Musafir Cafe Review: इस कैफे से कुछ खाए बिना ही चले जाइए, नेटफ्लिक्स की बेहद स्लो और बोरिंग सीरीज
Musafir Cafe Review: विक्रांत मैसी की सीरीज मुसाफिर कैफे आज रिलीज हो गई है. इसे देखने की सोच रहें हैं तो यहां पहले इसका रिव्यू पढ़ लीजिए.
रुचिर अरुण
विक्रांत मैसी, महिमा मकवाना, वेदिका पिंटो
ओटीटी
इस सीरीज का नाम और ट्रेलर देखकर लगा था कि ये एक अच्छी रोमाटिंक सीरीज होगी जो जिंदगी के बारे में , रिश्तों के बारे में, मोहब्बत के बारे में कुछ अच्छा दिखाएगी, समझाएगी. विक्रांत मैसी का इस सीरीज में होना इस सीरीज को देखने की सबसे बड़ी वजह था, लेकिन ये सीरीज इस हद तक स्लो और बोरिंग है कि ये आपके सब्र का इम्तिहान ले लेती है. 8 एपिसोड की इस सीरीज में 6 एपिसोड तक तो ऐसा लगता है कि कुछ हो ही नहीं रहा और बाद में जब होता है तो आपको लगता है कि ये तो हम बहुत बार कई फ्लॉप फिल्मों मेंं देख चुके हैं और फिर ऐसा लगता है कि ये एक ऐसा कैफे है जहां कुछ खाने पीने को है ही नहीं.
कहानी
ये कहानी तीन लोगों की है और पैरलल चलती है. चंदर यानि विक्रांत मैसी को पहाड़ों में जाकर कैफे खोलना है, भोपाल में उसकी मुलाकात डिवोर्स लॉयर सुधा यानि वेदिका पिंटो से होती है. दोनों की मोहब्बत आगे बढ़ती है और साथ ही पेरलल ट्रेक पर दिखाया जाता है कि चंदर की जिंदगी में अब प्रीति यानि महिमा मकवाना हैं जो उनके कैफे की पार्टनर हैं औऱ उनकी भी, अब इन तीनों की जिंदगी एक साथ कैसे जुड़ी हुई है ये आपको पता चल जाएगा अगर आपको 8 एपिसोड तक ये सीरीज देख पाए तो.
कैसी है सीरीज
ये सीरीज हद से ज्यादा स्लो है, कहानी आगे बढ़ती ही नहीं, ना ही आपको कुछ सिखाती है. कुछ ऐसे सीन जरूर हैं जो इंस्टाग्राम रील्स के हिसाब से अच्छे लग सकते हैं लेकिन एक सीरीज के तौर पर तो नहीं, दो कहानियों का पेरलल एक साथ चलना भी सही नहीं लगता. आप किसी कहानी से कनेक्ट नहीं कर पाते, ये सीरीज खुद ही में कन्फ्यूज लगती है. ये जिस किताब पर आधारित है वो किताब कमाल की है लेकिन किताब को सीरीज में बदलने का आइडिया फ्लॉप साबित होता है. कुछ रोमांटिक सीन्स अच्छे लगते हैं लेकिन फिर लगता है कि कितना रोमांस देखेंगे, कुछ तो और करो, आगे बढ़ो, और फिर जब ये सुपर स्लो कहानी आगे बढ़ती भी है तो भी ऐसा कुछ नहीं होता जो चौंकाने वाला हो , या आपने ना देखा हो. कुल मिलाकर आपको लगता है कि आपका वक्त बर्बाद हुआ और मजा नहीं आया.
एक्टिंग
विक्रांत मैसी इस सीरीज को देखने की सबसे बड़ी वजह है,यहां उनका काम शानदार है, वो अपनी जिंदगी के दोनों पहलूओं को अच्छे से निभा जाते हैं लेकिन खराब राइटिंग के आगे एक अच्छा एक्टर कुछ नहीं कर सकता. विक्रांत की मासूमियत कई सीन्स में आपका दिल जीत लेती है, लेकिन ये सब बस कुछ ही सीन्स में अच्छा लगता है क्योंकि कहानी में दम है ही नहीं. वेदिका पिंटो का काम अच्छा है ,वो लगी भी काफी अच्छी हैं. महिमा मकवाना का काम ठीक ठाक है, उनका स्क्रीन स्पेस भी कम है और उनके किरदार में गहराई की कमी है. आदिल हुसैन जैसे एक्टर को भी बर्बाद कर दिया गया, कुल मिलाकर इस सीरीज के एक्टर खराब राइटिंग के आगे स्ट्रगल करते दिखे.
राइटिंग और डायरेक्शन
दिव्य प्रकाश दुबे और शरन्या राजगोपाल ने कहानी लिखी है और रुचिर अरुण ने सीरीज डायरेक्ट की है. राइटिंग बहुत कमजोर है, राइटर आपको कुछ महसूस नहीं करवा पाते, कोई ऐसा सीन या डायलॉग नहीं जो याद रह जाए. डायरेक्शन भी एवरेज ही है.
कुल मिलाकर ये सीरीज वक्त की बर्बादी है
रेटिंग- 1.5 स्टार्स
























