'हवा के झोंके की तरह आई, भाप की तरह पल में उड़ी.' यह वाक्य आम आदमी पार्टी के सामने खड़े सबसे बड़े राजनीतिक संकट पर सटीक बैठता है. 24 अप्रैल 2026 को पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने एक साथ इस्तीफा देकर बीजेपी का दामन थाम लिया. यह महज एक सियासी घटनाक्रम नहीं, बल्कि एक उभरती हुई पार्टी के अस्तित्व पर गहराता संकट है. कैसे? जानेंगे एक्सप्लेनर में...

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सवाल 1: आम आदमी पार्टी से 7 सांसदों के जाने की यह पूरी कहानी क्या है?जवाब: यह कोई अचानक हुआ विस्फोट नहीं, बल्कि महीनों से पनप रही आंतरिक कलह का आखिरी नतीजा है. इसकी प्रमुख कड़ियां कुछ इस तरह हैं:

  • चड्ढा की छुट्टी: सबसे पहले राघव चड्ढा को राज्यसभा में आप का उपनेता पद से हटाया गया. यह पार्टी के भीतर उनकी घटती हैसियत का पहला बड़ा सार्वजनिक संकेत था. हैरानी की बात यह कि अशोक मित्तल (जिन्हें चड्ढा की जगह उपनेता बनाया गया) ने भी बाद में चड्ढा का ही साथ दे दिया.
  • ED की कार्रवाई: इसके कुछ ही दिनों बाद, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अशोक मित्तल के व्यावसायिक ठिकानों पर छापेमारी की.
  • बड़ा ऐलान: 24 अप्रैल 2026 को राघव चड्ढा ने साथी सांसदों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ऐलान किया कि वे संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दो-तिहाई बहुमत से बीजेपी में विलय कर रहे हैं.
  • बीजेपी में शामिल: इसके तुरंत बाद, चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात कर औपचारिक रूप से बीजेपी की सदस्यता ग्रहण कर ली.

बागी सांसदों की लिस्ट में राघव चड्ढा के अलावा संदीप पाठक, अशोक मित्तल, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, विक्रमजीत सिंह साहनी और राजिंदर गुप्ता शामिल हैं.

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सवाल 2: राजनीति की दुकान में भावनाओं का सौदा करते हुए पार्टी और बागियों ने क्या दलीलें दीं?जवाब: यहां दो बिल्कुल अलग कहानियां सामने आती हैं जो नैतिकता और राजनीतिक सुविधा के बीच का फर्क साफ करती हैं:

बागियों का पक्ष- 'सही आदमी, गलत पार्टी'

राघव चड्ढा ने भावुक होते हुए कहा. 'आप, जिसे मैंने अपने खून-पसीने से सींचा और 15 साल दिए, अपने सिद्धांतों, मूल्यों और नैतिकता से पूरी तरह भटक गई है. अब यह पार्टी देशहित में नहीं बल्कि निजी फायदे के लिए काम करती है.'

चड्ढा ने यहां तक कह दिया, 'मैं उनके अपराधों का हिस्सा नहीं बनना चाहता था.' वहीं संदीप पाठक ने 'हालात' का हवाला देकर अपना फैसला सही ठहराया.

आप पार्टी का पलटवार- 'गद्दार और 'सौदेबाज'

अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान ने इस सामूहिक इस्तीफे को 'पंजाब और पार्टी के प्रति विश्वासघात' करार दिया. संजय सिंह ने इसे बीजेपी का 'ऑपरेशन लोटस' बताया और कहा कि यह सब ED और CBI के दबाव में किया गया. मान ने तो यहां तक कह दिया कि 'ये सांसद पार्टी की रचनाएं थे, अपने आप में कोई नेता नहीं... बीजेपी में जाकर इनका वही हश्र होगा जो दूसरे दलबदलुओं का होता है.'

सवाल 3: क्या सच में यह 'ऑपरेशन लोटस' है या महज आंतरिक बगावत?जवाब: यह सबसे जटिल पहलू है. आप पार्टी लगातार आरोप लगाती रही है कि बीजेपी विपक्षी दलों को तोड़ने के लिए जांच एजेंसियों का इस्तेमाल करती है...

