Xप्लेन: किस राज्य के मंत्रिमंडल में महिला मंत्री जीरो, सबसे कम? यूपी-कर्नाटक तक चौंकाने वाले आंकड़े
Women Ministers in States: पश्चिम बंगाल में 973 का लिंगानुपात होने के बावजूद 7 महिला मंत्री हैं. इसके अलावा 6 राज्य ऐसे भी हैं जहां एक भी महिला मंत्री नहीं है. 9 राज्यों में सिर्फ एक महिला मंत्री है.

कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने 3 अगस्त 2026 को अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया. 20 नए मंत्रियों को शपथ दिलाई, लेकिन इस पूरे विस्तार में महिलाओं को सिर्फ एक सीट मिली- गायत्री शांते गौड़ा. यह कोई पहली बार नहीं हुआ है. इससे पहले शिवकुमार के 13 सदस्यीय पहले मंत्रिमंडल में एक भी महिला मंत्री नहीं थी. कर्नाटक जैसे बड़े और प्रगतिशील राज्य की कैबिनेट में महिलाओं की मौजूदगी लगभग न के बराबर है. यह सिर्फ कर्नाटक की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे देश में महिलाओं की आबादी और सत्ता में उनकी गैर-मौजूदगी के बीच के गहरे रिश्ते की कहानी है. तो किन राज्यों में महिलाएं सबसे कम हैं और वहां के मंत्रिमंडलों में महिलाओं की क्या स्थिति है...
कर्नाटक: जहां 974 महिलाएं, मंत्रिमंडल में सिर्फ एक
कर्नाटक में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5, 2019-21) के मुताबिक, लिंगानुपात 974 है, यानी 1000 पुरुषों पर 974 महिलाएं. यह राष्ट्रीय औसत 1020 से कम है, लेकिन हरियाणा जितना बुरा नहीं. इसके बावजूद मंत्रिमंडल में महिलाओं की संख्या देखें तो तस्वीर बेहद निराशाजनक है. 34 मंत्रियों की कुल संख्या में सिर्फ एक महिला मंत्री हैं, यानी महज 2.9%.
यह विरोधाभास इसलिए और गहरा हो जाता है क्योंकि कांग्रेस ने कर्नाटक का चुनाव महिला वोटरों को लुभाकर जीता था. महिलाओं ने कांग्रेस को जिताया, लेकिन सत्ता में उन्हें जगह नहीं मिली. 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 'गृहलक्ष्मी' योजना जैसे वादे करके महिला वोटरों को साधा था, लेकिन मंत्रिमंडल में महिलाओं की संख्या शून्य रही.
कर्नाटक उन 6 राज्यों में शामिल रहा, जहां कैबिनेट में एक भी महिला मंत्री नहीं थीं. हालांकि अब एक महिला मंत्री के शामिल होने से स्थिति में मामूली बदलाव आया है. जब कर्नाटक में महिला विधायकों की संख्या बढ़ रही है, तो सवाल उठता है कि सत्ता में यह प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिखता?
हरियाणा: जहां महिलाएं सबसे कम, मंत्री भी गिनती के
हरियाणा देश का सबसे कम लिंगानुपात वाला राज्य है. NFHS-5 (2019-21) के मुताबिक, यहां 1000 पुरुषों पर सिर्फ 879 महिलाएं हैं, जो राष्ट्रीय औसत 1020 से बहुत कम है. 2024 के जन्म लिंगानुपात के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि यह और गिरकर 910 पर आ गया, जो 8 साल का सबसे निचला स्तर है. जहां महिलाओं की आबादी इतनी कम हो, वहां सत्ता में उनकी हिस्सेदारी भी स्वाभाविक रूप से प्रभावित होती है.
नायब सिंह सैनी सरकार के वर्तमान मंत्रिमंडल में सिर्फ दो महिला मंत्री श्रुति चौधरी और आरती राव सिंह हैं. करीब 12 सदस्यीय मंत्रिमंडल में यह संख्या लगभग 16% है, जो राज्य के लिंगानुपात संकट के अनुपात में ही कम है.
