कुछ दिन पहले संदीप रेड्डी वांगा ने फिल्म स्पिरिट के अनाउंसमेंट में प्रभास को India's biggest superstar' कहा था. भले वो वांगा की पर्सनल सोच थी लेकिन प्रभास को इसका थोड़ा ख्याल रखना चाहिए और इतनी खराब फिल्म करने से बचना चाहिए. इस फिल्म में संजय दत्त सबको हिप्नोटाइज कर देते हैं अगर वो मुझे हिप्नोटाइज भी कर देते तो भी मैं नहीं कह पाता कि ये अच्छी फिल्म है, प्रभास को रेबल स्टार कहा जाता है. उन्हें ऐसी फिल्मों के खिलाफ रिबेल कर देना चाहिए, विद्रोह कर देना चाहिए कि मैं नहीं करूंगा.
कहानी
प्रभास यानी राजू अपनी दादी के साथ रहते हैं जिन्हें भूलने की बीमारी है, और वो अपने पति यानि राजू के दादा को ढूंढ रही हैं. राजू भी उन्हें ढूंढ रहा है, और आप कहानी ढूंढ रहे है जो मिल नहीं और न मिलेगी.
कैसी है फिल्म
इसे खराब फिल्म कहना भी सही नहीं होगा क्योंकि ये बहुत ज्यादा खराब है. मैं कहां जाऊं, कहां जाऊं में, इस फिल्म में जब ये डायलॉग आता है तो आप भी यही सोचते हैं. एक जगह डायलॉग आता है, मास्टरपीस आइडिया, बाहर जाने का रास्ता वो देखो. शायद मेकर्स भी जानते थे कि लोग ऐसा सोचेंगे इसलिए इतने रिलेटेबल डायलॉग रखे गए. एक जगह दादी कहती हैं मुझमें और शक्ति नहीं है और मुसीबत नहीं झेल सकती में. आप भी यही महसूस करते हैं, फर्स्ट हाफ में इतने स्लो मो शॉट्स हैं कि आप इरिटेट हो जाते हो. सेकेंड हाफ की शुरुआत में समझ नहीं आता चल क्या रहा है. फिल्म का सिर पैर, हाथ, नाखून कुछ नहीं हैं ,कई जगह ग्रीन स्क्रीन दिख जाती है. vfx हद से ज्यादा खराब हैं, गाने पहले से परेशान दर्शक को और गुस्सा दिलाते हैं. कुल मिलाकर ये फिल्म 3 घंटे 3 मिनट तक आपको टॉर्चर करती है और जमकर टॉर्चर करती है.
एक्टिंग
प्रभास को ऐसी फिल्म अब नहीं करनी चाहिए. यहां पहले लगा उनमें एनर्जी है लेकिन उनकी एनर्जी का गलता इस्तेमाल हुआ. उन्हें बिल्कुल कार्टून बना दिया गया कई जगह, संजय दत्त को अब ऐसे रोल नहीं करने चाहिए, उन्होंने ओवरएक्टिंग कमल तरीके से की है, बाकी किसी की एक्टिंग ऐसी नहीं कि बात भी की जाए.
राइटिंग और डायरेक्शन
मारुति ने कहा था कि फिल्म अच्छी न लगे तो मेरे घर आ जाना और अपने घर का एड्रेस भी दिया था. अब डर है कि फैंस कहीं गुस्सा निकलने पहुंच न जाएं, उनको सोचना चाहिए उन्होंने ऐसा पाप क्यों किया.
कुल मिलकर ये फिल्म न देखें
रेटिंग - 1 स्टार