केंद्र ने कहा है कि वह जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग वाली याचिकाओं पर जवाब दाखिल करेगा. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को इसका समय देते हुए सुनवाई 4 सप्ताह के लिए टाल दी है. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अनुच्छेद 370 मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र ने खुद इसका भरोसा दिया था. तब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था कि वह जम्मू-कश्मीर को दोबारा राज्य का दर्जा देगी.

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मुख्य न्यायधीश भूषण रामकृष्ण गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच के सामने हुई सुनवाई में केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए. उन्होंने कहा कि इस बारे में फैसला लेते समय पहलगाम समेत तमाम घटनाओं को भी ध्यान में रखना होगा. कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार किया. 14 अगस्त को हुई पिछली सुनवाई में खुद चीफ जस्टिस ने भी टिप्पणी की थी कि जमीनी वास्तविकता को परख कर ही कोई फैसला लिया जाना चाहिए.

तुषार मेहता ने यह भी कहा, ' इस बारे में फैसला जम्मू-कश्मीर सरकार से बात कर लिया जाएगा. कोर्ट में जो याचिकाकर्ता पहुंचे हैं, उनकी दिलचस्पी दुनिया में जम्मू-कश्मीर को बदहाल दिखाने और भारत को बदनाम करने की ज्यादा दिख रही है. 2019 में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद से क्षेत्र में बहुत विकास हुआ है. आम नागरिक खुश हैं.'

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जहूर अहमद बट और खुर्शीद अहमद मलिक समेत कई याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने के केंद्र सरकार के फैसले को सही ठहराया था. फैसला देते समय कोर्ट ने केंद्र सरकार के इस आश्वासन को दर्ज किया था कि जम्मू कश्मीर को बाद में राज्य का दर्जा दे दिया जाएगा. याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण और मेनका गुरुस्वामी ने पक्ष रखा.

ध्यान रहे कि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को अगस्त 2019 में संसद ने निष्प्रभावी कर दिया था. साथ ही, राज्य को 2 केंद्र शासित क्षेत्र जम्मू कश्मीर और लद्दाख में विभाजित कर दिया था. 2023 में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने इस कदम को सही ठहराया था.