उत्तर भारत के राज्य: जहां असंतुलन गहरा, राजनीति में भी हाशिये पर
सिर्फ हरियाणा ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत के कई बड़े राज्यों में लिंगानुपात की स्थिति खराब है और इसका सीधा असर वहां की राजनीतिक भागीदारी पर भी दिखता है:
- उत्तर प्रदेश: NFHS-5 के मुताबिक, यहां का लिंगानुपात 912 है. देश के सबसे बड़े राज्य में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 53 सदस्यीय मंत्रिमंडल में सिर्फ 6 महिला मंत्री हैं, जो लगभग 11.3% बैठती है. इनमें बेबी रानी मौर्य, गुलाब देवी, प्रतिभा शुक्ला, रजनी तिवारी, विजय लक्ष्मी गौतम और कृष्णा पासवान शामिल हैं.
- मध्य प्रदेश: राज्य का लिंगानुपात 900 से कम है (NFHS-5 में बाल लिंगानुपात में सुधार के बावजूद कुल अनुपात अभी भी कम है). मुख्यमंत्री मोहन यादव के 33 सदस्यीय मंत्रिमंडल में 5 महिला मंत्री संपत्तिया उइके, निर्मला भूरिया, कृष्णा गौर, प्रतिमा बागरी और राधा सिंह हैं, जो करीब 15.1% है.
- राजस्थान: NFHS-5 के मुताबिक लिंगानुपात 921 है. मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के 25 सदस्यीय मंत्रिमंडल में सिर्फ 2 महिला मंत्री (12%) हैं. इनमें दिया कुमारी और डॉ. मंजू बाघमार शामिल हैं.
- पंजाब: NFHS-5 के मुताबिक, राज्य का लिंगानुपात 904 है, जो हरियाणा के बाद सबसे खराब में से एक है. मुख्यमंत्री भगवंत मान के 15 सदस्यीय मंत्रिमंडल में सिर्फ एक महिला मंत्री बलजीत कौर हैं, जो 6.6% है.
इन आंकड़ों से यह पैटर्न पता चलता है कि जिन राज्यों में बेटियों की संख्या कम है, वहां की सत्ता में भी उनकी हिस्सेदारी बेहद सीमित है. एक्सपर्ट्स इसे महज इत्तिफाक नहीं, बल्कि सामाजिक सोच और सत्ता की संरचना का सीधा नतीजा मानते हैं.
किन राज्यों में नहीं है एक भी महिला मंत्री?
देश के 6 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं जहां मंत्रिमंडल में एक भी महिला मंत्री नहीं है:
- गोवा
- हिमाचल प्रदेश
- मेघालय
- सिक्किम
- अरुणाचल प्रदेश
- पुडुचेरी
इनमें से ज्यादातर छोटे राज्य हैं, लेकिन हिमाचल प्रदेश और गोवा जैसे विकसित राज्यों का इस सूची में होना चौंकाने वाला है. इसके अलावा, 9 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं जहां सिर्फ एक महिला मंत्री है, जिनमें दिल्ली भी शामिल है. दिल्ली में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता खुद इकलौती महिला मंत्री हैं.
इच्छाशक्ति से बदलती तस्वीर पर अपवाद क्या?
यह मान लेना गलत होगा कि कम लिंगानुपात ही महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी तय करता है. कुछ राज्य इस धारणा को तोड़ते हैं:

ये उदाहरण साबित करते हैं कि सत्ता में महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ जनसंख्या के आंकड़ों पर निर्भर नहीं करती. यह मुख्य रूप से राजनीतिक दलों की इच्छाशक्ति और समावेशी संस्कृति पर टिकी होती है.
मंत्रिमंडल में महिलाओं की भागीदारी बहाना या वजह?
भारत में महिलाओं की जनसंख्या और सत्ता में उनकी हिस्सेदारी के बीच एक गहरा संबंध तो दिखता है, लेकिन यह कोई अटल सच्चाई नहीं है. हरियाणा, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कम लिंगानुपात के साथ-साथ मंत्रिमंडल में भी महिलाओं की संख्या बेहद कम है. लेकिन पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्य यह साबित करते हैं कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो महिलाओं को सत्ता में बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है. 6 राज्यों में एक भी महिला मंत्री नहीं है और 9 राज्यों में सिर्फ एक महिला मंत्री है.
यह डेटा बताता है कि महिलाओं की कम संख्या सत्ता में कम हिस्सेदारी का बहाना भर है. असली वजह राजनीतिक दलों की मानसिकता और प्राथमिकताएं हैं. आखिरी सवाल यही है कि कब तक महिलाओं को सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया जाएगा और कब उन्हें सत्ता में असली हिस्सेदारी मिलेगी?























