केंद्र सरकार ने जनहित याचिका यानी पीआईएल व्यवस्था की समीक्षा करने और इसे पूरी तरह समाप्त करने की मांग की है. सबरीमाला केस की पुनर्विचार याचिकाओं से सामने आए सवालों पर सुनवाई कर रही 9 जजों की संविधान पीठ के सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह दलील रखी.

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सुनवाई में एक सवाल पीआईएल पर भी

संविधान पीठ जिन 7 सवालों पर सुनवाई कर रही है, उनमें एक सवाल यह भी है कि क्या किसी धार्मिक संप्रदाय से बाहर का व्यक्ति पीआईएल दायर कर उस संप्रदाय की प्रथाओं को चुनौती दे सकता है. इसका जवाब देते हुए सॉलिसिटर जनरल ने जनहित याचिका व्यवस्था को जारी रखने के औचित्य पर सवाल उठाए.

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'अब प्रासंगिकता खत्म'

मेहता ने कहा कि पीआईएल को उस दौर में शुरू किया गया था, जब आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक परिस्थितियों के चलते न्याय तक पहुंचने में असमर्थ था. लेकिन 5 दशक में स्थितियां काफी हद तक बदल चुकी हैं. न्यायिक व्यवस्था के विस्तार के चलते लोग अपने लिए खुद याचिका दाखिल कर सकते हैं. हर जिले में कानूनी सेवा प्राधिकरण काम कर रहा है. वहां लोगों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध है.

'एजेंडा के तहत याचिका'

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि ई-फाइलिंग जैसी सुविधाओं से आम आदमी के लिए हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचना आसान हो गया है. अब यह जरूरी नहीं कि कोई और किसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए याचिका दाखिल करे. मेहता ने आरोप लगाया कि जनहित याचिका के नाम पर दाखिल होने वाली ज़्यादातर याचिकाओं का कोई छुपा हुआ एजेंडा होता है. उसके पीछे कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो अपना फायदा चाहता है.

हम भी रहते हैं सतर्क : सुप्रीम कोर्ट

बेंच की अध्यक्षता कर रहे चीफ जस्टिस ने इस बात पर सहमति जताई कि बहुत से याचिकाकर्ता 'गुप्त एजेंडा' लेकर आते हैं. इसलिए, अब अदालतें भी जनहित याचिकाओं को स्वीकार करने में बहुत सतर्कता बरतती हैं. पीआईएल को परखने के लिए सख्त मानक तय किए गए हैं. जज पीआईएल के पीछे के वास्तविक कारणों की पड़ताल करते हैं. किसी याचिका पर नोटिस तभी जारी किया जाता है जब मामले में सचमुच दम हो.

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