पिछले 20 साल में IIT कॉलेज में 171 स्टूडेंट्स ने सुसाइड किया है. यह डेटा IIT कानपुर के पूर्व छात्र धीरज सिंह ने दिया है. उन्होंने जनवरी 2006 से सितंबर 2026 के बीच इन अप्राकृतिक मौतों से जुड़ा डेटा जारी किया है. इसमें बताया गया है कि आईआईटी में सुसाइड का ग्राफ कितना रहा है. 

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आरटीआई के जरिए और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर इन आंकड़ों को जुटाया गया है. इससे पता चलता है कि 20 सालों के दूसरे हिस्से में मौतों की संख्या में तेजी देखी गई है. 2006 से 2015 के बीच 51 मौतें हुईं है.

वहीं, 2016 से सितंबर 2026 के बीच 129 मौतें हुई हैं. हाल ही में 19 सितंबर को आईआईटी बॉम्बे में एक छात्र ने सुसाइड कर लिया था. अब इसको लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.

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परिवार के लोगों ने कॉलेज प्रशासन के ऊपर जातिगत भेदभाव और बेटे पर प्रेशर डालने का आरोप मढ़ा है. इस मामले की जांच फिलहाल मुंबई क्राइम ब्रांच के हाथ में है.

82 प्रतिशत मौतें कॉलेज कैंपस में हुईं

मौतों के इन आंकड़ों में जो सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बातें हैं, उनमें 82 प्रतिशत मौतें कॉलेज कैंपस में हुई है. इन मौतों का समयकाल भी एग्जाम टाइम और रिजल्ट घोषणा के आसपास रहा है. इसके अलावा सेमेस्टर ब्रेक के समय यह संख्या बेहद ही कम थी. 

इन मौतों में 70 प्रतिशत फांसी लगाकर हुई हैं. इससे एकेडमिक और इंस्टीट्यूशन के प्रेशर की ओर फिर से ध्यान खींचा है. 22 साल के साहिल रवींद्र वाकोडे की मौत के बाद से यह मामला उठ गया है.

बताया जा रहा है कि उसे 18 सितंबर को एग्जाम के दौरान मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर पकड़ा गया था. हालांकि, कॉलेज प्रशासन का कहना है कि उसने अपना पूरा पेपर चैट जीपीटी पर अपलोड किया था. उसके खिलाफ किसी तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गई. इंस्ट्रक्टर और एचओडी ने उसे काउंसलिंग दी थी. 

PHD के स्टूडेंट्स की मौतों का आंकड़ा ज्यादाधीरज सिंह का कहना है कि बीटेक के पुरुष और महिला के अलावा पीएचडी के स्टूडेंट्स में मौतों की संख्या ज्यादा है. पिछले 20 सालों में हुए सुसाइड में पुरुष बीटेक स्टूडेंट और पीएचडी कर रही महिलाएं मिलकर 60 प्रतिशत थीं. इसमें एससी और एसटी स्टूडेंट्स के सुसाइड की संख्या जनरल स्टूडेंट्स की तुलना में अधिक थी. इनकी उम्र भी बाकि कैटेगिरी के बच्चों से कम थी. 

रिसर्च में माना है कि कोरोना के बाद से अनुमानित दरों में बढ़ोतरी हुई है. इनमें एससी स्टूडेंट्स के सुसाइड केस की दर पहले की तुलना में 2.6 रही, तो वहीं एसटी स्टूडेंट्स में यह दर पहले के स्तर की तुलना में 4.2 गुना थी. रिसर्च करने वाले धीरज सिंह ने कहा है कि उन्होंने अपनी रिसर्च में WHO के तरीके पर आधारित पद्धति का इस्तेमाल किया है.