7 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान ने मक्का में एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते के तहत किसी भी एक सदस्य देश पर हुए सशस्त्र हमले को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा और वे मिलकर इसका जवाब देंगे. यह समझौता सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुई रणनीतिक रक्षा संधि का ही विस्तार है, जिसमें तुर्किए बाद में शामिल हुआ.

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इस संधि के बाद कतर, कुवैत, जॉर्डन और मिस्र जैसे देशों के इसमें शामिल होने की चर्चाएं तेज हो गईं. मिस्र के विदेश मंत्री बद्र अब्देलत्ती ने विधिक जांच के बाद शामिल होने के संकेत दिए, वहीं तुर्किए ने भी मिस्र को अपना अहम साझेदार बताया. हालांकि, मिस्र अभी इस समूह का हिस्सा नहीं बना है.

मिस्र क्यों बना रहा है दूरी?

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कागजी तौर पर मिस्र का इस समूह में आना बेहद मजबूत दिखता है. उसकी सेना अफ्रीका की सबसे ताकतवर सेनाओं में से एक है और स्वेज नहर पर उसका नियंत्रण वैश्विक व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. फिर भी मिस्र के हिचकिचाने के पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण हैं:

1. भारत के साथ रणनीतिक और आर्थिक हित

मजबूत आर्थिक साझेदारी: भारत और मिस्र के संबंध गुटनिरपेक्ष आंदोलन के समय से ही गहरे रहे हैं, जिन्हें 2023 में 'रणनीतिक साझेदारी' का रूप दिया गया. मिस्र में 700 से अधिक भारतीय कंपनियां सक्रिय हैं, जिनका कुल निवेश लगभग 5.5 अरब डॉलर है और वे हजारों स्थानीय लोगों को रोजगार देती हैं. वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों का आपसी व्यापार 6.5 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है.

सैन्य सहयोग: दोनों देशों की सेनाएं 'एक्सरसाइज साइक्लोन' जैसे संयुक्त सैन्य अभ्यासों में हिस्सा लेती हैं.

पाकिस्तान फैक्टर: इस गठबंधन में पाकिस्तान की मौजूदगी मिस्र के लिए चिंता का विषय है. भारत के साथ अपने आर्थिक और कूटनीतिक रिश्तों को प्राथमिकता देने के कारण मिस्र किसी ऐसे पाकिस्तान-केंद्रित रक्षा ब्लॉक में शामिल होने से बच रहा है, जिससे दिल्ली के साथ उसके संबंधों में खटास आए.

2. भू-राजनीतिक चुनौतियां और क्षेत्रीय संतुलन

इजराइल के साथ संबंध: मक्का समझौते का प्रमुख सदस्य पाकिस्तान, इजराइल को एक देश के रूप में मान्यता नहीं देता. इसके विपरीत, मिस्र और इजराइल के बीच दशकों पुराने शांति समझौते और मजबूत कूटनीतिक संबंध हैं.

खुद की संप्रभु नीति: विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के साथ रिश्ते इस फैसले का एकमात्र कारण नहीं हैं, बल्कि मिस्र अपनी विदेश नीति को किसी एक धड़े या विचारधारा वाले समूह के अधीन नहीं करना चाहता.

संक्षेप में कहें तो, मिस्र अपने राष्ट्रीय हितों, इजराइल के साथ कूटनीतिक संतुलन और भारत के साथ बढ़ते मजबूत आर्थिक-सामरिक रिश्तों को दांव पर लगाकर इस नए रक्षा ब्लॉक का हिस्सा बनने में फिलहाल जल्दबाजी नहीं दिखाना चाहता.

मिस्र अपनी रणनीतिक आज़ादी नहीं खोना चाहता

काहिरा के लिए बड़ी चिंता यह है कि वह किसी ऐसे मिलिट्री गुट में शामिल नहीं होना चाहता जो अलग-अलग क्षेत्रीय ताकतों के साथ आज़ादी से निपटने की उसकी क्षमता को सीमित कर दे. मिस्र के एक सीनियर राजनयिक ने 'मादा मस्र' को बताया कि काहिरा "सभी पक्षों के साथ संतुलित संबंध" बनाए रखना चाहता है और ऐसे क्षेत्रीय गठबंधनों का हिस्सा नहीं बनना चाहता जो उसकी विदेश नीति को सीमित कर सकें.

लंदन स्थित थिंक टैंक 'चैथम हाउस' के लिए लिखते हुए अहमद अबौदूह ने भी इसी तरह की बात कही कि मिस्र "गुटनिरपेक्षता को अपनाना चाहता है और किसी जाल में फंसने से बचने के लिए मिलिट्री गुटों से दूर रहना चाहता है."उन्होंने लिखा: "मक्का समझौते में शामिल होने से यह संकेत मिल सकता है कि मिस्र उन तीन सदस्यों के अलग-अलग भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ किसी एक पक्ष को चुन रहा है जिनमें ईरान और हूथी, इज़राइल, यूएई, ग्रीस, साइप्रस और भारत शामिल हो सकते हैं. इस तरह के गठबंधन से काहिरा के इन पक्षों के साथ संबंधों पर बुरा असर पड़ सकता है, जबकि इससे कोई खास फायदा भी नहीं होगा."

क्यों मक्का समझौता सऊदी, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच ही हुआ?

यह समझौता ऐसे तीन देशों को एक साथ लाता है जिनकी खूबियां अलग-अलग हैं, लेकिन एक-दूसरे की पूरक हैं.  सऊदी अरब आर्थिक संसाधन, रणनीतिक भौगोलिक स्थिति और ग्लोबल एनर्जी मार्केट में अपना प्रभाव लाता है.साथ ही, अपने घरेलू आर्थिक बदलाव से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और इन्वेस्टमेंट प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा करने की भी उसे बहुत ज़रूरत है. इस इलाके में बार-बार हुए हमलों और टकरावों ने दिखाया है कि अस्थिरता कितनी तेज़ी से उन लक्ष्यों के लिए खतरा बन सकती है.

तुर्किए के पास NATO की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है और उसका डिफेंस इंडस्ट्री तेज़ी से बढ़ रहा है, जो ड्रोन, मिसाइल, बख्तरबंद गाड़ियां और नेवल प्लेटफॉर्म बनाता है. इस समझौते में शामिल होने से देश को खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा में बड़ी भूमिका निभाने का मौका मिलता है, साथ ही हथियार बेचने, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और संयुक्त उत्पादन के अवसर भी पैदा होते हैं.

पाकिस्तान के पास एक बड़ी और अनुभवी सेना है, सऊदी अरब के साथ सुरक्षा के पुराने संबंध हैं और तुर्की के साथ करीबी डिफेंस संबंध हैं. यह नए समूह का एकमात्र परमाणु हथियार वाला सदस्य भी है. पाकिस्तान के लिए, यह समझौता इन्वेस्टमेंट ला सकता है, उसके डिफेंस इंडस्ट्री को सपोर्ट कर सकता है और दक्षिण एशिया से परे उसकी कूटनीतिक अहमियत को मज़बूत कर सकता है.

ऐसे में कहा जा रहा है कि ये समझौता इन्हीं तीन देशों के बीच इसलिए हुआ क्योंकि ये एक-दूसरे के अलग-अलग क्षेत्रों में पूरक हैं.