अगर मैं प्यार में पड़ गया, तो पूरी दिल्ली जला दूंगा. शंकर जब यह कहता है, तो समझ आ जाता है कि अगर उसे अपना प्यार नहीं मिला, तो वह क्या कर सकता है. यहीं से फिल्म का प्लाट सेट हो जाता है. इस बार आशिक सिर्फ आशिक नहीं, एक बेटा भी है.
कहानी लेह, लद्दाख से कहानी शुरू होती है. एयरफोर्स पायलट शंकर गुरुक्कल यानी धनुष अपने सीनियर्स के आर्डर नहीं मानता. उसे मानसिक तनाव है. उसे साइकोलॉजिस्ट मुक्ति यानी कृति सेनन के पास भेजा जाता है. उसे देखते ही वह इमोशनल हो जाती है. कहानी सात साल पीछे जाती है, जहां दिल्ली यूनिवर्सिटी में मुक्ति साइकोलॉजी में पीएचडी कर रही होती है और शंकर लॉ. वह वाइलेंट शंकर को अपनी थिसेस से शांत व्यक्ति बनाना चाहती है. वहां से शंकर उसके प्यार में पड़ जाता है. लेकिन मुक्ति को उससे प्यार नहीं. एक तरफा लवर ब्वाय शंकर पहले ही कह चुका है कि अगर प्यार में पड़ा, तो पूरी दिल्ली जला दूंगा, वो क्या करेगा, वह फिल्म में देखिए.
कैसी है फिल्मरांझाणा का इश्क अगर इस फिल्म में ढूंढ रहे हैं, तो वह आपको नहीं मिलेगा. लेकिन अगर ये जानना चाहते हैं कि इश्क में लोग क्यों फना हो जाते हैं, क्यों कुछ कर गुजरते हैं, दीवानगी, जुनून में कैसे बदल जाती है, तो वह सारा मसाला इस फिल्म में मिलेगा. युद्ध का मैदान है, वर्दी में एक जुनूनी आशिक है, जो प्यार को भूलाने की कोशिश कर रहा है. वो प्यार है, जो पहले इंकार कर चुकी है, लेकिन फिर उसी के प्यार में मौत के दरवाजे तक आ खड़ी हुई है, पिता है, जिसकी दुनिया उसका बेटा है. लद्दाख से लेकर दिल्ली और बनारस तक जैसे ही कहानी पहुंचती है, रांझणा से जुड़ जाती है. रांझणा के कुंदन का दोस्त मुरारी आज भी वहीं हैं, जो नहीं चाहता की कोई आशिक आशिकी में जान दे दे.
एक्टिंगधनुष साबित करते हैं कि उनकी रेंज का एक्टर आज के दौर में मिलना नामुमकिन है. रांझणा में उन्होंने कुंदन की मासुमियत से दिल जीता था. तेरे इश्क में वह बेकाबू आशिक शंकर के हर उस इमोशन को दिखाते हैं, जिसके जैसा प्रेमी की कल्पना हर कोई करता है, बेटे को रोल में जब वह अपने पिता के शव को गाल से सहलाकर चेक करते हैं कि कही वो जिंदा तो नहीं, वहां दिल टूट जाता है. कृति सेनन बेहद खूबसूरत लगी हैं. उन्हें फिल्म में कुछ नया करने का मौका मिला है. प्रकाश राज पिता के रोल में जब मुक्ति के पिता के घर के नौकरों के पैर अपने बेटे की रिहाई के लिए पड़ते हैं, तो गला भर आता है. तोता रॉय चौधरी सख्त और केयरिंग पिता के रोल में याद रह जाते हैं. मोहम्मद जीशान अय्यूब मुरारी वाले अंदाज में जैसे ही कहते हैं कि मर जाओगे पंडित, तो तालियां बजती हैं.
राइटिंग और डायरेक्शनरांझणा की तरह फिल्म की कहानी हिमांशु शर्मा ने लिखी थी, इस बार उन्हें नीरज यादव का साथ मिला है. कहानी का कान्सेप्ट अच्छा है, जहां इस बार प्यार में अकेले लड़का नहीं, लड़की भी जल रही है. इस कहानी को दिखाने के लिए एयरफोर्स और युद्ध का माहौल भी सुनने में दमदार लगता है, लेकिन स्क्रीन पर ऐसा नहीं लगता. जहां वायुसेना की बात हो, वहां कहानी को संभलकर बनाना चाहिए, ऐसे में कई जगहों पर लाजिक की कमी महसूस होगी. खासकर इंटरवल के बाद, जहां युद्ध के मैदान में दो दिलजले आमने-सामने आते हैं. कम लाजिक वाली इस कहानी को आनंद एल राय अपने डायरेक्शन से काफी हद तक संभालते हैं. हालांकि कई ऐसे इमोशनल सीन हैं, जो दोनों राइटरों ने केवल अच्छे लिखें हैं, बल्कि उसमें जान डाल दी है.
म्यूजिकए आर रहमान का म्यूजिक और इरशाद कामिल की जोड़ी ने ही रांझणा का म्यूजिक भी बनाया था. वह इसे रांझणा की दुनिया में ले जरूर जाते हैं, लेकिन रांझणा के गानों जैसा जादू नहीं चला पाते हैं. लेकिन जिगर ठंडा रे... गाना याद रह जाता है.
कुल मिलाकर यह फिल्म अगर देखना चाहते हैं, तो धनुष की एक्टिंग के लिए जरूर देखने जाएं.
रेटिंग – 3.5 स्टार्स