हमारे इतिहास से जुड़ी ऐसी ना जाने कितनी हस्तियां हैं जिनके बारे में हम उतना नहीं जानते, जितना हमें जानना चाहिए. उनके बारे में हमें उतना नहीं पता होता जितना पता होना चाहिए. आज सिनेमा काफी आगे बढ़ चुका है लेकिन कुछ कहानियां पीछे छूट गई हैं. आज वॉयलेंट फिल्में बनती हैं, हॉरर कॉमेडी बनती है, रोमांटिक फिल्मों को देख आज का युवा थिएटर में ही रीलें बनाने लगता है. ऐसे में संत तुकाराम जैसी फिल्म बना लेना ही अपने आपमें हिम्मत का काम है, एक ऐसे आम आदमी की कहानी जो संत बन गया. जिसने काफी कुछ ऐसा किया जिसके बारे में हम सबको पता होना चाहिए, ये फिल्म हमें संत तुकाराम के बारे में सबकुछ बताती है और कमाल तरीके से बताती है.
कहानी
ये कहानी है 17 वहीं सदी के मराठी संत तुकाराम की, उनके पूर्वज भगवान विठोबा का मंदिर बनवाना चाहते थे. लेकिन उन्हें सही मूर्ति नहीं मिल पाती. एक रात वो सपने में एक मूर्ति देखते हैं. इसके सालों बाद विट्ठल भक्तों के उसी परिवार में बोल्होबा नाम के साहुकार के घर तुकाराम का जन्म हुआ. तुकाराम को समाज में फैली कुरीतियों को भेदभाव से दिक्कत है और वो इनके खिलाफ काम करना शुरू करते हैं. धीरे धीरे वो अपने पूरे परिवार को खो देते हैं, फिर वो भक्ति और आध्यात्म का रास्ता अपना लेते हैं. क्या उन्हें भगवान विट्ठल मिलते हैं, इसके लिए आपको ये फिल्म देखनी चाहिए.
कैसी है फिल्म
ये कोई मसाला फिल्म नहीं है लेकिन ये समाज और सिनेमा के लिए जरूरी फिल्म है. समाज के लिए इसलिए जरूरी क्योंकि जिस महान संत ने समाज के लिए इतना कुछ किया उनके बारे में हमें पता होना चहिए और सिनेमा के लिए जरूरी इसलिए क्योंकि सिनेमा सार्थक तभी होता है जब वो ऐसी कहानियों को सामने लाए. ये फिल्म एक अच्छी पेस पर चलती है, धीरे धीरे आपको संत तुकाराम की जिंदगी के तमाम पहलू पता चलते हैं. कई बार आपको हैरानी भी होती है कि हमारे समाज में ऐसा भी होता था. फिल्म की प्रोडक्शन वैल्यू भले बहुत ग्रैंड नहीं है लेकिन ऐसी फिल्म के लिए जितनी जरूरी होनी चाहिए उतनी है. ये फिल्म काफी सिंपल तरीके से बनाई गई है और यही इसकी खासियत है. इसलिए ये मसाला फिल्मों से अलग लगती है. ऐसी फिल्म इसी तरह से बनाई जानी चाहिए. हर एक्टर अपने किरदार में फिट लगता है. रियल लगता है. फिल्म की भाषा सिंपल है, आपको समझने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती. कहानी का फ्लो भी सिंपल रखा गया है जिससे आप आसानी से पूरी कहानी ना सिर्फ समझते हैं बल्कि उसके साथ जुड़ भी जाते हैं.
एक्टिंग
सुबोध भावे ने संत तुकाराम का किरदार इस तरह से निभाया है कि आप वाकई में उन्हें संत समझने लगते हैं. आपको लगता है कि वो सामने आ जाएं तो आप उनके आगे हाथ जोड़ लेंगे और यही उनकी एक्टिंग का कमाल है. अरुण गोविल का काम अच्छा है, उन्हें स्क्रीन पर देखकर एक सुकून सा मिलता है. संजय मिश्रा छोटे से रोल में असर छोड़ते हैं. ट्विकंल कपूर का काम प्रभावित करता है. शीना चौहान ने अच्छा काम किया है, गौरी शंकर ने संत तुकाराम के पिता के किरदार में अच्छा काम किया है. वो बिल्कुल नेचुरल लगते हैं. शिव सूर्यवंशी ने अच्छा काम किया है, शिशिर जोशी और हेमंत पांडे काफी प्रभावित करते हैं
डायरेक्शन
आदित्य ओम का डायरेक्शन अच्छा है. पहले तो उन्हें ऐसी फिल्म बनाने के लिए बधाई दी जानी चाहिए क्योंकि ऐसी फिल्म बनाने से पहले ही पता होता है कि ये मसाला फिल्म नहीं है और रिलीज के बाद भी इसकी जर्नी आसान नहीं होने वाली. फिल्म को वैसे ही फील के साथ बनाया गया है जैसे बनाया जाना चाहिए. भले ये एक संत की कहानी है लेकिन फिल्म कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि आपको ज्ञान दे रही है और यही इस फिल्म की ताकत है.
कुल मिलाकर ये फिल्म देखिए
रेटिंग- 3 स्टार्स
