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Xप्लेन: अमित शाह बोले- 2029 से पहले 21 राज्यों में UCC! लेकिन पूरे देश में क्यों नहीं?

महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ड्राफ्टिंग कमेटियां बन चुकी हैं, लेकिन विधेयक अभी पेश नहीं हुए हैं. 2029 तक BJP को अगले तीन सालों में 17 और राज्यों में UCC लागू करना होगा.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर 2026 को मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐलान करते हुए कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले समान नागरिक संहिता (UCC) लागू कर दी जाएगी. शाह ने कहा, 'हमने कई राज्यों में UCC लागू किया है. मुझे भरोसा है कि 2029 से पहले BJP के नेतृत्व वाले NDA शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू कर दिया जाएगा.' यह ऐलान ऐसे वक्त आया जब उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन चुका है जहां UCC लागू हो चुका है, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश विधेयक पास कर चुके हैं. महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में ड्राफ्टिंग कमेटियां बन चुकी हैं. लेकिन इसके साथ ही तीन बड़े सवाल उठ खड़े हुए हैं. UCC इतना ही जरूरी है तो पूरे देश में एक बार में क्यों नहीं लाया जा रहा, केंद्र सरकार खुद क्यों नहीं कर सकती और इसका असर क्या होगा...

UCC पूरे देश में क्यों नहीं: संविधान की दीवार

इसका सबसे बड़ा जवाब संविधान के अनुच्छेद 44 में छिपा है. अनुच्छेद 44 कहता है, 'राज्य नागरिकों के लिए पूरे भारत के भूभाग में एक समान नागरिक संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा.' लेकिन यह अनुच्छेद राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) का हिस्सा है, जिसे अनुच्छेद 37 के तहत अदालतें लागू नहीं करा सकतीं. यानी संविधान सरकारों को UCC बनाने के लिए प्रोत्साहित जरूर करता है, लेकिन कानूनी तौर पर मजबूर नहीं करता.

दूसरा बड़ा पेंच यह है कि शादी, तलाक, गोद लेना, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और विरासत जैसे विषय समवर्ती सूची की एंट्री 5 में आते हैं. इसका मतलब है कि संसद और राज्य विधानसभाएं इन विषयों पर कानून बना सकती हैं. यही संवैधानिक व्यवस्था उत्तराखंड को 2024 में देश का पहला राज्य-स्तरीय UCC लागू करने की इजाजत देती है.

तो केंद्र सरकार सीधे पूरे देश के लिए UCC क्यों नहीं लाती?

इसका जवाब सियासी गणित में है. NDA में जनता दल (यूनाइटेड) जैसे सहयोगी दल शामिल हैं, जिन्होंने UCC का खुलकर विरोध किया है. जब शाह ने यह ऐलान किया, तो JDU के राष्ट्रीय महासचिव और विधायक श्याम रजक ने तुरंत कहा, 'हम इसे लागू नहीं होने देंगे.' इसके अलावा, बिहार, ओडिशा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में सहयोगी दलों की सरकारें हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर UCC लाने पर सहमत नहीं होंगी.

इस वजह से BJP ने राष्ट्रीय कानून का रास्ता छोड़कर राज्य-दर-राज्य रणनीति अपनाई है. कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने इस पर तंज कसते हुए कहा था कि 'फर्स्ट ईयर का लॉ स्टूडेंट भी जानता है कि UCC संसद में कानून संशोधन के बिना नहीं लाया जा सकता.' यानी केंद्र में सर्वसम्मति न बन पाने की वजह से ही BJP ने राज्यों के जरिए कदम-दर-कदम UCC लागू करने का फैसला किया है.

अब तक कहां-कहां लागू हुआ?

देश में UCC की स्थिति अभी मिली-जुली है. उत्तराखंड ने फरवरी 2024 में पहला UCC कानून पास किया और जनवरी 2025 से इसे लागू कर दिया. यह अब तक का इकलौता राज्य है जहां UCC पूरी तरह अमल में है. गुजरात विधानसभा ने मार्च 2026 में 7 घंटे से ज्यादा की मैराथन चर्चा के बाद UCC बिल पास किया, जिसमें ज्यादातर प्रावधान उत्तराखंड वाले ही हैं.

असम मई 2026 में UCC बिल पास करने वाला पहला पूर्वोत्तर राज्य बना, जहां मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने साफ कहा कि जनजातीय समुदाय और छठी अनुसूची क्षेत्र इसके दायरे से बाहर रहेंगे. मध्य प्रदेश ने जुलाई 2026 में UCC लागू किया. हालांकि, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश अभी राष्ट्रपति की मंजूरी और अधिसूचना का इंतजार कर रहे हैं.

महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ड्राफ्टिंग कमेटियां बन चुकी हैं, लेकिन विधेयक अभी पेश नहीं हुए हैं. यानी 2029 का लक्ष्य हासिल करने के लिए BJP को अगले तीन सालों में 17 और राज्यों में UCC लागू करना होगा.

ट्राइबल और छठी अनुसूची कब तक बाहर रहेंगे?

इस पूरे UCC अभियान में सबसे बड़ा अपवाद जनजातीय समुदायों और छठी/पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों का है. केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने साफ कहा था, 'UCC छठी अनुसूची, पांचवीं अनुसूची, पूर्वोत्तर और देश के अन्य जनजातीय क्षेत्रों में लागू नहीं किया जाएगा.' असम में अनुसूचित जनजातियों को पूरी छूट दी गई है, जहां जनजातीय आबादी लगभग 12.4% है.

इस छूट की एक बड़ी वजह यह है कि जनजातीय समुदायों के रीति-रिवाज यानी शादी, विरासत और सामुदायिक जीवन से जुड़े कानून उनकी सांस्कृतिक पहचान हैं. छठी अनुसूची के तहत इन्हें संवैधानिक संरक्षण मिला हुआ है, जो औपनिवेशिक दौर की ऐतिहासिक वास्तविकताओं से उपजा है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने खुद कहा था कि UCC से जनजातियों की संस्कृति, परंपराओं और रीति-रिवाजों को छीनने की बात फैलाई जा रही है, जो सरासर गलत है.

विपक्ष और कुछ जनजातीय संगठनों का कहना है कि यह छूट दरअसल सियासी है. जब मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल दिया जा रहा है, तो जनजातीय रीति-रिवाजों को बाहर रखने का तर्क कमजोर पड़ता है. आलोचकों का कहना है कि जनजातीय समुदायों को छूट देकर BJP उन्हें अपने पक्ष में बनाए रखना चाहती है, जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ को निशाना बनाकर हिंदू वोट बैंक को साधा जा रहा है.

UCC पर कॉन्फ्लिक्ट कैसे बढ़ेगा?

UCC पर 3 तरह से कॉन्फ्लिक्ट बढ़ सकता है:

  • मुस्लिम पर्सनल लॉ: ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने साफ कहा है कि UCC 'कोई अनिवार्य संवैधानिक आदेश नहीं है' और इसे 'जबरन लागू करना अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है.' AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तराखंड UCC को 'कट-एंड-पेस्ट जॉब' बताया, जो हिंदू मैरिज एक्ट, हिंदू सक्सेशन एक्ट और हिंदू डिवोर्स एक्ट के प्रावधानों को उठाकर बनाया गया है.
  • जनजातीय-मुस्लिम टकराव: गुजरात में UCC लागू होने से मुस्लिम और जनजातीय समुदायों के बीच नई खाई बन सकती है, क्योंकि एक समुदाय को छूट मिली है और दूसरे पर सख्त नियम लागू होंगे. मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने दलित और जनजातीय अधिकारों पर सवाल उठाए हैं.
  • महिला अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2026 में साफ कहा कि 'मुस्लिम पर्सनल लॉ और अन्य रीति-रिवाजों में शादी, उत्तराधिकार और संपत्ति के मामलों में महिलाओं के खिलाफ भेदभाव को खत्म करने का सबसे प्रभावी तरीका UCC है.' BJP इसे अपना बड़ा हथियार बना रही है, लेकिन विपक्ष का कहना है कि UCC का इस्तेमाल चुनावी ध्रुवीकरण के लिए किया जा रहा है, न कि सच्चे महिला अधिकारों के लिए.

तो क्या 2029 का टारगेट हासिल हो पाएगा?

अमित शाह का ऐलान साफ है कि 2029 से पहले 21 NDA शासित राज्यों में UCC लागू करना है, लेकिन इस रास्ते में तीन बड़ी चुनौतियां हैं:

  • संविधान के अनुच्छेद 44 और अनुच्छेद 25-28 के बीच टकराव यानी धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता का सवाल.
  • राज्य-दर-राज्य अलग-अलग कानून बनने से UCC का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ रहा है, क्योंकि अगर उत्तराखंड और गुजरात के UCC में प्रावधान अलग हैं, तो 'समान' कहां रहा?
  • गठबंधन सहयोगियों का विरोध, जिसकी वजह से केंद्र में एक राष्ट्रीय कानून नहीं लाया जा सकता.

जहां तक छठी अनुसूची और जनजातीय क्षेत्रों का सवाल है, फिलहाल उन्हें बाहर रखा गया है. लेकिन अगर 2029 के बाद केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनती है, तो यह छूट कब तक बनी रहेगी, आने वाला वक्त ही तय करेगा. फिलहाल तस्वीर यही है कि UCC एक राष्ट्रीय कानून नहीं, बल्कि राज्यों के जरिए चलने वाला एक 'चुनिंदा एकरूपता' का प्रयोग बन गया है.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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