Xप्लेन: कब भारत आ रहे हैं ईरान के राष्ट्रपति? जानिए पेजेश्कियन के दौरे पर क्यों मंडरा रहा है एयरस्पेस का खतरा?
वैश्विक खुफिया एजेंसियां ईरान के हवाई यातायात को एक अलग ही नजरिए से ट्रैक करती हैं. मध्य-पूर्व के मौजूदा संकट और क्षेत्रीय तनाव के बीच, ईरानी सरकारी उड़ानों पर नजर रखना एक सर्वोच्च प्राथमिकता बन जाता है

भारत में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए वैश्विक नेताओं का तांता लग गया है. इस महासम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपने विशेष विमान से नई दिल्ली पहुंच चुके हैं, जबकि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी जल्द ही यहां पहुंचने की उम्मीद है. हालांकि, इन दोनों महाशक्तियों के राष्ट्रप्रमुखों से ज्यादा सुर्खियां ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन बटोर रहे हैं.
इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह उनकी ईरान से भारत तक होने वाली हवाई यात्रा है. तय शेड्यूल के मुताबिक, 11 सितंबर को तेहरान से उड़ान भरने के बाद ईरानी राष्ट्रपति का विमान पाकिस्तान के एयरस्पेस से गुजरते हुए भारतीय सीमा में प्रवेश करेगा. दोपहर लगभग 2 बजे उनके विमान के दिल्ली स्थित पालम एयरफोर्स स्टेशन पर लैंड करने का कार्यक्रम है. चूंकि मध्य-पूर्व के मौजूदा तनाव और कड़े पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच ईरान के वीआईपी विमानों की आवाजाही को बेहद संवेदनशील और कड़ी सुरक्षा जांच के दायरे में देखा जाता है, इसलिए पेजेश्कियन की इस यात्रा और उनके फ्लाइट रूट पर पूरी दुनिया की विशेष नजर टिकी हुई है.
ऐसी स्थिति में यह सवाल अहम हो जाता है कि रूस या चीन जैसे शक्तिशाली देशों के नेताओं की तुलना में ईरानी राष्ट्रपति के विमान और उनके रूट की स्क्रूटनी (जांच-पड़ताल) इतनी संवेदनशील क्यों होती है.
इस तुलनात्मक विश्लेषण में कई भू-राजनीतिक, तकनीकी, खुफिया और रणनीतिक परतें सामने आती हैं, जो यह स्पष्ट करती हैं कि ईरान के विमानों का मामला रूस और चीन से काफी अलग और जटिल क्यों माना जाता है. आइए इस पूरी स्थिति को विस्तार से समझते हैं.
1. भू-राजनीतिक संघर्ष और मध्य-पूर्व की अस्थिरता
सबसे बड़ा और प्राथमिक अंतर उस भौगोलिक और राजनीतिक माहौल का है, जिससे होकर ईरानी विमान गुजरते हैं. वर्तमान समय में मध्य पूर्व में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच लगातार सैन्य तनाव और सक्रिय संघर्ष की स्थिति बनी हुई है. इस अंचल के हवाई क्षेत्रों विशेषकर तेहरान एफआईआर (FIR) को वैश्विक विमानन और सुरक्षा निकायों द्वारा बेहद संवेदनशील और जोखिम भरा घोषित किया गया है.
इसके विपरीत, रूस या चीन के नेता जब अंतरराष्ट्रीय यात्रा करते हैं, तो उनके रूट पर इस तरह के तात्कालिक और सक्रिय युद्ध क्षेत्रों का खतरा अमूल्य रूप से कम होता है. ईरानी राष्ट्रपति के विमान को अपने घरेलू और क्षेत्रीय हवाई क्षेत्र से बाहर निकलने के लिए अत्यधिक रणनीतिक तालमेल, सुरक्षित वैकल्पिक रूटिंग और पल-पल की निगरानी की आवश्यकता होती है, क्योंकि पश्चिम एशिया का आसमान मौजूदा समय में दुनिया के सबसे अस्थिर क्षेत्रों में गिना जाता है.
2. पश्चिमी प्रतिबंध और तकनीकी जांच का दबाव
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू विमानन तकनीक और प्रतिबंधों का है. ईरान का विमानन क्षेत्र दशकों से कड़े और व्यापक पश्चिमी प्रतिबंधों के साये में काम कर रहा है. इन पाबंदियों के कारण ईरान के पास आधुनिक विमानों के पुर्जों, उन्नत रखरखाव तकनीक, और अत्याधुनिक डिजिटल नेविगेशन सिस्टम की उपलब्धता सीमित हो जाती है.
