कोरोना, युद्ध और ऊर्जा संकट! PM मोदी क्यों बोले- गरीबी के दलदल में फंसेंगे? एक्सपर्ट्स से जानें- बुरे समय के लिए कैसे बचाएं पैसे
Decade of Disasters: संकट की सबसे बड़ी वजह होर्मुज स्ट्रेट का बंद होना और वैश्विक तनाव है. जब तक भू-राजनीतिक हालात सामान्य नहीं होते और तेल की सप्लाई बहाल नहीं होती, तब तक इस संकट से उबरना मुश्किल है.

पिछले कुछ सालों से लगातार आ रही मुसीबतों ने पूरी दुनिया का नक्शा ही बदल कर रख दिया है. हम सबने अपनी जिंदगी में कभी न कभी ये सवाल जरूर पूछा होगा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? एक तरफ कोरोना जैसी महामारी का जख्म अभी भरा ही नहीं था कि दुनिया युद्ध, ऊर्जा संकट और महंगाई की आग में झोंक दी गई. हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी चिंता को एक नाम दिया- 'यह दशक आपदाओं का दशक है.' आइए, इस बयान के मायने और इसके पीछे की पूरी सच्चाई को एक्सपर्ट्स की नजर से समझते हैं...
'आपदाओं का दशक': पीएम मोदी के बयान के मायने क्या?
PM मोदी ने 16 मई 2026 को अपने नीदरलैंड दौरे के दौरान द हेग में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए यह बयान दिया. उन्होंने कहा, 'आज मानवता के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं. पहले कोरोना आया, फिर युद्ध शुरू हो गए और अब ऊर्जा का संकट है. यह दशक दुनिया के लिए आपदाओं का दशक बन गया है.'
उन्होंने आगे चेतावनी देते हुए कहा, 'अगर हालात तेजी से नहीं बदले तो बीते कई दशकों की उपलब्धियों पर पानी फिर जाएगा और दुनिया की बहुत बड़ी आबादी गरीबी के दलदल में फंस जाएगी.' यह कोई राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि मौजूदा वैश्विक संकटों की एक कड़वी सच्चाई है, जो एक के बाद एक दुनिया पर हमला कर रहे हैं.
एक के बाद एक मुसीबतों का पहाड़ कैसे टूट रहा है?
यह संकटों की कोई अकेली कड़ी नहीं, बल्कि एक जंजीर है जिसमें हर नई मुसीबत पिछली से जुड़ती चली जा रही है:
- पहला झटका- कोरोना महामारी (2020 से): इसने दुनिया की स्वास्थ्य व्यवस्था को तहस-नहस किया और अर्थव्यवस्थाओं की कमर तोड़ दी. भारत की GDP वृद्धि दर 2020 की चौथी तिमाही में गिरकर 3.1% रह गई थी और सरकारी कर्जा GDP के 59.3% तक पहुंच गया.
- दूसरा झटका- युद्ध (2026 से): 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले के बाद मिडिल ईस्ट में जंग छिड़ गई.
- तीसरा झटका- ऊर्जा संकट: जंग की वजह से ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को लगभग बंद कर दिया, जो दुनिया की तेल और गैस सप्लाई का लगभग 20% हिस्सा सप्लाई करता है. इससे दुनियाभर में ईंधन की कीमतें आसमान छूने लगीं. एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि अगर युद्ध जारी रहा तो कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है. इस युद्ध का असर सिर्फ तेल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यापार से लेकर आम आदमी के खर्चे तक हर चीज पर पड़ा.
क्या यह भयंकर गरीबी का आगाज है?
PM मोदी ने यह कहकर अपनी सबसे बड़ी आशंका जाहिर की कि बीते दशकों की उपलब्धियों पर पानी फिर जाएगा. इस डर के पीछे ठोस आर्थिक कारण हैं.
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इस संकट के तीन बड़े नुकसान हो रहे हैं:
- डॉलर के मुकाबले रुपया हुआ कमजोर: युद्ध शुरू होने के बाद से रुपया 91 से गिरकर 95 रुपये प्रति डॉलर के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया है.
- महंगाई का बोझ: अब तक बढ़ती तेल की कीमतों का बोझ सरकार उठा रही थी, लेकिन जल्द ही इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ना शुरू हो सकता है. चालू खाते का घाटा (करंट अकाउंट डेफिसिट) बढ़ने और महंगाई बढ़ने की आशंका है.
- खाने-पीने की चीजें महंगी होंगी: उर्वरकों की कमी और उसकी बढ़ती कीमतों के चलते खाने-पीने की चीजों के दाम भी बढ़ना तय है.
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की रिपोर्ट के मुताबिक, मिडिल ईस्ट के इस तनाव से भारत में करीब 25 लाख लोग गरीबी के दायरे में आ सकते हैं. यही वजह है कि अगर यह संकट लंबा खिंचता है, तो यह न सिर्फ गरीबी बढ़ाएगा बल्कि विकासशील देशों की सालों की मेहनत पर पानी फेर सकता है.
