इस्लामी कट्टरपंथ और महिलाओं की स्थिति पर तीखी आलोचना की थी.