ईरान-यूएई के बीच बनी बात... एक्सपर्ट ने बताया ब्रिक्स से कैसे मजबूत हुई भारत की इमेज
BRICS सम्मेलन की संयुक्त घोषणा को रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों ने भारत के लिए बड़ी सफलता बताया है. उन्होंने आतंकवाद के हर रूप के खिलाफ जीरो टॉलरेंस के समर्थन को भारत के रुख की बड़ी उपलब्धि बताया.

नई दिल्ली में हुए BRICS शिखर सम्मेलन की संयुक्त घोषणा को कई रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों ने भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया है. विशेषज्ञों ने घोषणा-पत्र में आतंकवाद के हर रूप के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को भारत के रुख का समर्थन बताया.
विशेषज्ञों ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पिछले साल हुए आतंकी हमले की BRICS नेताओं की कड़ी निंदा ने नई दिल्ली घोषणा-पत्र को भारत के लिए और महत्वपूर्ण बना दिया है. इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी.
ईरान और UAE के मतभेदों के बीच बनी सहमति
BRICS देशों ने 12 सितंबर को आम सहमति से संयुक्त घोषणा-पत्र अपनाया. यह सहमति ऐसे समय बनी, जब पश्चिम एशिया के संघर्ष को लेकर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ईरान के बीच गंभीर मतभेद थे.
खास बात यह रही कि घोषणा-पत्र में ईरान पर अमेरिकी हमलों का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया गया. घोषणा-पत्र के मसौदे को लेकर बातचीत अंतिम समय तक चली. शुरुआत में ईरान और UAE दोनों ने अपने-अपने रुख को काफी सख्त कर रखा था.
वीणा सीकरी ने बताया 'बड़ी कूटनीतिक सफलता'
वर्ष 2003 से 2006 तक बांग्लादेश में भारत की उच्चायुक्त रह चुकीं पूर्व राजनयिक वीणा सीकरी ने इसे भारत के लिए "बहुत बड़ी कूटनीतिक सफलता" बताया. उन्होंने कहा कि अब इसमें कोई अगर-मगर नहीं है. भारत आज दुनिया की महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली मेज पर है. उनके मुताबिक, इस सफलता में प्रधानमंत्री की द्विपक्षीय बैठकों की बड़ी भूमिका रही. उन्होंने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ प्रधानमंत्री की बैठकों का विशेष तौर पर जिक्र किया.
सीकरी ने कहा कि शेरपा राजदूत सुधाकर दलेला और मंत्री के नेतृत्व में पूरी टीम ने भी दिन-रात काम किया. उन्होंने बताया कि टीम ने घोषणा-पत्र के मसौदे पर सहमति बनाने के लिए सभी पक्षों से बातचीत की और सुबह तीन-चार बजे तक भी काम जारी रखा.
दिल्ली में ईरान-UAE बैठक भी अहम
सीकरी ने दिल्ली में अबू धाबी के क्राउन प्रिंस और ईरान के राष्ट्रपति के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक को भी महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष की पृष्ठभूमि में इस बैठक का महत्व और बढ़ जाता है.
'BRICS गैर-पश्चिमी है, लेकिन पश्चिम विरोधी नहीं'
सीकरी ने कहा कि नई दिल्ली घोषणा-पत्र का संदर्भ बेहद महत्वपूर्ण है. भारत हमेशा से यह कहता रहा है कि BRICS एक गैर-पश्चिमी समूह है, लेकिन यह पश्चिम विरोधी समूह नहीं है. उनके मुताबिक, घोषणा-पत्र में यह बात साफ तौर पर सामने आई है.
पूर्व विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में कहा कि दिल्ली में हुआ BRICS शिखर सम्मेलन तेजी से बदलती और अलग-अलग हिस्सों में बंटती दुनिया में भारत की स्थिति की महत्वपूर्ण तस्वीर पेश करता है.
राव ने लिखा कि नई दिल्ली ऐसे समूह में बने रहने को उपयोगी मानती है जो गैर-पश्चिमी है, लेकिन इसे खुले तौर पर पश्चिम विरोधी समूह बनने देने में कोई फायदा नहीं देखती. उनके मुताबिक, भारत का लक्ष्य टकराव के बिना सुधार है. इसमें ज्यादा प्रतिनिधित्व वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, ग्लोबल साउथ की अधिक भूमिका और आर्थिक दबाव से सुरक्षा शामिल है, लेकिन साथ ही पश्चिमी बाजारों, पूंजी और तकनीक तक पहुंच बनाए रखना भी जरूरी है.
डॉलर से अलग होने जैसी बातों से बनाई दूरी
उन्होंने कहा कि सम्मेलन में किसी साझा BRICS मुद्रा को समर्थन या डॉलर से अलग होने की कोई बड़ी घोषणा देखने को नहीं मिली. इसके बजाय ध्यान राष्ट्रीय मुद्राओं में लेन-देन, तेज सीमा-पार भुगतान, मजबूत आपूर्ति श्रृंखला, डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, स्वास्थ्य, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा तथा संयुक्त राष्ट्र, IMF और विश्व बैंक में सुधार पर रहा.
पश्चिम एशिया पर संयम और बातचीत पर जोर
पश्चिम एशिया संघर्ष के संदर्भ में BRICS नेताओं ने घोषणा-पत्र में अधिकतम संयम बरतने और ऐसे कदमों से बचने का आह्वान किया है, जो स्थिति को और बिगाड़ सकते हैं.
भारत लंबे समय से यह रुख रखता आया है कि किसी भी संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए होना चाहिए.
भारत के वैश्विक नेतृत्व को मिला समर्थन: शर्मा
भारत के UNESCO में राजदूत और स्थायी प्रतिनिधि विशाल वी. शर्मा ने घोषणा-पत्र को भारत के वैश्विक नेतृत्व का बड़ा कूटनीतिक समर्थन बताया. उन्होंने कहा कि BRICS भविष्य के लिए एक साझेदारी है, जिसका मतलब बहुध्रुवीय दुनिया में मजबूत सहयोग है. उनके मुताबिक, यह भारत के वैश्विक नेतृत्व की बड़ी स्वीकार्यता है. उन्होंने कहा कि यह समर्थन ऐसे महत्वपूर्ण समय में मिला है, जब दुनिया के देश स्थिरता चाहते हैं.
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