हंतावायरस और इबोला: नए स्वास्थ्य खतरे
कोरोना के बाद अब दुनिया के सामने दो और वायरस ने दस्तक दी है, जिन्होंने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है:
- हंतावायरस: मई 2026 में एक क्रूज शिप 'एमवी होंडियस' पर इस वायरस का प्रकोप सामने आया, जिसमें कई लोगों की मौत हो गई. यह वायरस आमतौर पर चूहों से इंसानों में फैलता है, लेकिन इसका एंडीज स्ट्रेन इंसानों के बीच भी फैल सकता है. अर्जेंटीना में 2025-26 सीजन में हंतावायरस के 101 मामले सामने आए, जिनमें से 32 लोगों की मौत हो गई.
- इबोला वायरस: वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) ने 17 मई 2026 को कांगो और युगांडा में इबोला के प्रकोप को 'अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल' घोषित किया है. वहां अब तक 8 मामलों की पुष्टि हो चुकी है, 246 संदिग्ध मामले हैं और लगभग 80 लोगों की मौत का संदेह है.
तो क्या इन सबसे निपटने के लिए पैसे बचाने शुरू कर दें?
किसी भी वित्तीय तूफान से बचने का पहला और सबसे जरूरी कदम है एक इमरजेंसी फंड तैयार करना. यह आपकी वो ढाल है जो अचानक नौकरी छूटने, मेडिकल इमरजेंसी या किसी अन्य अनचाहे खर्च के समय आपको कर्ज के जाल में फंसने से बचाएगी.
- कितना होना चाहिए फंड: एक्सपर्ट्स के मुताबिक, आपके पास कम से कम अपने 3 से 6 महीने के जरूरी खर्चों के बराबर पैसा एक अलग खाते में जरूर होना चाहिए. कुछ वित्तीय सलाहकार इसे 6 से 12 महीने तक रखने की भी सलाह देते हैं. मिसाल के तौर पर, अगर आपका मासिक खर्च 50,000 रुपये है, तो आपका इमरजेंसी फंड 1.5 लाख से 3 लाख रुपये के बीच होना चाहिए.
- कैसे बनाएं: छोटी शुरुआत करें. हर महीने करीब 5,000 रुपये से बचत शुरू करें. इस पैसे को अपने रोजमर्रा के खाते से अलग रखें और ऐसी जगह निवेश करें जहां से जरूरत पड़ने पर तुरंत निकाला जा सके, जैसे लिक्विड म्यूचुअल फंड या हाई-यील्ड सेविंग्स अकाउंट.
- सबसे अहम नियम: यह पैसा सिर्फ और सिर्फ वास्तविक आपात स्थितियों के लिए ही इस्तेमाल करें, न कि छुट्टियां मनाने या शॉपिंग के लिए. इसे 'भूल जाने वाला' पैसा मानकर चलें.
बचत की आदत डालने के लिए आपको अपनी जीवनशैली में कुछ स्मार्ट बदलाव करने होंगे. ये वो छोटे-छोटे कदम हैं जो मिलकर बड़ी रकम बचा सकते हैं:
- 50-30-20 का मंत्र अपनाएं: यह बजट बनाने का सबसे आसान और कारगर तरीका है. अपनी मासिक आय का 50% जरूरी खर्चों (किराया, बिजली, राशन) पर, 30% अपनी इच्छाओं (मनोरंजन, बाहर खाना) पर और 20% बचत व निवेश पर लगाएं।
- बिल और सब्सक्रिप्शन की जांच करें: गैर-जरूरी OTT सब्सक्रिप्शन बंद करें और अपने बीमा प्लान की दोबारा जांच कराएं.
- सोच-समझकर खरीदारी करें: खरीदारी पर जाने से पहले एक लिस्ट जरूर बनाएं और उसी पर टिके रहें. बिजली के बिल बचाने के लिए एनर्जी-एफिशिएंट उपकरणों का इस्तेमाल करें.
- खर्चों को ऑटोमेट करें: अपने बचत खाते में ऑटोमैटिक ट्रांसफर सेट करें ताकि सैलरी आते ही बचत का पैसा अलग हो जाए.
आखिर कब मिलेगी इन संकटों से निजात?
यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब शायद ही किसी के पास हो. इस संकट की सबसे बड़ी वजह होर्मुज स्ट्रेट का बंद होना और वैश्विक तनाव है. जब तक भू-राजनीतिक हालात सामान्य नहीं होते और तेल की सप्लाई बहाल नहीं होती, तब तक इस संकट से उबरना मुश्किल है. मौजूदा हालात में सिर्फ पैसे बचाकर रखना काफी नहीं है, क्योंकि महंगाई उसकी कीमत घटा देगी. दुनिया के दिग्गज निवेशक भी इस समय सुरक्षित संपत्तियों में पैसा लगाने की सलाह दे रहे हैं.
मशहूर निवेशक जेफरी गुंडलाच ने अपने पोर्टफोलियो का 20% हिस्सा नकदी में और 20% हिस्सा कमोडिटी (जैसे सोना) जैसी ठोस संपत्तियों में रखने की सलाह दी है. उनका कहना है कि इस अनिश्चितता के दौर में शेयर बाजारों में जोखिम बढ़ गया है. रॉबर्ट कियोसाकी जैसे एक्सपर्टज भी सोने-चांदी और बिटकॉइन जैसी संपत्तियों को 2026 के लिए सबसे सुरक्षित मान रहे हैं. इसलिए, अपनी बचत के एक हिस्से को सुरक्षित और महंगाई को मात देने वाले विकल्पों में जरूर लगाएं.


























