कर्नाटक विधान परिषद चुनाव आने के बाद कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है. यह हार कांग्रेस के लिए इसलिए बड़ी है, क्योंकि राज्य में कांग्रेस की सरकार होते हुए भी पार्टी को एक सीट भी नसीब नहीं हुई है. इससे पहले भी हालिया चुनावों में कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती यही रही है कि कांग्रेस की जहां भी अपनी सरकारें हैं, वहां पार्टी अपनी जीत को जारी नहीं रख पाई है. ऐसे में एक बार फिर से अपने प्रभाव वाले राज्य में मिली हार कांग्रेस के लिए चुनौती बन गई है.

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कर्नाटक विधान परिषद में इस चुनावी रिजल्ट के बाद समीकरण अब भी कांग्रेस के पक्ष में है. जहां 75 सीटों वाली विधान परिषद में कांग्रेस के पास 37 सीट और एक निर्दलीय सहयोगी के साथ बहुमत से बस एक सीट ज्यादा हैं. BJP अब 25 सीटों और सहयोगी JD(S) 7 सीट पर है. एक सीट पर कांग्रेस के ही सभापति सलीम अहमद हैं. सभापति द्वारा मनोनीत की जाने वाली 4 सीटें अब भी खाली हैं.

खरगे के क्षेत्र वाली सीट भी हारी कांग्रेस

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कांग्रेस के लिए कर्नाटक की हार इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि कर्नाटक ही कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का गृह राज्य है. स्वयं राष्ट्रीय अध्यक्ष खरगे के गृह जिले कलबुर्गी के क्षेत्र में आने वाली उत्तर-पूर्व की शिक्षक सीट पर भी कांग्रेस को हार मिली है. दिल्ली में सत्ता को चुनौती देने के लिए कर्नाटक से ही कांग्रेस को लगातार ईंधन मिलता रहा है. ऐसे में यह हार कांग्रेस को आगामी चुनावों से पहले एक कांटे की तरह चुभने का काम करेगी. 

हाल ही में बदले गए थे मुख्यमंत्री

कुछ समय पहले ही में कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व ने कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद पर बदलाव किया था. जहां उन्होंने अनुभवी और राज्य में प्रभावी सिद्धारमैया को हटाकर कई साल से मुखमंत्री पद की आस लगाए बैठे डी के शिवकुमार को कमान सौंपी थी. डी के शिवकुमार के लिए मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहली चुनावी हार मिली है. इसके बाद उनके नेतृत्व पर सवाल उठना भी शुरू हो गया है. BJP के दिग्गज नेता और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा ने इस हार के बाद डी के शिवकुमार को इस्तीफा देने की सलाह दी है. उन्होंने कहा है कि "हम चारों सीटें जीत गए हैं, CM डी.के. शिवकुमार तुरंत इस्तीफा दे देंगे!"

कर्नाटक से उठी है लगातार आवाज

हाल ही में राहुल गांधी के नेतृत्व में SIR और CEC के खिलाफ हुए आंदोलनों में कर्नाटक महत्वपूर्ण राज्य बनकर उभरा था. जब सीजेपी को भी अपने दिल्ली वाले आंदोलन से पहले बेंगलुरू में कांग्रेस ने कार्यक्रम करने का मौका दिया था. साथ ही कांग्रेस को आंदोलनों के लिए जरूरी रसद के लिए भी कर्नाटक की मदद मिलने का सवाल उठता रहा है. हाल ही में मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे और राज्य में गृहमंत्री प्रियांक खरगे ने ही सबसे पहले RSS के पंजीकृत संस्था न होने का प्रश्न उठाकर लगातार BJP और RSS पर हमला भी बोला था.

बैलैट पेपर पर भी हारी कांग्रेस

कांग्रेस के लिए इस महत्वपूर्ण दक्षिणी राज्य में मिली हार आगामी 4 विधानसभा चुनावों से पहले गले की हड्डी साबित हो सकती है. SIR और चुनाव आयोग के मुद्दे पर कांग्रेस लगातार EVM से हटकर बैलैट पेपर से चुनाव करवाने की भी मांग करती रही है. विधान परिषद चुनावों में मिली यह हार कांग्रेस को बैलैट पर ही मिली है. इससे उनके लिए यह मुद्दा भी कमजोर साबित होता हुआ दिखाई देगा. 

डीके ने कहा- 'हार की समीक्षा करेंगे'

विधान परिषद चुनाव में मिली हार के बाद मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने कहा कि "हम विधान परिषद चुनावों में मतदाताओं द्वारा दिए गए फैसले को सम्मान के साथ स्वीकार करते हैं. हमारे पास एक सीट थी और हमें उसे जीतने की उम्मीद थी. अब जनता ने हमें एक संदेश दिया है. हम नतीजों पर ध्यान देंगे और सुधार के लिए कदम उठाएंगे. हमें काफी अच्छी संख्या में वोट भी मिले हैं और हम इस परिणाम की समीक्षा करेंगे. विपक्ष इसे आने वाले चुनावों का संकेत बता रहा है. क्या इसका मतलब यह है कि चन्नापटना और शिग्गांव के उपचुनाव भी आने वाले चुनावों का संकेत थे? विपक्ष को उन नतीजों के बारे में भी बात करनी चाहिए, है ना?"