नतीजतन, अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन प्राधिकरण और विभिन्न देशों के क्षेत्रीय हवाई यातायात नियंत्रण (ATC) तंत्र ईरान के सरकारी या कमर्शियल विमानों की उड़ान-योग्यता और तकनीकी मानकों को लेकर अधिक सतर्क रहते हैं. इसके उलट, हालांकि रूस के एविएशन सेक्टर पर भी पश्चिमी प्रतिबंध हैं, लेकिन उसके पास वीआईपी यात्राओं के लिए उपयोग होने वाला एक अत्यंत आधुनिक और लंबी दूरी का सरकारी विमानों का बेड़ा है, जो विशेष राजनयिक मंजूरियों और मजबूत सैन्य-ग्रेड सुरक्षा प्रणालियों के साथ संचालित होता है. चीन की तकनीकी स्थिति और उसके विमानन बेड़े की मजबूती भी उसे इस तरह की तकनीकी असुरक्षा से दूर रखती है.
3. मेजबान देश की वायु रक्षा और सुरक्षा का तालमेल
जब भारत जैसे देश में ब्रिक्स (BRICS) या अन्य किसी वैश्विक मंच पर ऐसे हाई-प्रोफाइल नेता पहुंचते हैं, तो मेजबान देश की सुरक्षा एजेंसियां और वायु रक्षा नेटवर्क पूरी तरह मुस्तैद रहते हैं. हालांकि भारतीय सुरक्षा व्यवस्था हर वीआईपी उड़ान की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है, लेकिन ईरानी प्रतिनिधिमंडल के मामले में पृष्ठभूमि का तनाव काफी अलग होता है.
मेजबान देश आमतौर पर किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए पहले से ही बेहद सुरक्षित, पूर्व-अनुमोदित राजनयिक गलियारों का उपयोग करते हैं, जिससे कमर्शियल यातायात के व्यस्त बिंदुओं से बचा जा सके. जैसे ही ईरानी विमान भारतीय हवाई क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, स्थानीय सुरक्षा एजेंसियां और वायु सेना पूरी तरह कमान संभाल लेती हैं, जिससे घरेलू स्तर पर जोखिम लगभग नगण्य हो जाता है. फिर भी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टेक-ऑफ से लेकर लैंडिंग तक का सफर कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल की मांग करता है.
4. खुफिया निगरानी और ट्रैकिंग का कड़ा दायरा
वैश्विक खुफिया एजेंसियां ईरान के हवाई यातायात को एक अलग ही नजरिए से ट्रैक करती हैं. मध्य-पूर्व के मौजूदा संकट और क्षेत्रीय तनाव के बीच, ईरानी सरकारी उड़ानों पर नजर रखना खुफिया एजेंसियों के लिए एक सर्वोच्च प्राथमिकता बन जाता है, चाहे वह संवेदनशील सामान की आवाजाही हो या उच्चाधिकारियों की मूवमेंट.
रूस और चीन के पास अपनी खुद की विशाल और आधुनिक खुफिया और सैन्य ट्रैकिंग प्रणालियां हैं, और उनके विमानों की आवाजाही को पश्चिमी एजेंसियां एक स्थापित महाशक्ति के शीत युद्ध या भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के चश्मे से देखती हैं. इसके विपरीत, ईरानी उड़ानों के ट्रांसपोंडर के नियमों, उड़ान पथ और तीसरे पक्ष के हवाई क्षेत्र की अनुमतियों को लेकर दुनिया भर के एविएशन रेगुलेटर बहुत बारीकी से नजर रखते हैं.
संक्षेप में कहें तो, यदि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन भारत या किसी अन्य मित्र देश की यात्रा पर आते हैं, तो मेजबान देश उनकी सुरक्षा और आवभगत में कोई कमी नहीं छोड़ते. हालांकि, रूस और चीन के नेताओं के मुकाबले ईरान के विमानों को क्षेत्रीय युद्ध के खतरों, कड़े पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण तकनीकी संशय और वैश्विक खुफिया तंत्र की अत्यधिक चौकसी का सामना करना पड़ता है. यही वजह है कि ईरानी वीआईपी उड़ानों से जुड़े हवाई क्षेत्र के जोखिम और कूटनीतिक चुनौतियां हमेशा से चर्चा का केंद्र रहती हैं.



















