8 अक्टूबर को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को एक एडवाइजरी जारी की. इसमें कंपनियों से कहा गया कि वे अधिकृत सरकारी एजेंसियों की उन शिकायतों को प्राथमिकता दें, जो ऐसे कंटेंट से जुड़ी हों जिनसे देश में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है. यह एडवाइजरी ऐसे समय में आई है जब मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर देश के प्रमुख शहरों में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं. हालांकि अधिकारियों का कहना है कि यह एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन इससे यह चर्चा तेज हो गई है कि विरोध-प्रदर्शनों या संकट के समय सरकार इंटरनेट और सोशल मीडिया कंटेंट पर किस तरह नियंत्रण रखती है.

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भारत सरकार के पास सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से किसी भी पोस्ट या अकाउंट को ब्लॉक या टेकडाउन करवाने के मुख्य रूप से दो कानूनी रास्ते हैं.

पहला रास्ता है सेक्शन 69A 

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IT एक्ट की धारा 69A केंद्र सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के हित में इंटरनेट सामग्री को ब्लॉक करने का सीधा अधिकार देती है. सरकार इस धारा का इस्तेमाल केवल विशिष्ट परिस्थितियों में कर सकती है जैसे भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मित्रवत संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना, या इन मामलों से जुड़े किसी संज्ञेय अपराध के उकसावे को रोकना.

यह आदेश केवल 'ब्लॉकिंग रूल्स, 2009' के तहत ही जारी किया जा सकता है. मंत्रालयों या राज्य सरकारों से आने वाले अनुरोधों की जांच अधिकारियों की एक विशेष समिति करती है. संबंधित प्लेटफॉर्म या यूजर को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है और IT सेक्रेटरी की अंतिम मंजूरी के बाद ही आदेश जारी होता है. इसके अतिरिक्त, एक कैबिनेट स्तरीय समीक्षा समिति हर दो महीने में इन आदेशों की कानूनी वैधता की जांच करती है.

वर्ष 2015 के ऐतिहासिक 'श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 66A को असंवैधानिक मानकर रद्द कर दिया था, लेकिन धारा 69A को सही ठहराया था. अदालत ने माना था कि धारा 69A में लिखित कारण दर्ज करने और अदालती समीक्षा जैसे प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय मौजूद हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत अभिव्यक्ति की आजादी पर तर्कसंगत प्रतिबंध लगाते हैं.

हाल ही में सरकार ने इसी धारा का प्रयोग करते हुए मैसेजिंग ऐप 'Bitchat' को सुरक्षा कारणों से ब्लॉक किया था. हालांकि, ब्लॉकिंग नियमों के नियम 16 के तहत इन आदेशों की गोपनीयता को लेकर डिजिटल राइट्स संगठनों (जैसे इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन) द्वारा सवाल भी उठाए जाते रहे हैं.

दूसरा रास्ता सेक्शन 79 और 'टेकडाउन नोटिस'

IT एक्ट की धारा 79 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को "सेफ हार्बर" का संरक्षण प्रदान करती है. इसका मतलब है कि अगर कोई यूजर प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक या अवैध सामग्री पोस्ट करता है, तो उसके लिए सोशल मीडिया कंपनी को सीधे ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

धारा 79(3)(b) के तहत, यदि किसी प्लेटफॉर्म को सरकार या अदालत द्वारा सूचित किया जाता है कि उसके प्लेटफॉर्म पर कोई सामग्री गैर-कानूनी है, और वह प्लेटफॉर्म उसे तुरंत नहीं हटाता, तो उसका 'सेफ हार्बर' सुरक्षा कवच खत्म हो जाता है. इसका मतलब है कि कंपनी पर भी कानूनी मुकदमा चलाया जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि धारा 79 के तहत टेकडाउन नोटिस तभी मान्य होंगे जब वे अदालत के आदेश पर आधारित हों या सरकार द्वारा अधिसूचित हों और वे अनुच्छेद 19(2) के आधारों के दायरे में आते हों.

न्यायिक चुनौती (X बनाम भारत सरकार)

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) ने इस रास्ते को कर्नाटक उच्च न्यायालय में चुनौती दी. X का तर्क था कि कंटेंट ब्लॉकिंग का एकमात्र कानूनी जरिया धारा 69A होना चाहिए और धारा 79(3)(b) का इस्तेमाल एक समानांतर या अनियंत्रित रास्ते के रूप में नहीं किया जा सकता. हालांकि, अदालत ने X की याचिका खारिज कर दी, जिसके खिलाफ अब अपील लंबित है.

'सहयोग पोर्टल' और संशोधनों की नई समय-सीमा

धारा 79 के क्रियान्वयन को आसान बनाने के लिए गृह मंत्रालय के तहत 'इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर' (I4C) ने 'सहयोग पोर्टल' की शुरुआत की.

यह एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म है जिसके जरिए कानून लागू करने वाली एजेंसियां सीधे सोशल मीडिया कंपनियों को IT नियमों के तहत टेकडाउन नोटिस भेजती हैं. गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन और टेलीग्राम जैसे दर्जनों इंटरमीडियरीज़ इससे जुड़ चुके हैं.

अधिकारों का दुरुपयोग रोकने के लिए नियम संशोधन

शुरुआत में निचले स्तर के पुलिस अधिकारियों द्वारा भी टेकडाउन नोटिस भेजे जाने पर विवाद खड़ा हुआ था. इसके बाद सरकार ने IT नियमों (रूल 3(1)(d)) में महत्वपूर्ण संशोधन किए, जो 1 नवंबर 2025 से प्रभावी हुए. अब केवल संयुक्त सचिव, निदेशक स्तर के सिविल अधिकारी या पुलिस में डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (DIG) या उससे ऊपर के अधिकारी ही ऐसे टेकडाउन नोटिस जारी कर सकते हैं. इसके अलावा, सचिव स्तर के अधिकारी हर महीने इन आदेशों की समीक्षा करते हैं.

संशोधित IT नियमों के तहत, प्लेटफॉर्म्स के लिए सरकारी टेकडाउन आदेशों का पालन करने की समय-सीमा को बेहद सख्त कर दिया गया है. सामान्य टेकडाउन आदेशों पर कंपनियों को 3 घंटे के भीतर कार्रवाई करनी होती है, जबकि नग्नता, यौन सामग्री या किसी का रूप धरने से जुड़ी शिकायतों पर 2 घंटे के भीतर सामग्री हटानी अनिवार्य है.

सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और देश की सुरक्षा/कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना हमेशा से एक जटिल चुनौती रहा है. जहां धारा 69A एक लंबी और प्रक्रियात्मक सुरक्षा वाली प्रणाली है, वहीं धारा 79 और 'सहयोग पोर्टल' सरकार को आपातकालीन या तेजी से बदलते विरोध-प्रदर्शनों के दौरान त्वरित कार्रवाई की शक्ति प्रदान करते हैं. डिजिटल युग में इन कानूनों का दायरा और उनकी न्यायसंगतता भारतीय अदालतों में बहस का एक प्रमुख विषय बनी हुई है.