Chidiya Review: इसे सिनेमा की त्रासदी ही कहेंगे कि एक फिल्म जिसे विदेश में ना जाने कितने फिल्म फेस्टिवल्स में तारीफें मिल चुकी हैं उसे अपने देश में रिलीज होने के लिए 10 साल का इंतजार करना पड़ा. ये फिल्म साल 2015 में बनी थी लेकिन रिलीज अब हुई है.

ये फिल्म खास है, बेहद खास है, आपने इसके बारे में सुना नहीं होगा शायद, ये भी सिनेमा की त्रासदी है,और इसलिए ये रिव्यू भी लिखा जा रहा है ताकि सिनेमा को इस त्रासदी से बचाया जा सके. अच्छे सिनेमा को जिंदा रखा जा सके और ये ना सोचा जाए कि हिंदी सिनेमा में जिसे बॉलीवुड भी कहा जाता है, वहां अच्छी फिल्में बनती नहीं हैं.

इस फिल्म को मेहरान अमरोही ने दिल से बनाया है और दिल ज्यादा लगा लिया. इसलिए शायद रिलीज करने में 10 साल लग गए क्योंकि आजकल सिनेमा दिमाग से बनता है. तभी तो दिवालिया होता जा रहा है और मेहरान की फिल्म सिनेमा को दिवालियापन से बचाने का काम करती है.

कहानी- ये कहानी है मुंबई के चॉल में रहने वाले दो बच्चों शानू और बुआ की. उनके पिता इस दुनिया से जा चुके हैं. मां पर घर की जिम्मेदारी है. बच्चों के चाचा फिल्म सेट पर स्पॉट बॉय हैं. मां उनसे कहती है कि इन बच्चों की भी वहां लगवा दें. वहां ये बच्चे हीरो श्रेयस तलपड़े के पास चिड़िया यानी बैडमिंटन की शटल देखते हैं और ये भी चाहते हैं कि ये बैडमिंटन खेलें. फिर क्या होता है ये देखने थिएटर जाइए क्योंकि आपका थिएटर जाना जरूरी है. 

कैसी है फिल्म- ये फिल्म एक इमोशन है और इसे दिल से देखने वाली ही इस इमोशन को महसूस कर सकता है. इस फिल्म में दो बच्चों का एक छोटा सा सपना है लेकिन आजकल हम बड़े सपने देखते हैं. गया वो वक्त जब नया जमेट्री बॉक्स भी आता तो ऐसा लगता था जैसे पूरी दुनिया हासिल कर ली. ये फिल्म बताती है कि खुशी मिल सकती है. बस आपको ढूंढना होगा. हमेशा शिकायत करते रहने से, रोते रहने से कुछ नहीं होता. जब दो छोटे बच्चे ऐसा कर सकते हैं तो आप क्यों नहीं कर सकते. ऐसी फिल्म को देखा जाना, उन्हें सपोर्ट करना भी जरूरी है क्योंकि हम हमेशा यही रोना नहीं रो सकते कि अब तो अच्छी फिल्में बनती नहीं हैं. ये बताइए कितनी छोटी और अच्छी फिल्मों को आपने सपोर्ट किया है. अगर नहीं किया तो इस बार कर दीजिए.

एक्टिंग- स्वर कांबले(शानू) और आयुष पाठक(बुआ) ने कमाल का काम किया है. ये दोनों फिल्म के लीड एक्टर हैं. दोनों की एक्टिंग इतनी नेचुलर है कि आपको लगता नहीं ये एक्टिंग कर रहे हैं और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी मजबूती है. इनकी दोस्त के किरदार में हेतल गाना ने भी कमाल का काम किया है. 

शानू और बुआ की मां के रोल में अम्रूता सुभाष हैं. उन्हें देखकर मुझे हमेशा लगता है कि ये जिस कद की एक्ट्रेस हैं वो शायद फिल्म इंडस्ट्री समझ नहीं पाई. ये किरदार बताता है कि वो क्यों सिनेमा की बेहतरीन एक्ट्रेसेज में से एक हैं. विनय पाठक ने फिर से कमाल का काम किया है. वो हर किरदार में जैसे घुस जाते हैं, ये कई बार जादू सा लगता है, दर्जी ताज के किरदार में इनामुलहक दिल जीत लेते हैं.

राइटिंग और डायरेक्शन- मेहरान अमरोही ने ये कहानी लिखी है और उन्होंने ही फिल्म को डायरेक्ट किया है. इस फिल्म का सिंपल होना ही इसे खास बनाता है. और इसका क्रेडिट मेहरान को जाता है, जिन्होंने फिल्म को दिल से लिखा है, दिल से बनाया है और दिल ज्यादा लगा लिया. इसलिए शायद रिलीज करने में 10 साल लग गए क्योंकि आजकल सिनेमा दिमाग से बनता है. तभी तो दिवालिया होता जा रहा है और मेहरान की फिल्म सिनेमा को दिवालियापन से बचाने का काम करती है.

रेटिंग- 4 स्टार्स