दिल्ली में सीजेपी आंदोलन के बीच देश के 124 पूर्व आईएएस-आईएफएस ने देश के नाम एक ओपन लेटर जारी कर चुनाव आयोग (EC) और एसआईआर का बचाव किया. इस लेटर में कहा गया कि चुनाव में अगर धांधली हुई है तो विश्वसनीय सबूत पेश किया जाना चाहिए. चुनावी प्रक्रिया में सुरक्षा उपायों पिछले चुनाव परिणामों और बिहार के 2025 विधानसभा चुनावों के आंकड़ों का हवाला देते हुए इन अधिकारियों ने EC की विश्वसनीयता और एसआईआर सवाल उठाने वालों को चुनौती दी है.

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अधिकारियों ने कहा कि भारत की चुनावी प्रणाली बूथ कैप्चरिंग, मतपेटियों में हेराफेरी और चुनावी हिंसा से आगे बढ़ चुकी है. लेटर में मौजूदा चुनाव प्रणाली में सुरक्षा का जिक्र किया गया, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की सीलिंग, स्ट्रांग-रूम सुरक्षा और मतदाता-सत्यापित पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) सत्यापन शामिल हैं. अधिकारियों ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों का जिक्र करते हुए कहा कि इन चुनावों में दोबारा मतदान नहीं हुआ और 1951 के बाद से सबसे अधिक मतदान हुआ.

पूर्व नौकरशाहों ने SIR का बचाव किया

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पूर्व अधिकारियों ने सवाल उठाया कि जब कोई दल चुनाव जीतता है तो वही प्रणाली निष्पक्ष मान ली जाती है, लेकिन हारने पर उसी व्यवस्था को 'फिक्स्ड' या 'रिग्ड' बता दिया जाता है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि इसी चुनाव आयोग के तहत केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी ने हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में चुनाव हारे हैं और 2024 में अपना बहुमत भी खोया है. 

पत्र में कहा गया है कि असली 'धांधली' क्या होती है, यह उस दौर के अधिकारियों ने देखा है जब कट्टे, बाहुबलियों का खौफ, बैलेट बॉक्स की लूट और बूथ कैप्चरिंग हुआ करती थी. 1989 में संसद ने इसे अपराध घोषित किया. पत्र में बिहार के 2025 चुनावों का जिक्र करते हुए कहा गया कि पहली बार वहां बिना किसी री-पोल के शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न हुए, जिसमें 1951 के बाद से सबसे ज्यादा मतदान हुआ और महिलाओं ने रिकॉर्ड संख्या में वोट डाले.

पूर्व नौकरशाहों ने कहा, 'लोकतंत्र में सवाल उठाना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन आरोप को साबित करना आरोप लगाने वाले का कर्तव्य होता है. प्रेस कॉन्फ्रेंस करके हवा में लगाए गए आरोपों को न तो परखा जा सकता है और न ही उनका जवाब दिया जा सकता है. अगर किसी को आपत्ति है तो वह शपथ पत्र के साथ चुनाव याचिका दायर करे.

बिहार में हुए SIR का जिक्र करते हुए पत्र में बताया गया कि 2003 के बाद से बिहार के वोटर लिस्ट को दुरुस्त नहीं किया गया था. जांच में करीब 22 लाख मृत मतदाता, 7 लाख डुप्लीकेट नाम और लाखों स्थायी रूप से बाहर जा चुके लोग पाए गए. वोटर लिस्ट को साफ करना फर्जीवाड़े को रोकना है, किसी का अधिकार छीनना नहीं. हटाए गए नामों की प्रक्रिया पारदर्शी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी उचित ठहराया और 27 मई 2026 को आयोग के अधिकारों को बरकरार रखा.

बूथ लेवल अफसरों (BLO) के समर्थन में अपील

लेटर में जनता से अपील की गई कि घर-घर जाकर मेहनत करने वाले आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, शिक्षकों और बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) के ईमानदारी से किए गए काम पर बिना सबूत 'फर्जीवाड़े' का थप्पा न लगाएं. बिना सबूतों के जनता के मन में यह भ्रम पैदा करना कि 'उनका वोट बेकार गया' लोकतंत्र को कमजोर करने और राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश मात्र है.