  • आप का नैरेटिव: पार्टी का कहना है कि ED ने अशोक मित्तल के यहां छापेमारी कर दबाव बनाने की कोशिश की. यह भी आरोप है कि बीजेपी ने पैसे और मंत्री पद का लालच देकर यह सब किया.
  • बीजेपी की चाल: बीजेपी हमेशा की तरह इसे दल-बदल विरोधी कानून के तहत संवैधानिक प्रक्रिया बताती है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी ने बड़ी चालाकी से 'दो-तिहाई' का गणित साधा है ताकि कोई अयोग्यता न हो.
  • हकीकत: इसमें कोई शक नहीं कि पार्टी में भारी अंदरूनी नाराजगी थी. चड्ढा जैसे वरिष्ठ नेता का यूं सार्वजनिक रूप से बगावत करना बताता है कि केजरीवाल की कार्यशैली से उनके अपने ही तंग आ चुके थे.

सवाल 4: आम आदमी पार्टी के लिए सबसे बड़ा खतरा क्या है- पंजाब, दिल्ली या राष्ट्रीय दर्जा?जवाब: इस एक घटना ने आप को तीनों मोर्चों पर कमजोर कर दिया है:

  • पंजाब (आखिरी गढ़): 2027 के चुनाव से पहले बड़ा झटका है. चड्ढा-पाठक जैसे रणनीतिकारों के जाने से चुनाव प्रबंधन कमजोर पड़ेगा.
  • दिल्ली (राजनीतिक जमीन): 67 में से सिर्फ 22 विधायक बचे हैं. अंदरूनी सूत्रों को डर है कि अब 5 से 7 विधायक और टूट सकते हैं.
  • राष्ट्रीय दर्जा (अस्तित्व): राज्यसभा में 10 में से 7 सांसद चले गए. राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बचाना मुश्किल होगा.

नंबर गेम:

  • राज्यसभा में AAP: 10 में से सिर्फ 3 बचे (संजय सिंह, एन.डी. गुप्ता, बलबीर सिंह सीचेवाल).
  • राज्यसभा में NDA: संख्या 141 से बढ़कर 148 पहुंच गई.

सवाल 5: केजरीवाल की लगातार बढ़ रही मुश्किलों में इस घटनाक्रम ने क्या भूमिका निभाई?जवाब: अरविंद केजरीवाल के लिए यह एक साथ कई मोर्चों पर घिरने जैसा है:

  • कानूनी संकट: सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बावजूद आबकारी नीति मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. अब एक नई PIL में उन पर अदालती कार्यवाही की रिकॉर्डिंग वायरल करने का आरोप लगा है.
  • राजनीतिक अलगाव: कभी 'किंगमेकर' कही जाने वाली आप अब INDIA गठबंधन में हाशिए पर नजर आ रही है.
  • सार्वजनिक छवि: भ्रष्टाचार के खिलाफ बनी पार्टी के नेता पर ही अब उनके सबसे करीबी सहयोगी 'अपराधों' में शामिल होने का आरोप लगा रहे हैं.

यह सब मिलाकर एक ऐसे नेता की तस्वीर पेश करता है जो चारों तरफ से घिर चुका है और जिसके अपने ही उसे छोड़ रहे हैं.

24 अप्रैल 2026 का यह दल-बदल सिर्फ सात लोगों के पाला बदलने की कहानी नहीं है. यह आम आदमी पार्टी के लिए अस्तित्व का संकट है. भाप की तरह उड़ती इस पार्टी के सामने अब कुछ ही विकल्प बचे हैं, या तो पंजाब में सत्ता बचाकर अपनी प्रासंगिकता साबित करें या फिर धीरे-धीरे राजनीतिक हाशिए पर चले जाएं. बीजेपी के लिए यह एक बड़ी रणनीतिक जीत है और नितिन नवीन के नेतृत्व में पार्टी ने साबित कर दिया है कि वह विपक्ष के किसी भी गढ़ को भेदने की क्षमता रखती है. अब असली खेल तो पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में होगा, जहां पता चलेगा कि जनता ने इस 'विश्वासघात' को कैसे लिया.