केंद्र सरकार ने संसद को बताया कि पिछले पांच वर्षों में भारत ने विशेष निकासी अभियानों पर लगभग 216 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. इन अभियानों के ज़रिए यूक्रेन, सूडान, इज़राइल, ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और हैती जैसे संघर्षग्रस्त देशों में फंसे 32,000 से अधिक भारतीय नागरिकों को स्वदेश वापस लाया गया.

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विदेश मंत्रालय (MEA) ने बताया कि भारत ने 2021 में 'ऑपरेशन देवी शक्ति' के तहत अफ़ग़ानिस्तान से 669 लोगों को 1.90 करोड़ रुपये की लागत से निकाला था. 2022 में 'ऑपरेशन गंगा' के ज़रिए युद्धग्रस्त यूक्रेन से 18,282 भारतीयों को वापस लाया गया, जो पिछले पांच वर्षों में निकासी का सबसे बड़ा अभियान था. अकेले इस मिशन पर कुल खर्च का आधे से अधिक हिस्सा, यानी 116.58 करोड़ रुपये, खर्च हुआ.

2023 में भारत ने 'ऑपरेशन कावेरी' के तहत सूडान से 4,097 लोगों (जिनमें 136 विदेशी नागरिक भी शामिल थे) को 45.63 करोड़ रुपये खर्च करके निकाला. इज़राइल-हमास संघर्ष के दौरान 'ऑपरेशन अजय' के तहत 1,343 लोगों (जिनमें 14 OCI कार्डधारक और 20 विदेशी नागरिक शामिल थे) को 16.87 करोड़ रुपये की लागत से निकाला गया.

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2025 में 'ऑपरेशन सिंधु' के दौरान भारत ने 27.68 करोड़ रुपये खर्च करके ईरान से 3,597 भारतीय नागरिकों को निकाला. इसी ऑपरेशन के तहत इज़राइल से भी 818 भारतीयों को सुरक्षित बाहर लाया गया.

इसके अलावा, भारतीय दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों ने 2026 के पश्चिम एशिया संकट से प्रभावित देशों से 1,40,605 भारतीय नागरिकों की घर वापसी में मदद की. इसके लिए ट्रांज़िट वीज़ा, स्थानीय परिवहन, रहने की व्यवस्था, सीमा-पार आवाजाही और उड़ानों की मंज़ूरी जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं. इस तरह की सहायता से सबसे अधिक लोग कतर (1,00,000) और कुवैत (30,000) से वापस आए.

ऐसे में एक सवाल आपके मन में भी आता होगा कि आखिर सरकार विदेशों से भारतीयों को वापस कैसे लाती है? इसकी कानूनी प्रक्रिया क्या है? अगर कहीं युद्ध चल रहा है तो नागरिकों तक कैसे पहुंचा जाता है? ऐसे तमाम सवालों के जवाब आइए जानते हैं.

मुसीबत में फंसे नागरिकों को सुरक्षित वापस लाने का फैसला कौन लेता है?

कोई भी भारतीय नागरिक यदि किसी दूसरे देश में है और वहां युद्ध, गृहयुद्ध, प्राकृतिक आपदा, महामारी या किसी अन्य संकट की वजह से हालात भयावह हो जाते हैं, तो उसे सुरक्षित भारत वापस लाने का फैसला केंद्र सरकार करती है. इस प्रक्रिया में सरकार के कई मंत्रालय आपसी सहयोग से काम करते हैं.

सबसे महत्वपूर्ण भूमिका विदेश मंत्रालय की होती है. सबसे पहले मंत्रालय संबंधित देश में मौजूद भारतीय दूतावास से स्थिति की जानकारी लेता है. यह पता लगाया जाता है कि वहां कितने भारतीय फंसे हैं और उन्हें सुरक्षित वापस लाने में क्या-क्या बाधाएं आ सकती हैं.

यदि मामला बड़ा हो, जैसे युद्ध जैसी स्थिति हो, तो प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और केंद्रीय मंत्रिमंडल मिलकर आगे की रणनीति तय करते हैं. नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए विस्तृत योजना बनाई जाती है. प्रधानमंत्री और संबंधित मंत्रियों की मंज़ूरी के बाद अभियान शुरू किया जाता है.

ऐसे समय में रक्षा मंत्रालय और भारतीय सशस्त्र बलों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है. यदि नागरिकों को निकालने के लिए सैन्य विमानों या नौसेना के जहाज़ों की आवश्यकता हो, तो भारतीय वायुसेना और नौसेना को तैनात किया जाता है. उदाहरण के लिए ऑपरेशन राहत (यमन), ऑपरेशन गंगा (यूक्रेन) और ऑपरेशन देवी शक्ति (अफ़ग़ानिस्तान) में ऐसा किया गया था.

वहीं, नागरिक उड्डयन मंत्रालय एयरलाइंस और चार्टर्ड उड़ानों की व्यवस्था करता है.

युद्ध क्षेत्र में नागरिकों तक कैसे पहुंचा जाता है?

यदि किसी देश में युद्ध चल रहा हो और वहां भारतीय नागरिक फंसे हों, तो उन तक पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है. कोई भी देश अपने नागरिकों की सुरक्षा के नाम पर दूसरे देश में अपनी सेना नहीं भेज सकता. ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करना पड़ता है.

पूरी प्रक्रिया कुछ इस तरह होती है

-भारतीय विदेश मंत्रालय सबसे पहले संबंधित देश में मौजूद भारतीय दूतावास से संपर्क करता है.-भारतीय दूतावास वहां मौजूद नागरिकों का पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) करता है.-फोन, ईमेल, व्हाट्सऐप, सोशल मीडिया और हेल्पलाइन के ज़रिए लोगों की लोकेशन और उनकी स्थिति की जानकारी जुटाई जाती है.-सुरक्षित स्थान (Assembly Point) तय किए जाते हैं.-लोगों को निर्देश दिया जाता है कि वे किसी सुरक्षित होटल, स्कूल, दूतावास या तय स्थान पर पहुंचें.-कई बार नागरिकों को स्वयं भी सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करके इन स्थानों तक पहुंचना पड़ता है.-इसके बाद स्थानीय प्रशासन और सेना के साथ समन्वय किया जाता है.-भारत संबंधित देश की सरकार, सेना या संघर्ष में शामिल पक्षों से अस्थायी 'सेफ पैसेज' (Safe Passage) की अनुमति मांगता है.-कई मामलों में संयुक्त राष्ट्र (UN), रेड क्रॉस की अंतर्राष्ट्रीय समिति (ICRC) या अन्य मानवीय संगठनों की मदद ली जाती है.-जब रास्ता सुरक्षित घोषित किया जाता है, तब बसों या अन्य वाहनों के काफिलों के माध्यम से लोगों को सीमा या हवाई अड्डे तक पहुंचाया जाता है.-इन काफिलों का समय पहले से तय किया जाता है ताकि गोलीबारी से बचा जा सके.-यदि संबंधित देश का हवाई अड्डा बंद हो, तो लोगों को पड़ोसी देश की सीमा तक पहुंचाया जाता है.-वहां से भारतीय वायुसेना या चार्टर्ड विमानों के ज़रिए उन्हें भारत लाया जाता है.

ऐसा ही उदाहरण यूक्रेन (2022) में देखने को मिला था, जब भारतीय छात्रों को बसों के माध्यम से पोलैंड, रोमानिया, हंगरी और स्लोवाकिया की सीमाओं तक पहुंचाया गया. वहां से विशेष उड़ानों के ज़रिए उन्हें भारत वापस लाया गया.