भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक मानसून की उत्तरी सीमा फिलहाल हरनाई, सोलापुर, हैदराबाद, भद्राचलम, कोरापुट, फूलबनी, रांची, जमुई और मुजफ्फरपुर तक पहुंच चुकी है.  इसका मतलब है कि दक्षिण और पूर्वी भारत के बड़े हिस्से मानसून की चपेट में आ चुके हैं लेकिन उत्तर भारत दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान अब भी मानसून का इंतजार कर रहे हैं. गुजरात और मध्य भारत के कई हिस्सों में भी इसकी पहुंच अधूरी है.

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मॉनसून ने इस साल केरल में हल्की देरी से एंट्री ली लेकिन असली चिंता उसके बाद सामने आई जब इसकी प्रगति अचानक धीमी पड़ गई. मौसम विज्ञान में इसे मॉनसून ब्रेक या वीक फेज़ कहा जाता है. इसी वजह से सैटेलाइट तस्वीरों में बादलों का फैलाव कम नजर आया और कई इलाकों में बारिश अचानक घट गई यानी मॉनसून खत्म नहीं हुआ बल्कि उसका एक्टिव फेज कमजोर पड़ गया.

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23 जून के आसपास मिल सकता है अगला पुश

IMD के मुताबिक अब हालात फिर से अनुकूल हो रहे हैं और 23 जून के आसपास मानसून एक बार फिर तेजी पकड़ सकता है. इससे महाराष्ट्र, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में मानसून आगे बढ़ने की संभावना है यानी अगले कुछ दिन मॉनसून की चाल तय करने वाले साबित हो सकते हैं.

अगले 7 दिन - कहीं भारी बारिश, कहीं सिर्फ आंधी-बारिश

19 से 25 जून के बीच पूर्वोत्तर भारत - असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश समेत कई राज्यों में व्यापक से लेकर बहुत भारी बारिश की चेतावनी है. पूर्वी भारत में बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में भी भारी बारिश और आंधी-बिजली का अलर्ट जारी किया गया है. दक्षिण भारत में फिलहाल छिटपुट बारिश जारी है लेकिन 20 जून के बाद इसमें तेजी आ सकती है.  वहीं पश्चिम भारत में 22 जून के बाद कोंकण और गोवा में बारिश बढ़ने की उम्मीद है. दूसरी तरफ उत्तर भारत—दिल्ली-NCR, पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी में अभी मानसून नहीं पहुंचा है यहां सिर्फ प्री-मॉनसून गतिविधियां जैसे आंधी, बिजली और हल्की बारिश देखने को मिल रही हैं.

एल नीनो का असर: बैकग्राउंड में चल रहा बड़ा खेल

इस साल एल नीनो को भी मानसून की कमजोरी से जोड़कर देखा जा रहा है. प्रशांत महासागर में पानी के गर्म होने से वैश्विक हवा के पैटर्न बदलते हैं जिससे भारत तक नमी पहुंचाने वाली हवाएं कमजोर हो सकती हैं हालांकि यह सीधे तौर पर बादलों को गायब नहीं करता लेकिन मानसून के कमजोर पड़ने की पृष्ठभूमि जरूर तैयार करता है.

खेती पर डबल मार - कहीं बाढ़, कहीं सूखा

IMD के बुलेटिन में सीधे फसल नुकसान का आंकड़ा नहीं दिया गया है लेकिन कृषि परामर्श से साफ संकेत मिलते हैं कि किसानों पर चौतरफा दबाव बन रहा है. जहां मानसून पहुंच चुका है जैसे असम, मेघालय, बिहार और पश्चिम बंगाल वहां भारी बारिश और जलभराव का खतरा है जिससे धान की नर्सरी प्रभावित हो सकती है.  वहीं जहां मॉनसून अभी नहीं पहुंचा जैसे उत्तर भारत और कुछ मध्य-पश्चिमी इलाके वहां लू और सूखे की स्थिति बनी हुई है जिससे सिंचाई लागत बढ़ रही है. आंधी और तेज हवा वाले इलाकों में कटी फसल को नुकसान का भी खतरा बना हुआ है.

खरीफ सीजन पर असर बुवाई में देरी और बढ़ता जोखिम

खरीफ फसलें पूरी तरह मानसून पर निर्भर होती हैं, और अभी सबसे बड़ा असर बुवाई पर दिख रहा है. कई जगहों पर बुवाई टल गई है तो कहीं किसान सूखी मिट्टी में जोखिम लेकर बुवाई कर रहे हैं. इससे लागत बढ़ रही है और अगर बारिश की कमी बनी रहती है तो उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है.

तीन हिस्सों में बंटी मानसून की कहानी

इस साल मानसून को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है. पहले देरी से शुरुआत फिर बीच में ब्रेक और अब असमान असर जहां एक तरफ भारी बारिश है तो दूसरी तरफ सूखा. यही असंतुलन इस साल की सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है क्योंकि भारत में मॉनसून सिर्फ मौसम नहीं बल्कि खेती और अर्थव्यवस्था की रीढ़ है.

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