Xप्लेन: वैश्विक तनाव के बीच दिल्ली में जुटेंगे दुनिया के दिग्गज; ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से क्या हैं बड़ी उम्मीदें
इस समूह में अब ईरान के साथ-साथ सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी के बड़े ऊर्जा उत्पादक देश भी शामिल हैं, जिनकी रणनीतिक सोच एक-दूसरे से अलग है.

जब नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स लीडर्स समिट के लिए रेड कार्पेट बिछ रहा है, तब भारत के सामने अब तक की सबसे बड़ी और नाज़ुक कूटनीतिक चुनौती है. रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में हो रहे संघर्षों के बीच, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन जैसे नेताओं की मेज़बानी करना बेहद सूझबूझ का काम है. इस बार का सम्मेलन सिर्फ आपसी आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी असली परीक्षा यह होगी कि क्या दुनिया के बंटे होने के बावजूद यह बड़ा गठबंधन किसी आम सहमति पर पहुंच पाता है या नहीं.
दो युद्धों का साया
ब्रिक्स अध्यक्ष के रूप में भारत के सामने एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है. यूरोप और मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) में चल रहे युद्धों और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर मंडराते खतरों के बीच भारत को अलग-अलग देशों के हितों में संतुलन बनाना होगा. इस समूह में अब ईरान के साथ-साथ सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी के बड़े ऊर्जा उत्पादक देश भी शामिल हैं, जिनकी रणनीतिक सोच एक-दूसरे से अलग है.
भारत के अमेरिका और पश्चिम एशियाई देशों के साथ अच्छे संबंध हैं, इसलिए उसके लिए इन विरोधी हितों को संभालना बहुत जरूरी है. भारतीय वार्ताकारों की सबसे बड़ी चुनौती 'नई दिल्ली घोषणापत्र' पर सबकी सहमति बनाना है, ताकि युद्धों की वजह से शिखर सम्मेलन का मुख्य विकास एजेंडा न रुके. उम्मीद है कि नेता खून-खराबा रोकने के लिए बातचीत पर जोर देंगे.
ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक जोखिम युद्धों का असर सीधे तौर पर वैश्विक ऊर्जा बाजार, सप्लाई चेन और महंगाई पर पड़ता है. फारस की खाड़ी में शिपिंग रुकने से आयात का खर्च बढ़ सकता है और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था बिगड़ सकती है. यही वजह है कि ऊर्जा सुरक्षा इस समिट का सबसे अहम मुद्दा बन गया है. इससे निपटने के लिए ब्रिक्स सदस्य इन उपायों पर ध्यान दे रहे हैं-
भुगतान के वैकल्पिक तरीके: पश्चिमी देशों के वित्तीय नेटवर्क से बचने के लिए स्थानीय मुद्राओं (लोकल करेंसी) में व्यापार बढ़ाना.
-मजबूत सप्लाई नेटवर्क: तेल, खाने-पीने की चीजों और जरूरी खनिजों के लिए ऐसे ट्रेड कॉरिडोर बनाना जिन पर प्रतिबंधों या युद्ध का असर न हो.
-संस्थागत वित्तपोषण: न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) को ऐसी वित्तीय मदद देने के लिए मजबूत करना जिस पर भू-राजनीतिक शर्तें न हों.
भू-राजनीतिक कूटनीति और द्विपक्षीय बैठकें बहुपक्षीय प्रस्तावों के अलावा, यह समिट द्विपक्षीय कूटनीति के लिए भी बड़ा मंच है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बैठकें बेहद खास हैं.
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद भारत आ रहे हैं, जो दोनों देशों के रिश्तों को सुधारने और सीमा विवाद को संभालने की कोशिश का संकेत है. इसके अलावा, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन के साथ बातचीत मध्य पूर्व के तनाव के बीच हो रही है, जिससे भारत एक ऐसे देश के रूप में उभर रहा है जो विरोधी देशों के बीच भी बातचीत कराने की क्षमता रखता है.
नई दिल्ली समिट से क्या उम्मीदें हैं
जब दो दिन की बातचीत 'नई दिल्ली घोषणापत्र' को अपनाने के साथ खत्म होगी, तो उम्मीद है कि समिट से भारत की मुख्य थीम-"मजबूती, इनोवेशन, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण" पर आधारित ठोस नतीजे निकलेंगे.
डिजिटल व्यापार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में सहयोग, छोटे और मध्यम उद्यमों (MSME) के विकास और आपदाओं से निपटने की संयुक्त क्षमता पर ठोस रूपरेखा की उम्मीद है. आखिरकार, भले ही यूरोप और पश्चिम एशिया पर युद्ध के बादल मंडरा रहे हों, भारत का नेतृत्व ब्रिक्स को सिर्फ़ एक पश्चिमी-विरोधी क्लब बनने से बचाने और इसे ग्लोबल साउथ की आर्थिक आज़ादी और लंबे समय की स्थिरता के लिए एक व्यावहारिक और पूरक इंजन के तौर पर नया रूप देने का लक्ष्य रखता है.




















