चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा है कि देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR कराने का फैसला तीनों चुनाव आयुक्तों ने मिलकर लिया था. आयोग के अनुसार, 24 जून 2025 को लिए गए इस फैसले पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी के बीच कोई मतभेद नहीं था.

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यह हलफनामा ऐसे समय दाखिल किया गया है, जब SIR की प्रक्रिया और आयोग के कामकाज को लेकर सवाल उठाए गए हैं. आयोग ने कहा कि फाइलों पर अधिकारियों या आयुक्तों की ओर से दर्ज सवालों, सुझावों और टिप्पणियों को अंतिम फैसले से असहमति नहीं माना जा सकता. 

गोवा में 97 मतदाताओं के नाम का मामला

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गोवा में 97 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं होने के मामले पर भी आयोग ने सफाई दी है. आयोग के मुताबिक, बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) की घर-घर जांच में पाया गया कि 88 लोग नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म 6 भर चुके थे, छह लोग विदेश में थे और तीन लोगों के पास पुर्तगाल का पासपोर्ट था. आयोग ने कहा कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया तय नियमों के अनुसार होती है. किसी का नाम केवल निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) के आदेश के बाद ही जोड़ा या हटाया जा सकता है. 

फॉर्म 6 में बदलाव के आरोप पर क्या कहा?

फॉर्म 6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नया नाम जुड़वाने के लिए आवेदन करने में किया जाता है. चुनाव आयोग ने कहा है कि इस फॉर्म में कोई बदलाव नहीं किया गया है. आयोग के मुताबिक, नियमों के तहत निर्धारित फॉर्म में बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है. SIR के दौरान आवेदन के साथ माता-पिता या दादा-दादी की पुरानी मतदाता सूची से जुड़ी जानकारी मांगने वाला अलग घोषणा-पत्र ऑनलाइन पोर्टल पर दिखाया जा रहा था. आयोग ने माना कि ऑनलाइन इसकी प्रस्तुति से ऐसा लग सकता था कि फॉर्म 6 में बदलाव किया गया है. आयोग के अनुसार, 21 अक्टूबर से ऑनलाइन आवेदन में फॉर्म 6 और घोषणा-पत्र को अलग-अलग कर दिया गया है.

SIR के फैसलों पर तीनों आयुक्तों की सहमति का दावा

आयोग ने कहा कि SIR से जुड़े तीन प्रमुख आदेश 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को सर्वसम्मति से लिए गए थे. आयोग के अनुसार, किसी फाइल पर विचार के दौरान दर्ज टिप्पणी या सवाल को आयोग का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता.