आखिर मिडिल ईस्ट जंग में क्या है ड्रैगन का स्टैंड? चीन ईरान से तेल भी चाहता और अमेरिका से रिश्ते भी; जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स
मिडिल ईस्ट जंग के बीच चीन ईरान से कच्चा तेल भी चाहता है, और अमेरिका से रिश्ते भी बनाए रखना चाहता है. हाल ही में ईरान के विदेश मंत्री ने चीन का दौरा किया, लेकिन ड्रैगन की कूटनीति में बदलाव नहीं आया.

China Diplomacy Amid Iran US war: ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है. इधर, अब सवाल चीन पर उठ रहे हैं, कि ड्रैगन ईरान से कच्चा तेल तो चाहता है, पर युद्ध में उसका समर्थन क्यों नहीं करना चाहता. सीएनबीसी में छपी एक खबर की मानें तो चीन का मकसद अमेरिका से अपने व्यापारिक संबंध बनाए रखना प्राथमिकता है. आखिर क्यों?
हाल ही में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची चीन दौरे पर पहुंचे थे. उनकी यह युद्ध शुरू होने के बाद पहली यात्रा थी. वह चीन से काफी उम्मीदें लेकर आए थे. इसमें तेल में लगातार खरीद, कूटनीतिक सुरक्षा और यह दिखाना कि तेहरान के पास अभी भी ताकतवर दोस्त हैं.
चीन अमेरिका से स्थिर आर्थिक माहौल बनाए रखना चाहता है
एक्सपर्ट्स का कहना है कि उन्हें जो मिला, वह शब्दों में गर्मजोशी भरा था. असलियत में उतना नहीं है. इसके पीछे वजह है कि 2026 में चीन की प्राथमिकता अमेरिका और देश के भीतर एक स्थिर आर्थिक माहौल बनाए रखना है. इसमें वह अपनी 15वीं पंचवर्षीय योजना लागू करना चाहता है.
ईरान चीन का सबसे बड़ा रणनीतिक तौर पर उपयोगी देश है. क्योकि बीजिंग कच्चे तेल का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयात करने वाला देश है. यह निर्भरता 2 अरब डॉलर के भारी भरकम तेल से भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है. KPLR के मानें तो यह चीन का कुल तेल आयात का लगभग 15 प्रतिशत है. इसे वह हर महीने ईरान से खरीदता है. ऐसे में तीसरे महीने में पहुंचा खाड़ी देश का यह युद्ध, एशिया के कई देशों पर असर कर रहा है. चीन पर भी इसका गहरा प्रभाव है.
2024 में चीन ने सऊदी अरब और यूएई, दोनों देशों के साथ करीबन 107.5 अरब डॉलर और 101.8 अरब डॉलर का व्यापार किया. USCC की एनुअल रिपोर्ट की मानें तो ईरान के साथ व्यापारिक आंकड़े काफी कम 42.4 डॉलर रहा है. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होने से भी सप्लाई चेन पर असर पड़ा है.
चीन ने बीजिंग को हमेशा एक भरोसेमंद साझेदार बताया है
इधर, बीजिंग ने तेहरान को एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार बताया है. सीएनबीसीटीवी ने एक एक्सपर्ट्स के हवाले से बताया कि चीन के लिए ईरान वफादारी पर आधारित रिश्ते से कहीं ज्यादा, मोलभाव करने वाला जरिया है. इधर, हाल ही में ट्रंप ने चीन के राष्ट्रपति के कदम को अनोखा करार देते हुए बताया था कि बीजिंग तेहरान को किसी तरह के नए हथियार नहीं भेजेगा.
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बीजिंग शिखर सम्मेलन 2017 के बाद ट्रंप चीन की पहली यात्रा पर रहेंगे. दोनों नेता इससे पहले साल 2025 में दक्षिण कोरिया के बुसान में APEC के दौरान अलग से मिले थे. इसमें एक ट्रेड डील हुई थी. इससे चीन के सामानों पर लगने वाला टैरिफ 140 प्रतिशत से ज्यादा के शिखर से घटकर 47 प्रतिशत पर आ गया. यह पिछले मुकाबले 30 प्रतिशत कम था.
चीन ने हमेशा ईरान पर हुए हमले पर सधे हुए बयान दिए हैं
चीन ने यूएस और इजरायल की ईरान पर कार्रवाई के बाद सधे हुए बयान दिए हैं. इनमें इंटरनेशनल कानून का उल्लंघन, अयातुल्लाह खामेनेई की हत्या की निंदा, हमलों को तुरंत रोकने की मांग की गई है. हालांकि, ईरान के विदेश मंत्री से मुलाकात के बाद भी चीन की कूटनीति में किसी तरह का बदलाव नहीं आया है. ऐसे में एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान के विदेश मंत्री की मेजबानी करके चीन ने दुनिया की नजर में अमेरिका के बराबर खुद को शक्तिशाली देश के रूप में पेश किया है.
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