Mayasabha Review: 'तुम्बाड' के डायेरक्टर की ये फिल्म जरूर देखिए, जावेद जाफरी ने दिया करियर का बेस्ट परफॉर्मेंस
'तुम्बाड' के निर्देशक राही अनिल बर्वे की फिल्म 'मयसभा: द हॉल ऑफ इल्यूजन' आज यानी 30 जनवरी को बॉक्स ऑफिस पर दस्तक दे चुकी है. ऐसे में अगर आप भी फिल्म देखने की प्लानिंक कर रहे हैं तो यहां पढ़े रिव्यू..
राही अनिल बर्वे
जावेद जाफरी,वीणा जमकर,दीपक दामले,मोहम्मद समद
थिएटर
'तुम्बाड' फिल्म के डायरेक्टर राही अनिल बर्वे आखिरकार आठ साल अपनी फिल्म लेकर आ ही गए. तुम्बाड से इसकी दुनिया अलग है, लेकिन गोल्ड को लेकर लालच का खेल मयसभा : द हाल आफ इल्यूजन में भी है. वैसे भी गोल्ड काफी महंगा चल रहा है. ऐसे में 40 किलो सोना ढूंढने की कहानी आकर्षित तो करेगी ही लेकिन ये फिल्म 100 मिनट तक आपको बांधकर रखती है. 4 किरदार और एक थिएटर, सिनेमा लवर हैं तो ये फिल्म मिस मत कीजिएगा.
कहानी - किसी जमाने में परमेश्वर खन्ना यानि जावेद जाफरी बड़ा निर्माता हुआ करता था. अब वो अपने ही सालों से बंद पड़े थिएटर को अपना घर बनाकर रहता है. उसका बेटे वासु उसके गुस्से को झेलता है, फिर भी साथ रहता है. परमेश्वर को मच्छर पसंद नहीं है, क्योंकि मलेरिया के दौरान ही उसने बीमारी में अपनी धोखेबाज पत्नी को अपनी सारी प्रापर्टी लिख दी थी.वो अपने साथ धुंए वाली मशीन रखता है. वासु का दोस्त है रावोरावना और उसकी बहन जीनत को जब पता चलता है कि उस थिएटर में परमेश्वर ने 40 किलो सोना रखा है, तो उसे पाने के लालच में वो वहां आते हैं.आगे जो होता है, वो देखने लायक है, लेकिन थिएटर में.
कैसी है फिल्म- ये एक अच्छी फिल्म है, ये एक अलग फिल्म, 4 किरदार कैसे पूरी फिल्म को साथ लेकर चलते हैं, ये कमाल है, अगर ये सोचकर जा रहे हैं कि ये तुम्बाड है, तो निराशा हाथ लगेगी. यह तुम्बाड नहीं है, लेकिन शहर के बीच रहती हुए एक ऐसी दुनिया है, जिसमें आपको दिलचस्पी होगी. लाजिक की कमी जरूर है. कई सवाल मन में चलेंगे, कुछ के जवाब मिलेंगे, कुछ के नहीं. परमेश्वर का पहेलियों कहने वाले सीन मजेदार हैं. परमेश्वर का सच चौंकाएगा. फिल्म की सिनेमैटोग्राफी टॉप की है. लेकिन ये एक अलग तरह की फिल्म जरूर है, सिनेमा से प्यार है तो आपको ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए.
एक्टिंग - जावेद जाफरी ने अपनी एक्टिंग की माया दिखाई है. उन्होंने साबित किया है कि उन्हें केवल एक बॉक्स में फिट नहीं किया जा सकता है. जावेद के रोल में कई लेयर्स थे, जिनमें वो चौंकाते हैं,ये उनके करियर का बेस्ट कहा जा सकता है, मोहम्मद समद का रोल आधा अधूरा सा है, लेकिन जितना है, उसमें वह ठीक लगे हैं. नेगेटिव रोल में वीणा जामकर साबित करती हैं कि उन्हें और हिंदी फिल्मों में मौका मिलना चाहिए, दीपक दामले स्क्रिप्ट के हिसाब से अभिनय कर लेते हैं, हालांकि बेहतर करने की उम्मीद थी.
डायरेक्शन और राइटिंग- राही अनिल बर्वे अपनी राइटिंग और इस तरह के डार्क वर्ल्ड को क्रिएट करने के लिए जाने जाते हैं. इसमें भी उन्होंने ऐसा ही किया है, कहानी, स्क्रीनप्ले, डायलॉग सब उनका है, तो राही क्लियर थे कि उन्हें अपनी फिल्म में क्या चाहिए, तभी फिल्म को बेवजह लंबा नहीं बनाया गया है, हर फ्रेम पर राही की मेहनत दिखती है.हालांकि क्रिएटिव होने के चक्कर में वह कई जगहों पर लाजिक लगाना भूल जाते हैं, फिर भी उऩकी कोशिश अच्छी है,बॉक्स आफिस पर जिस नए पन की तलाश है, वह उसकी इस फिल्म में मिलेगी.
आर्ट डायरेक्शन
इसका जिक्र अलग से करना जरूरी है क्योंकि फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं इसका आर्ट वर्क, फिल्म में परमेश्वर का थिएटर भी किरदार है, जिसे कहानी के हिसाब से आर्ट डिपार्टमेंट ने ऐसे सजाया है कि कई बार किरदारों से नजरें हटकर वहां रखे सामान पर चली जाती है, बैकग्राउंड स्कोर भी अच्छा है.
रेटिंग – 3.5 स्टार्स
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