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Xप्लेन: देशभर में कितने मकान जर्जर स्थिति में? हर साल जाती हैं 1500 जिंदगियां, देखें आंकड़ें

सत्या निकेतन की घटना कोई अकेली त्रासदी नहीं है, बल्कि यह भारत की बदहाल शहरी बुनियादी संरचना और जर्जर इमारतों के उस विशाल संकट का एक खौफनाक प्रतीक है जहां सुरक्षा मानकों की अनदेखी भारी पड़ रही है.

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के पॉश इलाके सत्या निकेतन में एक पांच मंजिला पुरानी इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह गई, जिसमें दबकर कई लोगों की मौत हो गई और कई गंभीर रूप से घायल हो गए. यह दर्दनाक हादसा देश के शहरी क्षेत्रों में मंडराते उस मौन खतरे की बानगी है, जिससे हर साल मानसून के दस्तक देते ही लाखों लोग जूझने को मजबूर होते हैं. सत्या निकेतन की घटना कोई अकेली त्रासदी नहीं है, बल्कि यह भारत की बदहाल शहरी बुनियादी संरचना और जर्जर इमारतों के उस विशाल संकट का एक खौफनाक प्रतीक है, जहां सुरक्षा मानकों की अनदेखी, अवैध निर्माण और प्रशासन की घोर लापरवाही इंसानी जिंदगियों पर भारी पड़ रही है. आइए देखते हैं कि देश भर में जर्जर मकानों की स्थिति, दुर्घटनाओं के आंकड़े और दिल्ली का परिदृश्य क्यों बेहद चिंताजनक है.

1. देश में मकानों की भौतिक स्थिति: जनगणना और एनएसओ (NSO) का सच

भारत में जर्जर मकानों की स्थिति को समझने के लिए दो प्रमुख सरकारी सर्वेक्षणों का संदर्भ लेना आवश्यक है. पहला, भारत की आधिकारिक जनगणना और दूसरा, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा किया गया सर्वेक्षण.

2011 की जनगणना के अनुसार, संपूर्ण देश की प्रत्येक इमारत का ब्योरा एकत्र किया गया था, जिसमें यह बात सामने आई थी कि भारत में कुल मकानों का 5.3% हिस्सा (लगभग 1.32 करोड़ मकान) अत्यंत 'जर्जर' अवस्था में है. इनमें से बड़ा हिस्सा यानी लगभग 1.09 करोड़ मकान ग्रामीण क्षेत्रों में और करीब 23 लाख मकान शहरी क्षेत्रों में स्थित पाए गए थे.

समय के साथ स्थिति में आए बदलावों को मापने के लिए राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा कराया गया 76वां दौर का नेशनल सैंपल सर्वे काफी महत्वपूर्ण आंकड़े पेश करता है. "भारत में आवास, पेय जल, स्वच्छता" शीर्षक वाले इस विस्तृत सर्वे के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं

-मकानों की भौतिक स्थिति: सर्वे के अनुसार, ग्रामीण भारत में लगभग 4.8% परिवार और शहरी भारत में केवल 2% परिवार ही ऐसे मकानों में रह रहे थे जिनकी हालत 'खराब/बदहाल' श्रेणी में दर्ज की गई. इसके विपरीत, ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 54.2% मकान और शहरी क्षेत्रों में 68.5% मकान 'अच्छी स्थिति' में पाए गए, जबकि शेष को 'संतोषजनक' श्रेणी में वर्गीकृत किया गया.

-पक्के और कच्चे मकानों का अनुपात: सरकारी योजनाओं और पक्के निर्माणों के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ा सुधार देखा गया, जहां पक्के मकानों का दायरा बढ़कर 76.7% तक पहुंच गया. वहीं अर्ध-पक्के मकान 13.5% और कच्चे मकान घटकर केवल 9.8% रह गए. शहरी भारत की बात करें तो शहरों में 96% परिवार 'पक्के' मकानों में रह रहे थे, जबकि केवल 3.8% अर्ध-पक्के और 0.2% कच्चे मकान दर्ज किए गए.

-स्वामित्व और किराएदार: आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले 91.3% परिवारों के पास अपने खुद के मकान थे, जबकि शहरों में यह आंकड़ा 68.3% रहा. इसके अलावा, शहरों में 26.7% परिवार किराए के मकानों में रह रहे थे, जबकि ग्रामीण भारत में किराए पर रहने वालों की संख्या मात्र 3% दर्ज की गई.

एनएसओ का यह सैंपल सर्वेक्षण यह तो दर्शाता है कि बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ है, लेकिन देश के विशाल आकार को देखते हुए आज भी लाखों लोग कमजोर और जोखिम भरे ढांचों के नीचे रहने को मजबूर हैं.

2. देशव्यापी हादसे और मौतों के आंकड़े

इमारतों के ढहने से होने वाले हादसों का रिकॉर्ड रखने वाली संस्था 'राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो' (NCRB) की वार्षिक रिपोर्ट  देश में 'स्ट्रक्चर कोलेप्स' की खौफनाक तस्वीर सामने रखती है.

