Why Do Humans Have Eyebrows: कभी आपने ध्यान दिया है कि खराब मजाक सुनते ही भौंह अपने आप ऊपर उठ जाती है? ये इतना तेज और स्वाभाविक होता है कि हम सोच भी नहीं पाते कि ऐसा क्यों हुआ. आंखों के ऊपर मौजूद ये छोटी-सी बालों की लकीरें सिर्फ चेहरे की खूबसूरती नहीं बढ़ातीं, बल्कि इंसानी विकास की एक दिलचस्प कहानी भी छिपाए बैठी हैं. भौंहें हमारे चेहरे का अहम हिस्सा हैं, लेकिन हम तब ही इनकी अहमियत समझते हैं जब ये किसी वजह से गायब हो जाएं. अचानक चेहरा बदला-बदला और अजीब लगने लगता है. असल सवाल यही है कि आखिर भौंहें हमारे चेहरे पर होती ही क्यों हैं?.

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क्यों होती हैं भौंहें?

सबसे आसान जवाब है सुरक्षा. भौंहें पसीने, बारिश या धूल को आंखों में जाने से रोकती हैं. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. हमारे पुराने पूर्वजों के चेहरे पर भारी हड्डियों की उभरी हुई परत होती थी, जो आंखों की रक्षा करती थी. समय के साथ ये परत कम हो गई और उसकी जगह ऐसी भौंहें विकसित हुईं, जो हिल-डुल सकती थीं और भावनाएं दिखा सकती थीं. 

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क्या निकला स्टडी में?

नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन में छपी एक स्टडी बताती है कि जब चेहरे की ये भारी हड्डियां कम हुईं, तब इंसानों के पास अपनी भावनाएं जाहिर करने का नया तरीका आया. भौंहों की हल्की सी हरकत से हम खुशी, हैरानी या सवाल जैसी भावनाएं आसानी से समझ सकते हैं. दिलचस्प बात यह है कि भौंहें हमें लोगों को पहचानने में भी मदद करती हैं. साल 2003 में एक रिसर्च में पाया गया कि जब तस्वीरों से भौंहें हटा दी गईं, तो लोगों के लिए चेहरों को पहचानना ज्यादा मुश्किल हो गया, जबकि आंखें हटाने पर उतनी दिक्कत नहीं हुई, यानी चेहरे की पहचान में भौंहों की भूमिका काफी बड़ी है. 

इसके अलावा भौंहों का क्या काम?

इसके अलावा भौंहें हमारे चेहरे के भावों को और स्पष्ट बनाती हैं. अलग-अलग संस्कृतियों में लोग इन्हें संवारते हैं, कभी शेप देकर, कभी रंग बदलकर ताकि चेहरा ज्यादा आकर्षक लगे. कई बार भौंहों की बनावट से व्यक्तित्व के संकेत भी मिलते हैं. भौंहें बिना बोले भी संवाद का काम करती हैं. हल्का सा उठना मतलब पहचान या अभिवादन,और सिकुड़ना मतलब चिंता या सवाल. ये छोटे-छोटे इशारे हमें एक-दूसरे से जोड़ते हैं.  साल 2018 की एक स्टडी के मुताबिक, चेहरे के ऐसे भाव इंसानों को बड़े और मजबूत समूह बनाने में मदद करते थे, जो हमारे विकास में अहम साबित हुआ.

दरअसल, जहां हमारे पुराने रिश्तेदारों के चेहरे सख्त और डरावने लगते थे, वहीं इंसानों की चलती-फिरती भौंहों ने उन्हें ज्यादा भावुक और समझदार बनाया. यही छोटी-सी चीज हमें ज्यादा जुड़ा हुआ और इंसान बनाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.