Assi Review: अंदर तक हिला डालने वाली फिल्म, ऐसी फिल्में समाज और सिनेमा की आत्मा को जिंदा रखती हैं
अनुभव सिन्हा ने पहले भी हार्ड हिटिंग सिनेमा बनाया है, लेकिन ये फिल्म अलग लेवल पर हिट करती है. आइए जाने हैं कैसी बनी है तापसी पन्नू की फिल्म अस्सी.
Anubhav Sinha
Taapsee Pannu, Mohd. Zeeshan Ayyub, Advik Jaiswal, Kani Kusruti
जिस वक्त आप ये रिव्यू पढ़ रहे हैं उस वक्त भी देश में एक रेप हो रहा है, हर 20 मिनट पर एक रेप होता है और 24 घंटे में कुल रेप होते हैं अस्सी. अगर आपको बॉलीवुड फिल्में पसंद नहीं हैं, फिल्में देखने का शौक नहीं है. फिल्मी सितारों को नापसंद करते हैं. तब भी अगर जिंदगी में कोई एक फिल्म देखनी हो तो ये फिल्म देखिएगा क्योंकि ये फिल्म देखना जरूरी है. बहुत जरूरी है. ऐसी फिल्में बनना जरूरी है. क्योंकि फिल्में समाज का आइना होती हैं और आपको ये जानना चाहिए कि समाज में क्या हो रहा है और हो सकता है ऐसी फिल्मों से समाज में थोड़ा सुधार ही आ जाए.
कहानी
एक स्कूल टीजर देर रात अपने घर लौट रही होती हैं. कुछ लोग उसे गाड़ी में अगवा कर लेते हैं और गैंगरेप करते हैं. फिर कोर्ट में केस चलता है. आरोपियों को बेगुनाह साबित करने की कोशिश की जाती है. रेप विक्टिम से सवाल किए जाते हैं. ये सब जिस तरह से होता है. वो देखने थिएटर चले जाइए क्योंकि आपका थिएटर जाना बहुत जरूरी है.
कैसी है फिल्म
ये फिल्म आपको परेशान कर देगी. अंदर तक हिला डालेगी. आपकी रूह कांप जाएगी. उस रेप विक्टिम के साथ जो होता है वो आप देख नहीं पाएंगे. तो सोचिए उसने क्या कुछ महसूस किया होगा. ये फिल्म देखते हुए आप अपनी सीट के बिल्कुल कोने पर रहेंगे. आपको अपने परिवार की फिक्र होगी. जिस तरह से ये इस कहानी को दिखाया गया है वो घिनौना है. दर्दनाक है. ये फिल्म किसी पर सवाल नहीं उठाती. सरकार, पुलिस, प्रशासन, ये फिल्म आपको एक अलग चेहरा दिखाती है. इस समाज का, जो बेहद शर्मनाक है.
जब क्लास टीचर के रेप के बाद 9 वीं क्लास के बच्चे व्हाट्सएप ग्रुप में टीचर पर ताने कसते हैं. उनमें से एक बच्चा कहता है कि उस दिन उसे भी वहां बुलाया जाना चाहिए था. तो आपको थिएटर की सीट पर बैठे हुए शर्म आ जाती है. जब उस स्कूल की प्रिंसिपल कहती है कि हमारे स्कूल का रिजल्ट बेस्ट आ रहा है, पर पूरा स्कूल फेल हो गया है तो आप ये फेल्योर महसूस करते हैं. जिस तरह से रॉ कैमरा एंगल दिखाए गए हैं. वो इस फिल्म के असर को और गहरा कर देते हैं.
हम अक्सर कहते हैं कि रेप करने वालों को मार देना चाहिए. ये फिल्म उस पहलू पर भी बात करती है. यही नहीं ये फिल्म हर पहलू पर बड़े कायदे से बात करती है. सवाल करती है. एक ऐसे पेस पर चलती है, जो आपको बिल्कुल सही लगती है. हम अक्सर बच्चों के लिए फिल्में बनाते हैं और वो ए सर्टिफिकेट दे देते हैं. यहां बच्चों को कोर्ट में खड़ा कर दिया गया है. यहां कोर्ट के सीन में तारीख पर तारीख और ढाई किलो का हाथ जैसे डायलॉग नहीं आते. लेकिन जो आते हैं वो ढाई सौ किलो का असर छोड़ते हैं. एंड में ये फिल्म आप पर ऐसा असर छोड़ा जाती है कि आप परेशान रहते हैं और यही इस फिल्म की कामयाबी है.
