देश के पांच प्रमुख राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव नतीजे भारतीय राजनीति की नई तस्वीर पेश कर रहे हैं. इन नतीजों से स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का विस्तार किस दिशा में हो रहा है और कहां उसे अब भी कड़े प्रतिरोध से जूझना पड़ रहा है? दरअसल, असम में बीजेपी ने लगातार तीसरी बार सत्ता पर काबिज होकर इतिहास रच दिया तो पुडुचेरी में लगातार दूसरी बार जीत दर्ज करके अपनी पकड़ मजबूत की है. पश्चिम बंगाल में पार्टी ने धमाकेदार अंदाज में अपना सियासी खाता खोला, लेकिन दक्षिण के दुर्ग तमिलनाडु और केरल में कमल का फूल खिलने में एक बार फिर नाकाम रहा.
इन राजनीतिक नतीजों और समीकरणों को हम देश के भूगोल खासकर प्रमुख नदियों के प्रवाह से जोड़कर देखें तो बेहद दिलचस्प तस्वीर सामने आती है. ऐसा लगता है जैसे गंगा और ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाकों में बीजेपी का एकछत्र राज है, जबकि दक्षिण की नदियों कावेरी और पेरियार के आसपास भगवा पार्टी को अब भी अपनी जमीन तलाशनी है. आइए इस स्पेशल रिपोर्ट में समझते हैं कि देश की किन नदियों का रंग भगवा हो चुका है?
ब्रह्मपुत्र का प्रवाह: असम और पूर्वोत्तर में बीजेपी का अभेद्य दुर्ग
देश के नॉर्थ ईस्ट हिस्से की जीवनरेखा मानी जाने वाली ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बीजेपी ने अपना सबसे मजबूत किला तैयार कर लिया है. असम में लगातार तीसरी बार सरकार बनाना छोटी बात नहीं है. इससे पता चलता है कि ब्रह्मपुत्र घाटी के लोगों ने बीजेपी की नीतियों और नेतृत्व को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया है.
लगातार तीसरी जीत के मायने: असम में एक समय कांग्रेस का एकछत्र राज था, लेकिन बीजेपी ने स्थानीय समीकरणों, विकास योजनाओं और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संयोजन से इस धारणा को बदल दिया. तीसरी बार की जीत यह बताती है कि यह कोई 'लहर' नहीं, बल्कि स्थायी राजनीतिक बदलाव है.
ब्रह्मपुत्र घाटी के समीकरण: असम मुख्य रूप से ब्रह्मपुत्र और बराक घाटियों में बंटा है. बीजेपी ने न केवल चाय बागान में काम करने वाले मजदूरों के बीच अपनी पैठ बनाई, बल्कि असमिया अस्मिता के मुद्दे को भी अपने पक्ष में मोड़ने में सफलता हासिल की है.
पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार: ब्रह्मपुत्र नदी सिर्फ असम तक सीमित नहीं है. यह पूरे पूर्वोत्तर की राजनीति को प्रभावित करती है. असम में मजबूत पकड़ का मतलब पूरे पूर्वोत्तर अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, मणिपुर आदि में एनडीए की जड़ों का गहरा होना है.
गंगा मइया का आशीर्वाद: उद्गम से बंगाल की खाड़ी तक भगवा लहर
देश की सबसे पवित्र और अहम नदी गंगा की धारा के प्रवाह को राजनीतिक नजरिए से देखें तो गंगा के उद्गम स्थल यानी उत्तराखंड से लेकर बंगाल की खाड़ी में गिरने यानी पश्चिम बंगाल तक लगभग हर जगह बीजेपी या उसके सहयोगियों का दबदबा दिखाई देता है.
उत्तराखंड (गंगा का उद्गम): गंगोत्री से निकलने वाली भागीरथी और अलकनंदा के संगम से गंगा बनती है. पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में बीजेपी पहले से ही बेहद मजबूत है और वहां उसकी सरकार है.
उत्तर प्रदेश (गंगा का हृदय स्थल): गंगा जब मैदानों में उतरती है तो वह उत्तर प्रदेश के एक बड़े हिस्से को सींचती है. कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी (पीएम मोदी का संसदीय क्षेत्र) जैसे अहम शहर गंगा के किनारे बसे हैं. देश की राजनीति के केंद्र उत्तर प्रदेश में बीजेपी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है. गंगा के इस सबसे बड़े और अहम मैदानी इलाके में बीजेपी का कोई सानी फिलहाल नजर नहीं आता है.
बिहार (मध्य प्रवाह): यूपी के बाद गंगा बिहार में एंट्री करती है. पटना से भागलपुर तक गंगा किनारे बीजेपी अपने सहयोगी दल (जेडीयू और अन्य) के साथ गठबंधन सरकार में शामिल है. यानी गंगा के इस हिस्से में भी एनडीए का ही राज है. हालांकि, बिहार से सटे झारखंड में हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाले जेएमएम का राज है. गंगा के इसी हिस्से पर फिलहाल कमल नहीं खिल पाया है.