-वार्षिक दुर्घटनाएं: भारत में हर साल औसतन 1,200 से 1,600 इमारतें या ढांचे ढहने के हादसे आधिकारिक तौर पर दर्ज होते हैं.

-जान-माल का नुकसान: इन हादसों में हर साल औसतन 1,200 से 1,500 निर्दोष लोगों की जान चली जाती है.

-आवासीय मकानों का जोखिम: कुल इमारत ढहने के हादसों में अकेले 'रिहायशी मकानों' की हिस्सेदारी लगभग 38% से 42% होती है. इसका सीधा अर्थ यह है कि देश में हर साल करीब 500 से 650 केवल आवासीय मकान बड़े हादसे का शिकार बन जाते हैं.

सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य कौन से हैं

इमारत गिरने और मौतों के मामलों में देश के प्रमुख राज्य जहां स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर बनी हुई है:

-उत्तर प्रदेश: ग्रामीण व पुराने शहरी इलाकों में जर्जर ढांचों के गिरने से औसतन 200–250 मौतें प्रति वर्ष.

-महाराष्ट्र: मुंबई और तटीय इलाकों में मानसूनी बारिश के दौरान जर्जर इमारतों से औसतन 150–200 मौतें प्रति वर्ष.

-मध्य प्रदेश: औसतन 120–150 मौतें प्रति वर्ष.

-तमिलनाडु: औसतन 100–120 मौतें प्रति वर्ष.

-गुजरात और आंध्र प्रदेश: औसतन 80–100 मौतें प्रति वर्ष.

3. राजधानी दिल्ली का खौफनाक सच

देश की राजधानी दिल्ली में प्रशासनिक तंत्र की मौजूदगी के बावजूद जर्जर और अवैध निर्माण लोगों के लिए काल बन रहे हैं. दिल्ली फायर सर्विस के आंकड़े बताते हैं कि शहर में हर रोज औसतन एक से ज्यादा इमारत गिर रही है.

2022 से 2025 तक की स्थिति: दमकल विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2022 से 2025 के दौरान इमारत गिरने से दिल्ली में कुल 98 लोगों की मौत हो चुकी है. केवल 2022 से 2024 के बीच ही दिल्ली में इमारत गिरने की 1133 घटनाएं सामने आईं.

2022: 349 घटनाएं, 43 मौतें, 315 घायल.

2023: 371 घटनाएं, 23 मौतें, 171 घायल.

2024: 413 घटनाएं, 32 मौतें.

2025 (1 जनवरी से 31 जुलाई): फायर सर्विस को 233 कॉल्स मिलीं, जिनमें 17 लोगों की मौत और 101 लोग घायल हुए. (हालांकि, 2024 में इसी अवधि में 316 कॉल्स आई थीं, जिनमें 37 मौतें हुई थीं).

दिल्ली में हुए प्रमुख बड़े हादसे

दिल्ली में पिछले डेढ़ दशक के दौरान हुए बड़े हादसों ने दर्जनों परिवारों को उजाड़ दिया है. आइए उन हादसों पर एक नजर डालें

-2010: ललिता पार्क, लक्ष्मी नगर-71 मौतें

-2011: चांदनी महल / जामा मस्जिद- 07 मौतें

-2014: इंद्रलोक, तुलसी नगर- 10 मौतें

-2020: भजनपुरा- 05 मौतें

-2022: सत्य निकेतन- 02 मौतें

-2025: वेलकम, जनता कॉलोनी-06 मौतें

-2026: सैदुल्लाजाब- 06 मौतें

-2026: रोहिणी सेक्टर-16- 03 मौतें

सत्या निकेतन से लेकर लक्ष्मी नगर और सैदुल्लाजाब तक के हादसे केवल प्राकृतिक आपदाओं का परिणाम नहीं हैं, बल्कि ये मानव-निर्मित लापरवाही का नतीजा हैं. बिना किसी सुरक्षा जांच के इमारतों में बेसमेंट खोदना, पिलरों को कमजोर करना, नगर-निगमों द्वारा जर्जर इमारतों को समय पर खाली न कराना और बिल्डर-प्रशासन का गठजोड़ मासूम लोगों की जिंदगी दांव पर लगा रहा है.

जब तक जर्जर इमारतों का समयबद्ध स्ट्रक्चरल ऑडिट अनिवार्य नहीं किया जाएगा और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों व मकान मालिकों पर कड़े कानूनी कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक हर बारिश के साथ हादसों का यह सिलसिला इसी तरह मासूम जिंदगियों को निगलता रहेगा.

संकल्प ठाकुर पिछले 10 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत न्यूज़ 24 से की, इसके बाद न्यूज़ नेशन में कार्य किया. वर्तमान में वह एबीपी हिंदी डिजिटल में डिप्टी प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले सात वर्षों से संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं. उन्हें खेल, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और चुनावी राजनीति से जुड़ी खबरों की गहरी समझ है. इसके अलावा साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता का क्षेत्र है. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है.

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