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एक्टिंग
तापसी पन्नू वकील के किरदार में हैं और तापसी ने दिखा दिया है कि वो क्यों तापसी हैं. वो वुमन ड्रिवन सिनेमा का बहुत बड़ा चेहरा हैं. एक खास एडिट्यूड रखती हैं. अपनी बात मजबूती से कहती हैं और ऐसे किरदार को और मजबूती देने के लिए उनके जैसी है एक्ट्रेस की जरूरत थी और यहां तापसी ने कमाल का काम किया है. एक सीन में जब उनके चेहरे पर कोर्ट के बाहर कोई स्याही फेंक देता है, तो वो वैसे ही कोर्ट में आती हैं और जिरह करती हैं.
कनी कुश्रुति ने रेप विक्टिम के दर्द को जैसे दिखाया है, उनका चेहरा, उनकी आंखें, उनकी आवाज आपको वो दर्द महसूस करवा देती हैं. मोहम्मद जिशान अयूब ने एक रेप विक्टिम के पति के किरदार को जिस संवेदनशीलता से निभाया है वो काबिले तारीफ है. वो अपने बच्चे को कोर्ट ले जाते हैं और कोई उनसे कहता है कि बच्चे को कोर्ट क्यों ले आए तो वो कहते हैं कि अब ये बच्चा कहां रहा. बड़ा हो गया है. वहां आपको अहसास होता है वो हिंदुस्तान के कमाल के एक्टर्स में से एक हैं.
कुमुद मिश्रा को देखकर आपको लगेगा कि ये उनके छोटे भाई हैं, या कोई और ही हैं. आपने कुमुद मिश्रा को इस तरह से स्क्रीन पर देखा ही नहीं होगा. वो अपने किरदार से ऐसा असर छोड़ जाते हैं, जो आपके साथ लंबे वक्त तक रहेगा. नसीरुद्दीन शाह हमेशा की तरह कमाल हैं. रेप के आरोपियों के वकील के किरदार में सत्यजीत शर्मा बेमिसाल हैं. उनकी अदाकारी इस फिल्म को एक अलग ही लेवल पर ले जाती हैं. तापसी के किरदार को और मजबूती देती है, क्योंकि उनके सामने एक मजबूत वकील है. अद्विक जायसवाल ने कनि और जिशान के बेटे के किरदार में काफी गहरा असर छोड़ा है. रेवती जज के किरदार में एक अलग ही जान डाल देती हैं. मनोज पाहवा जबरदस्त हैं. सीमा पाहवा ने शानदार काम किया है. सुप्रिया पाठक का काम अच्छा है, मुकेश छाबड़ा ने यहां कमाल की कास्टिंग की है.
राइटिंग और डायरेक्शन
अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी की राइटिंग ना सिर्फ जबरदस्त है बल्कि बहुत संवेदनशील है. आप तक वो पहुंचता है जो ये पहुंचाना चाहते हैं. कहानी का फ्लो आपको अपने साथ लेकर चलता है. अनुभव सिन्हा का डायरेक्शन कमाल है, जिस तरह से उन्होंने रॉ कैमरा एंगल दिखाए हैं वो इस फिल्म को असर को कई गुना बढ़ाते हैं. उन्होंने किसी एक को हीरो नहीं बनाया. हर किरदार को उसकी जरूरत के हिसाब से सीन दिए. कहानी को हीरो बनाया और ये एक कमाल का फिल्ममेकर ही कर सकता है.
कुल मिलाकर ये एक बहुत जरूरी फिल्म है, जिसे हर हाल में सबके साथ देखिए.
रेटिंग- 4.5 स्टार्स




























