लालो फिल्म 25 लाख में बनी थी,वो भी जैसे तैसे जुगाड़ किए गए थे, और फिल्म ने 100 करोड़ से ज्यादा का बिजनेस कर डाला, फिर इस गुजराती फिल्म को हिंदी में डब किया गया और अब ये हिंदी में रिलीज हुई है, जुहू, बांद्रा और बोरीवली के फिल्ममेकर्स को इस फिल्म की टीम को बुलाना चाहीए और उनसे सीखना चाहिए कि सिनेमा बनाया कैसे जाता है.
कहानी - एक ऑटो ड्राइवर एक सुनसान जगह पर एक घर में फंस जाता है, न खाना, न पानीज़ न निकलने का रास्ताज घर पर बीवी और बेटी परेशान, फिर वो सोचता है कि क्या भगवान होते हैं, ये फिल्म इसी सवाल का जवाब देती है और बड़े कायदे से देती है, आप भी तो ये सोचते होंगे न कि हम मुसीबत मैंने होते हैं तो भगवान आते क्यों नहीं, ये फिल्म आपके सारे सवालों के जवाब देगी.
कैसी है फिल्म - ये कमाल की फिल्म है, अगर सिनेमा कुछ सिखा सकता है, समझा सकता है, महसूस करा सकता है तो सिनेमा यही है, ये फिल्म 1 पल के लिए आपके कनेक्शन तोड़ती नहीं है. यहां कोई बड़ा स्टार नहीं है, कंटेंट ही स्टार है, ये फिल्म देखकर आपको लगेगा नहीं कि 25 लाख में ऐसी फिल्म बन सकती है. ये फिल्म बताती है कि विजन बड़ा होना चाहिए, सिनेमा की समझ और सिनेमा से प्यार होना चाहे, बाकी सब हो जाता है. ये फिल्म हर सिनेमा लवर और फिल्ममेकर को देखनी चाहिए और समझना चाहिए कि वो कहां गलती कर रहे हैं. ये फिल्म आपको इमोशनल भी करती है, हंसती भी है, रुलाती भी है और ये सब अपने आप होता है, फिल्म में ऐसा करने की जबरदस्ती कोशिश नहीं की जाती, इसी को तो सिनेमा कहते हैं.
एक्टिंग - रीवा रछ ने कमाल काम किया है, अपने पति से लड़ती भी हैं और उनके खो जाने पर परेशान भी होती है, ये बैलेंस उन्होंने कमाल तरीके से किया है, करण जोशी ने लालो के किरदार में जान डाल दी है, आपको लगेगा नहीं कि ये एक्टर नया है. फर्श पर गिरे पानी को जब वो पीते हैं तो लगता है कि इनकी एक्टिंग रेंज क्या ही जबरदस्त है. शुरुहाद गोस्वामी कमाल लगे हैं और इस किरदार को उन्होंने ऐसे निभाया हैं कि आप उनके चरण स्पर्श करना चाहेंगे.
राइटिंग और डायरेक्शन - कृशांश वजा,विक्की पूर्णिमा, अंकित सखिया ने फिल्म को लिखा है और इनकी राइटिंग फिल्म की जान है. इन्होंने बता दिया कि राइटर बाप होता है, अंकित सखिया के डायरेक्शन की जितनी तारीफ की जाए कम है.कुल मिलाकर ये फिल्म हर हाल में देखिए.
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