इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल शादी से इनकार कर देने मात्र से दुष्कर्म का अपराध स्वतः नहीं हो जाता. कोर्ट के अनुसार, अपराध तभी माना जाएगा जब यह साबित हो कि शुरू से ही शादी का झूठा वायदा कर महिला की सहमति से शारीरिक संबंध बनाए गए थे.

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शुरुआत से गलत मंशा साबित होना जरूरीहाईकोर्ट ने कहा कि शादी का झूठा वायदा कर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप तभी टिकेगा, जब यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित हो कि आरोपी की नीयत शुरुआत से ही धोखाधड़ी की थी. केवल आरोप के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

सहमति से बने संबंध दुष्कर्म नहींकोर्ट ने मामले के तथ्यों का विश्लेषण करते हुए कहा कि पीड़िता बालिग थी और उसने लगभग चार महीने की अवधि में दो बार सहमति से शारीरिक संबंध बनाए. ऐसे हालात में, बाद में शादी से इनकार होने पर दुष्कर्म का आरोप लगाना कानूनन सही नहीं ठहराया जा सकता.

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एफआईआर में एससी-एसटी एक्ट के ठोस आरोप नहींन्यायालय ने यह भी कहा कि दर्ज एफआईआर में एससी-एसटी एक्ट के तहत किसी विशिष्ट अपराध का स्पष्ट उल्लेख नहीं है और न ही धमकी देने से संबंधित कोई ठोस आरोप सामने आया है. ऐसे में मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा.

आपराधिक कार्यवाही रद्द करने का आदेशहाईकोर्ट ने अभियुक्त अभिनाश शर्मा उर्फ अविनाश शर्मा की याचिका को स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया. कोर्ट ने माना कि मामले में मुकदमा जारी रखने का कोई कानूनी आधार नहीं है.

आजमगढ़ थाने में दर्ज हुई थी एफआईआरयाची के खिलाफ आजमगढ़ जनपद के बिलरियागंज थाने में शादी का झूठा वायदा कर बलात्कार और एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया है.

बचाव पक्ष की दलीलेंयाची की ओर से अधिवक्ता प्रशांत सिंह रिंकू ने कोर्ट में दलील दी कि अभियुक्त के खिलाफ लगाए गए आरोपों को अगर सही भी मान लिया जाए, तब भी कोई दंडनीय अपराध नहीं बनता. उन्होंने कहा कि पीड़िता बालिग है और सहमति से संबंध बने हैं.

सरकारी वकील का पक्षसरकारी वकील ने कोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि शादी का झूठा वायदा कर शारीरिक संबंध बनाना एक गंभीर अपराध है और ऐसे मामलों में सख्ती से कार्रवाई होनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का हवालादोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों पर भरोसा जताते हुए कहा कि दुष्कर्म का आरोप तभी माना जाएगा, जब उसे संदेह से परे साबित किया जाए.

बाद में विवाद होने पर दुष्कर्म नहीं बनताकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि सहमति से शारीरिक संबंध बने हों और बाद में आपसी मतभेद या अनबन के चलते दुष्कर्म का आरोप लगाया जाए, तो उसे आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता.

 

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