चीन ने जम्मू-कश्मीर की शक्सगाम घाटी में अपनी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर भारत की आपत्ति को पूरी तरह खारिज कर दिया है. चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के जरिए पाकिस्तान तक सड़क बना रहा है, जो इस इलाके से गुजर रही है. चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने साफ कहा कि यह घाटी चीन का हिस्सा है और वहां सड़क बनाना उसका पूरा अधिकार है.

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शक्सगाम घाटी पर चीन का हक: माओ

12 जनवरी 2026 को माओ निंग ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'जिस इलाके को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वह चीन का ही हिस्सा है. अपने इलाके में इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाना चीन का अधिकार है और इस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता.'  

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उन्होंने आगे बताया कि चीन और पाकिस्तान ने 1960 के दशक में सीमा समझौता किया था, जिसमें दोनों देशों की सीमा तय की गई थी. यह फैसला दो संप्रभु देशों ने अपने अधिकार में किया था.

 

शक्सगाम घाटी पर चीन का अवैध कब्जा

चीन का कश्मीर पर रुख पहले जैसा: माओ

चीन ने CPEC को एक आर्थिक सहयोग परियोजना बताया, जिसका मकसद स्थानीय आर्थिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देकर लोगों की जिंदगी बेहतर बनाना है. माओ निंग ने कहा कि CPEC और सीमा समझौता कश्मीर मुद्दे पर चीन के रुख को प्रभावित नहीं करते. चीन का कश्मीर पर रुख पहले जैसा ही है यानी यह एक ऐतिहासिक जटिल मुद्दा है, जिसे भारत और पाकिस्तान आपसी बातचीत और शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाएं. चीन यूनाइटेड नेशंस (UN) के प्रस्तावों और समझौतों का सम्मान करता है.

चीन के दावे पर भारत की मजबूत आपत्ति

भारत ने पहले ही 9 जनवरी 2026 को शक्सगाम घाटी में चीन के कंट्रोल को अवैध कब्जा बताया था. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था, 'शक्सगाम घाटी भारत का इलाका है. हमने 1963 में हुए तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है. हम उस समझौते को अवैध मानते हैं.'

उन्होंने CPEC पर भी कहा कि भारत इसे मान्यता नहीं देता क्योंकि यह भारत के उस इलाके से होकर गुजरता है जो पाकिस्तान के जबरन और अवैध कब्जे में है. जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा हैं. यह बात पाकिस्तान और चीन को कई बार साफ बताई जा चुकी है.

शक्सगाम घाटी का इतिहास क्या है?

1948 में पाकिस्तान ने शक्सगाम घाटी पर अवैध कब्जा किया था. 1963 में पाकिस्तान ने यह इलाका चीन को सौंप दिया था. CPEC (2013 से शुरू) गिलगित-बाल्टिस्तान से गुजरता है, जहां सड़क, रेलवे, ऊर्जा प्रोजेक्ट्स और ग्वादर पोर्ट जैसे काम चल रहे हैं. इसकी कुल लागत करीब 60 बिलियन डॉलर है.  

यह इलाका रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे चीन को अरब सागर तक आसान पहुंच मिलती है. भारत लगातार कहता रहा है कि CPEC भारत की संप्रभुता का उल्लंघन है. यह विवाद भारत-चीन-पाकिस्तान के बीच तनाव को और बढ़ा सकता है, लेकिन दोनों तरफ से रुख पहले जैसा ही बना हुआ है.