भारत सरकार ने एक अहम फैसला लेते हुए हीटवेव (लू) और आकाशीय बिजली गिरने को अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की सूची में शामिल कर लिया है. इस फैसले के बाद राज्य सरकारें आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत राहत और बचाव कार्यों के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकेंगी.

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यह कदम राज्य सरकारों, नीति विशेषज्ञों, नागरिक समाज संगठनों, सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और जलवायु जोखिम वाले समुदायों की लंबे समय से चली आ रही मांग के बाद उठाया गया है.

हीटवेव से कितनी मौतें हुईं?

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सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1 मार्च से 26 जुलाई 2026 के बीच देश में हीटस्ट्रोक (लू लगने) से कम से कम 20 लोगों की मौत हुई. इनमें 11 मौतें महाराष्ट्र में दर्ज की गईं.

इसी अवधि में तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा, मध्य प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक सहित कई राज्यों में करीब 5,000 लोग हीटस्ट्रोक से प्रभावित हुए.

राहत के लिए मिलेगा फंड

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लोकसभा में एक लिखित जवाब में बताया कि 2026-31 की अवधि के लिए राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) के संचालन संबंधी दिशानिर्देशों में हीटवेव और आकाशीय बिजली को अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की सूची में शामिल किया गया है.

यह फैसला 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर लिया गया है. आयोग ने जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसम की घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता को देखते हुए इन दोनों आपदाओं को अधिसूचित करने की सिफारिश की थी.

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि अब SDRF और NDRF के माध्यम से राहत सहायता देने के लिए स्पष्ट नीतिगत ढांचा तैयार हो गया है. साथ ही, आपदा न्यूनीकरण कोष के तहत हीटवेव से बचाव और जोखिम कम करने वाली परियोजनाओं को भी वित्तीय सहायता मिल सकेगी.

पहले क्या व्यवस्था थी?

अब तक हीटवेव आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की सूची में शामिल नहीं थी. इस सूची में केवल 12 श्रेणियां थीं. उनके नाम हैं- चक्रवात, सूखा, भूकंप, आग, बाढ़, सुनामी, ओलावृष्टि, भूस्खलन, हिमस्खलन, बादल फटना, कीटों का हमला, पाला/शीत लहर.

अब क्या बदलेगा?

15वें वित्त आयोग ने हीटवेव को अधिसूचित आपदा घोषित करने के पक्ष में पर्याप्त आधार नहीं माना था. इसलिए राज्यों को अपने स्तर पर ही हीटवेव को अधिसूचित करना पड़ता था और वे राहत कार्यों के लिए SDRF के वार्षिक आवंटन का अधिकतम 10% ही खर्च कर सकते थे.

अब नए नोटिफिकेशन के बाद राज्य सरकारें स्टेट डिजास्टर रिस्पॉन्स एंड मिटिगेशन फंड का व्यापक रूप से उपयोग कर सकेंगी. यदि किसी बड़े संकट में राज्य का फंड पर्याप्त नहीं होगा, तो राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) से भी सहायता उपलब्ध कराई जा सकेगी.

भारत में हीटवेव और आकाशीय बिजली के प्रमुख आंकड़े

प्राकृतिक आपदाओं में सबसे अधिक मौतें

भारत में मौसम संबंधी प्राकृतिक आपदाओं में आकाशीय बिजली सबसे ज्यादा जानलेवा है. इससे हर वर्ष करीब 2,000 से 2,500 लोगों की मौत होती है, जो प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली कुल मौतों का 35% से अधिक है.

ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अधिक जोखिम

बिजली गिरने से होने वाली करीब 96% मौतें ग्रामीण क्षेत्रों में होती हैं. वहीं फसल सीजन के दौरान होने वाले कुल नुकसान का लगभग 77% भी ग्रामीण इलाकों में दर्ज किया जाता है. इसका सबसे अधिक असर खुले खेतों में काम करने वाले किसानों, खेतिहर मजदूरों और आदिवासी समुदायों पर पड़ता है.

हीटस्ट्रोक के बढ़ते मामले

मार्च से जुलाई 2026 के बीच सरकारी निगरानी प्रणाली में 4,853 से अधिक हीटस्ट्रोक के मामले दर्ज किए गए. कई राज्यों में हीटस्ट्रोक से मौतों की भी पुष्टि हुई, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ा.

आर्थिक नुकसान

बिहार और ओडिशा जैसे बिजली गिरने से सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में हर वर्ष राहत और मुआवजे के रूप में 12 से 15 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करने पड़ते हैं. इसके अलावा पशुधन, कृषि उत्पादन और बिजली ढांचे को भी भारी नुकसान होता है.

किन क्षेत्रों पर सबसे अधिक असर?

पूर्वी भारत और छोटा नागपुर पठार

ओडिशा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल आकाशीय बिजली से सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में शामिल हैं. यहां बंगाल की खाड़ी से आने वाली नम हवा और शुष्क स्थलीय हवा के टकराव से गहरे संवहनी बादल (Deep Convective Clouds) बनते हैं, जिससे बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ जाती हैं.

उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत

राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश हीटवेव के सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र हैं. यहां गर्मियों में तापमान अक्सर 45 से 48 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक पहुंच जाता है.

पश्चिमी और दक्कन क्षेत्र

महाराष्ट्र (विदर्भ और मराठवाड़ा), तेलंगाना और उत्तरी कर्नाटक दोहरी चुनौती का सामना करते हैं. यहां गर्मी की शुरुआत में भीषण लू चलती है, जबकि मॉनसून से पहले बनने वाले संवहनी तूफानों के कारण आकाशीय बिजली गिरने की घटनाएं भी अधिक होती हैं.

पूर्वोत्तर भारत

असम, मेघालय, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में प्रति वर्ग किलोमीटर आकाशीय बिजली गिरने की घटनाओं की आवृत्ति अधिक है. इसका कारण हिमालय की तलहटी में स्थित ऊंची ढलानों के कारण होने वाला ओरोग्राफिक लिफ्टिंग (Orographic Lifting) है, जो तेज संवहनी गतिविधियों को बढ़ावा देता है.