धर्मांतरण विरोधी कानून के खिलाफ दाखिल याचिकाओं को हिंदू संगठन ने दी चुनौती, सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग
सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में राज्यों के धर्मांतरण विरोधी कानूनों को चुनौती देने वाले पक्षों से कहा था कि वे हाईकोर्ट्स से मामलों को शीर्ष अदालत में स्थानांतरित करने के लिए एक साझा याचिका दायर करें.

हिंदू संगठन अखिल भारतीय संत समिति ने गुरुवार (7 नवंबर, 2025) को सुप्रीम कोर्ट का रुख कर गैरकानूनी और जबरन धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए कई राज्यों में बनाए गए कानूनों के खिलाफ दायर याचिकाओं में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया.
एडवोकेट अतुलेश कुमार के माध्यम से दायर याचिका में उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2018, उत्तर प्रदेश विधि विरूद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021, हिमाचल प्रदेश धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम 2019 और मध्यप्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2021 सहित कई राज्यों में बनाये गए कानूनों के खिलाफ दायर याचिकाओं को चुनौती दी गई है.
सितंबर में, सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न हाईकोर्ट्स में लंबित याचिकाओं को अपने पास स्थानांतरित कर लिया था, जिनमें अंतर-धार्मिक विवाहों पर धर्म परिवर्तन को विनियमित करने वाले विवादास्पद कानूनों को चुनौती दी गई थी, जिनमें जमानत और लंबी सजा के लिए कड़े प्रावधान भी शामिल हैं.
अखिल भारतीय संत समिति की याचिका में याचिकाकर्ता को मामले में एक पक्षकार के रूप में शामिल करने और अदालत में लिखित रूप से अपनी बात रखने की अनुमति देने के निर्देश देने का अनुरोध किया गया है. संगठन ने दलील दी है कि किसी धर्म का प्रचार करने की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति को धर्मांतरण कराने का अधिकार नहीं देती है और कानून स्वतंत्र आधार पर स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन पर रोक नहीं लगाते हैं.
याचिका में कहा गया है कि ये कानून केवल उन धर्मांतरण कृत्यों को नियंत्रित करते हैं जो जबरन, धोखाधड़ी, प्रलोभन, अनुचित प्रभाव या दिखावटी विवाह द्वारा किए जाते हैं. याचिका में कहा गया है कि ये अधिनियम सद्भावनापूर्ण धर्मांतरण पर कोई पूर्व प्रतिबंध नहीं लगाते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में राज्यों के धर्मांतरण विरोधी कानूनों को चुनौती देने वाले पक्षों से कहा था कि वे हाईकोर्ट्स से मामलों को शीर्ष अदालत में स्थानांतरित करने के लिए एक साझा याचिका दायर करें. कोर्ट ने उल्लेख किया था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में कम से कम पांच, मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में सात, गुजरात और झारखंड हाईकोर्ट में दो-दो, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में तीन और कर्नाटक और उत्तराखंड हाईकोर्ट में एक-एक ऐसी याचिकाएं हैं.'
गुजरात और मध्यप्रदेश राज्यों की ओर से भी दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें धर्मांतरण पर उनके कानूनों के कुछ प्रावधानों पर रोक लगाने वाले संबंधित हाईकोर्ट्स के अंतरिम आदेशों को चुनौती दी गई थी.
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के धर्मांतरण विरोधी कानूनों के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था और दलील दी थी कि ये अंतर-धार्मिक जोड़ों को परेशान करने और उन्हें आपराधिक मामलों में फंसाने के लिए बनाए गए हैं.
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