कर्नाटक में स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) प्रक्रिया के बाद लगभग 1.08 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने का खतरा मंडरा रहा है. इसके अलावा, यदि अगले चरण में मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ERO) के समक्ष आवश्यक दस्तावेज़ जमा नहीं कराए गए, तो 25 लाख और मतदाताओं के नाम सूची से बाहर हो सकते हैं.

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30 जून से 17 अगस्त तक चले घर-घर सत्यापन (Door-to-door enumeration) अभियान के बाद, 17 अगस्त की शाम 7 बजे तक 1,08,31,945 मतदाताओं (राज्य के कुल 5.54 करोड़ वोटरों का 19.54%) को ASDDO (अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, डुप्लिकेट एवं अन्य) श्रेणी में रखा गया है. वर्तमान में राज्य में कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 5,54,32,314 है.

इसके अतिरिक्त, कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय के अनुसार 25,14,247 मतदाताओं (4.54%) को "नो-मैपिंग" (No-Mapping) श्रेणी में रखा गया है.

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1. ASDDO आंकड़ों का श्रेणीवार विश्लेषण

श्रेणीमतदाताओं की संख्याप्रतिशत (%)
अनुपस्थित / पता न मिलने वाले (Absent)15,28,9852.76%
स्थाई रूप से स्थानांतरित (Shifted)65,61,60711.84%
मृत (Dead)16,38,8392.96%
डुप्लिकेट / पूर्व-रजिस्टर्ड (Duplicate)7,07,7921.28%
अन्य / हस्ताक्षर न करने वाले (Others)3,94,7220.71%
कुल ASDDO श्रेणी1,08,31,94519.54%

2. क्षेत्रीय वितरण (बेंगलुरु और अन्य जिले)

राज्य के कुल ASDDO मामलों में से 43.53% अकेले बेंगलुरु के चार शहरी संभागों से दर्ज किए गए हैं:

क्षेत्र / प्रभागASDDO मतदाताओं की संख्याकुल वोटरों का प्रतिशत (%)
बीबीएमपी साउथ (BBMP South)10,64,04449.61%
बीबीएमपी सेंट्रल (BBMP Central)8,66,40645.84%
बीबीएमपी नॉर्थ (BBMP North)10,58,10445.36%
बेंगलुरु शहरी (Bengaluru Urban)17,26,63442.94%
उडुपी (सबसे कम)63,3645.96%
हावेरी (दूसरा सबसे कम)1,15,0688.62%

3. 1 करोड़ से अधिक वोटरों के ASDDO श्रेणी में आने के 4 मुख्य कारण

  1. आबादी की बड़े पैमाने पर आवाजाही और पलायन: बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में लोगों के घर बदलने और विवरण अपडेट न कराने से 40–50% वोटर अनुपस्थित या स्थानांतरित दर्ज हुए. ग्रामीण क्षेत्रों से दिहाड़ी मजदूरों के मौसमी पलायन ने भी यह संख्या बढ़ाई.

  2. जागरूकता की कमी व 2002 रिकॉर्ड की उलझन: मौजूदा पंजीकरण को 2002 की वोटर लिस्ट से जोड़ना अनिवार्य था. लोगों को पुराने रिकॉर्ड ढूंढने में दिक्कत हुई, और केवल कन्नड़ भाषा वाले फ़ॉर्म व 'प्रोजेनी मैपिंग' जैसे जटिल शब्दों को समझने में परेशानी आई.

  3. तकनीकी दिक्कतें और कम समय: बूथ लेवल ऑफ़िसर्स (BLOs) पर कम समय का दबाव था और डेटा इकट्ठा करने वाले ऐप में तकनीकी गड़बड़ियां आईं. स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव में फ़ॉर्म भरने में चूक हुई.

  4. सत्यापन नियम ( गैर-हस्ताक्षर): सत्यापन के दौरान अस्थायी रूप से अनुपस्थित रहने पर अधिकारियों ने मौके पर जांच (महाज़र) कर उन्हें 'स्थानांतरित' घोषित कर दिया. इसके अलावा, फ़ॉर्म पर हस्ताक्षर न करने वालों को 'अन्य' श्रेणी में डाला गया.

4. ड्राफ्ट सूची, दावे और आपत्तियां (आगे का चरण)

  • ड्राफ्ट वोटर लिस्ट प्रकाशन: ड्राफ्ट वोटर लिस्ट प्रकाशित की जाएगी. ASDDO श्रेणी में शामिल लोगों और जिन्होंने गणना फ़ॉर्म पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, उनके नाम ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं किए जाएंगे.

  • नो-मैपिंग श्रेणी: इस श्रेणी के लोगों को ड्राफ्ट सूची में शामिल किया जाएगा, लेकिन उन्हें नोटिस भेजकर ERO के पास 12 मान्य दस्तावेजों में से कोई एक जमा कराने के लिए कहा जाएगा.

  • दावे और आपत्तियां दर्ज कराना: SIR अभ्यास के अगले चरण में दावे और आपत्तियां दर्ज कराई जा सकेंगी. जिन नागरिकों के नाम सूची से हट गए हैं, वे मतदाता सूची में पुन: नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 (नया पंजीकरण) भर सकते हैं.

  • सुधार के आवेदन: जो लोग अपनी जानकारी में संशोधन कराना चाहते हैं, वे फ़ॉर्म-8 भर सकते हैं. अब तक 4.28 लाख मतदाताओं ने नाम जुड़वाने के लिए फ़ॉर्म-6 और 8.68 लाख लोगों ने सुधार के लिए फ़ॉर्म-8 जमा किया है.

  • मतदाता सहायता एवं आधिकारिक निर्देशअपनी मतदाता स्थिति की जांच करने या किसी भी प्रकार के आवेदन/सुधार के लिए आप आधिकारिक निर्वाचन आयोग पोर्टल का उपयोग कर सकते हैं. मतदाता सेवाएं देखने और आवेदन के लिए आधिकारिक Voters' Service Portal का उपयोग करें. राज्य स्तर के  आधिकारिक अपडेट्स के लिए CEO Karnataka Portal पर जा सकते हैं.

    क्या कर्नाटक में 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (SIR) प्रक्रिया में चूक हुई है? 

    इस विषय पर नागरिक समाज और प्रभावित मतदाताओं के बीच बहस जारी है. एक तरफ प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि 1.08 करोड़ से अधिक नामों का ASDDO श्रेणी में जाना बड़े पैमाने पर शहरी प्रवासन, पते में बदलाव और दोहरे पंजीकरण जैसी स्वाभाविक वजहों से हुआ है. वहीं दूसरी तरफ, जानकारों का मानना है कि बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) के पास बेहद कम समय होना, ऐप में तकनीकी गड़बड़ियां, केवल कन्नड़ भाषा के फॉर्म और 'प्रोजेनी मैपिंग' जैसी जटिल शर्तों के कारण भी बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाता सूची से बाहर छूट गए हैं.