पश्चिम बंगाल (हुगली/गंगा का मुहाना): चुनावों में पश्चिम बंगाल हमेशा से रणभूमि रहा है. गंगा जब बंगाल पहुंचती है तो वह हुगली के नाम से जानी जाती है. 2026 के दौरान पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने प्रचंड जीत हासिल करके अपना सियासी खाता खोल लिया और गंगा के मुहाने तक अपना विस्तार कर लिया.
नर्मदा और ताप्ती के किनारे भी 'कमल'
अगर हम विंध्य और सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच बहने वाली नदियों की बात करें तो वहां भी बीजेपी की स्थिति काफी मजबूत है.
नर्मदा और ताप्ती: ये नदियां मध्य प्रदेश और गुजरात से होकर बहती हैं. गुजरात बीजेपी का सबसे पुराना और अभेद्य गढ़ है, जहां दशकों से उसकी सरकार है. वहीं, मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार का कुछ वक्त छोड़ दिया जाए तो यहां काफी समय से बीजेपी का राज है. इससे पता चलता है कि पश्चिम और मध्य भारत में बीजेपी की जड़ें कितनी गहरी हैं. नर्मदा के किनारे मौजूद इस बेल्ट में बीजेपी ने आदिवासियों, किसानों और शहरी मतदाताओं के बीच मजबूत गठजोड़ बनाया है.
दक्षिण का मोर्चा: कावेरी और पेरियार का कड़ा इम्तिहान
गंगा, ब्रह्मपुत्र और नर्मदा के बाद जब हम दक्षिण भारत की ओर रुख करते हैं तो नदियों के साथ-साथ राजनीतिक रंग भी बदला हुआ नजर आता है. विंध्य पर्वतमाला पार करते ही गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और पेरियार नदियों का क्षेत्र आता है, जहां बीजेपी का रथ अक्सर धीमा पड़ जाता है.
तमिलनाडु (कावेरी और गोदावरी का क्षेत्र): कावेरी नदी तमिलनाडु की जीवनरेखा है. इस नदी के बेसिन में बीजेपी को अब भी अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने में भारी संघर्ष करना पड़ रहा है. हालिया चुनावों में तमिलनाडु में 'कमल' न खिल पाना इस बात की निशानी है कि द्रविड़ राजनीति के गढ़ में सेंध लगाना आसान नहीं है.
क्या है चुनौती?
तमिलनाडु की राजनीति क्षेत्रीय अस्मिता, तमिल भाषा के गौरव और द्रविड़ आंदोलन के इर्द-गिर्द घूमती है. यहां हमेशा डीएमके (DMK) और एआईएडीएमके (AIADMK) के बीच मुकाबला रहता है, लेकिन इस चुनाव में तमिल सुपरस्टार थलपति विजय ने बड़ी लकीर खींचकर नया फ्रंट खोल दिया है. इस बेल्ट में बीजेपी को 'उत्तर भारतीय' या 'हिंदी भाषी' पार्टी के रूप में देखा जाता है, जिसे बदलने के लिए पार्टी ने काफी प्रयास किए, लेकिन इसका असर चुनावी नतीजों में नजर नहीं आया है.
केरल (पेरियार और पम्बा का क्षेत्र): पेरियार नदी के किनारे बसे और 'गॉड्स ओन कंट्री' कहलाने वाले केरल में भी बीजेपी को निराशा हाथ लगी है. केरल का राजनीतिक मिजाज देश के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग है. केरल में सत्ता हमेशा वामपंथी गठबंधन (LDF) और कांग्रेस नीत गठबंधन (UDF) के बीच झूलती रहती है. यहां पिछले कुछ साल के दौरान बीजेपी का वोट शेयर भले ही बढ़ा हो, लेकिन सीटों में बदलना भगवा पार्टी के लिए बड़ी चुनौती रही है. केरल की उच्च साक्षरता दर, अलग तरह की जनसांख्यिकी (Demographics) और मजबूत कैडर-आधारित वामपंथी दल बीजेपी के विस्तार में बड़ी दीवार बनकर खड़े हैं.
पुडुचेरी: समंदर किनारे की सियासत
दक्षिण भारत के इस कठिन राजनीतिक परिदृश्य में पुडुचेरी दिलचस्प अपवाद बनकर उभरा है. पुडुचेरी में लगातार दूसरी बार जीत दर्ज कर बीजेपी ने यह साबित किया है कि दक्षिण में वह पूरी तरह से खाली हाथ नहीं है. पुडुचेरी भले ही छोटा केंद्र शासित प्रदेश हो, लेकिन तमिलनाडु से घिरा होने के कारण इसकी भू-राजनीतिक अहमियत है. यहां की जीत से बीजेपी को यह मनोवैज्ञानिक लाभ मिलता है कि दक्षिण में भी उसका गठबंधन स्वीकार्य है. स्थानीय नेताओं को साथ लेकर और सही समीकरण बैठाकर बीजेपी ने पुडुचेरी में जो फॉर्मूला अपनाया, उसे वह भविष्य में अन्य दक्षिणी राज्यों में भी आजमाना चाहेगी.
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