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दिल्ली के लालकिले से फतेहपुर सीकरी तक, मुगल बादशाह अकबर कैसे मनाता था दिवाली?

दिवाली का इतिहास मुगल काल तक जाता है, जब अकबर और मुहम्मद शाह ने इसे शाही महलों में जश्न-ए-चिरागा के रूप में मनाया. यह पर्व धर्म और संस्कृति से परे, रोशनी और एकता का प्रतीक था.

जब दिवाली की बात आती है तो आंखों के सामने दीयों की कतारें, चमकते बाजार और मिठाइयों की खुशबू उभर आती है. आज का भारत आधुनिक लाइटों से जगमगा उठता है, लेकिन सदियों पहले भी जब बिजली का नामोनिशान नहीं था, दिवाली की रौनक उतनी ही खास थी. इतिहास यह बताता है कि इस त्योहार की खुशबू मुगल दरबारों तक भी पहुंची थी. जिन बादशाहों को अक्सर इस्लामी अनुशासन के लिए जाना जाता था, उनके महलों की दीवारें दिवाली की रात दीयों से जगमग रहती थीं.

उस समय दिवाली केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि संस्कृतियों के मेल का प्रतीक बन चुकी थी. सम्राट अकबर से लेकर मुहम्मद शाह तक ने इस त्योहार को अपनी शाही परंपरा में शामिल किया. मुग़ल सल्तनत में इसे नया नाम दिया गया ‘जश्न-ए-चिरागा’, यानी दीपों का महोत्सव.

दिवाली के मौके पर लगते थे विशेष दरबार

अकबर का दौर न केवल मुगल शासन का स्वर्णयुग था, बल्कि सांस्कृतिक सह-अस्तित्व का भी दौर था. उन्होंने हिंदू रीति-रिवाज अपनाने में कभी झिझक नहीं दिखाई. आगरा के किले और फतेहपुर सीकरी की गलियों में दिवाली के समय हर कोना दीयों की कतारों से जगमग उठता था. इतिहासकार अबुल फजल ने ‘आइन-ए-अकबरी’ में लिखा है कि अकबर दिवाली के मौके पर विशेष दरबार लगाते थे. दीयों से सजा महल के प्रांगण में शाही भोज होता था, जिसमें हिंदू और मुस्लिम दरबारी साथ बैठते थे. उनके दरबारी बीरबल और बेगम जोधाबाई इस आयोजन की आत्मा माने जाते थे.

वर्तमान में दिवाली जिस रूप में पटाखों और आतिशबाजी के साथ मनाई जाती है, उसकी शुरुआत मुगल काल से ही हुई थी. 18वीं-19वीं शताब्दी में बंगाल और अवध के नवाबों ने दुर्गा पूजा और दिवाली जैसे त्योहारों को संरक्षण दिया और आतिशबाजी का शानदार आयोजन किया. डॉ. कैथरीन बटलर स्कोफील्ड के अनुसार 18वीं सदी तक दिवाली पर आतिशबाजी आम हो चुकी थी. कुछ उलेमाओं ने इस उत्सव का विरोध किया और इसे गैर-इस्लामी कहा, लेकिन अकबर ने इसे प्रेम और प्रकाश का पर्व मानकर अपनाया. उनके लिए यह त्योहार धार्मिक रिवाज से बढ़कर एकता और समरसता का प्रतीक था.

1720-1748 के बीच, मुहम्मद शाह रंगीला के शासनकाल में दिवाली का जश्न शाही अंदाज में मनाया जाने लगा. दिल्ली और आगरा के महलों में हफ्तों पहले से तैयारियां शुरू होती थीं. किले के चारों ओर असंख्य दीप जलाए जाते थे और मिठाइयों की खुशबू पूरे दरबार में फैल जाती थी.

शाहजहां ने दिवाली को और भव्य बनाया

सम्राट शाहजहां ने दिल्ली को राजधानी बनाकर लाल किला बनवाया और दिवाली को और भव्य बनाया. उन्होंने आकाश दीया जलाने की परंपरा शुरू की. लाल किले में 40 गज ऊंचे खंभों पर विशाल दीप प्रज्वलित किए जाते थे, जिसकी रोशनी पूरे चांदनी चौक में फैल जाती थी. दीयों, झूमरों और चिरागदानों से महल सजता, दरबार में संगीत और कवि सभाएं होतीं और बादशाह बालकनी से रोशनी का नजारा देखते.

औरंगजेब के शासनकाल में दिवाली का आयोजन औपचारिक रह गया. वह इसे हिंदू राजाओं की परंपरा मानते थे. फिर भी, जोधपुर और जयपुर के शाही परिवार हर साल दिवाली पर तोहफे भेजते और लोग घरों में दीप जलाना जारी रखते थे.

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