Namaz: नमाज, या 'सलाह', इस्लाम धर्म में अल्लाह की इबादत का एक तरीका है जो दिन में पांच बार की जाती है. यह इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है, और इसका उद्देश्य अल्लाह से संपर्क स्थापित करना, मार्गदर्शन लेना और माफी मांगना है.
नमाज में कुरान की आयतों का पाठ, शारीरिक गतिविधियां जैसे खड़ा होना, झुकना और सजदा करना शामिल है. लेकिन ऐसे में अब सवाल उठता है कि मुस्लिम महिलाएं मासिक धर्म के दौरान नमाज क्यों नहीं पढ़ती हैं.
मासिक धर्म के दौरान नमाज क्यों नहीं पढ़ सकतीं?
मुस्लिम महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान नमाज पढ़ने की अनुमति नहीं है क्योंकि इसे धार्मिक रूप से एक "अशुद्ध" अवस्था माना जाता है. इस्लामी नियमों के अनुसार, यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें नमाज जैसी कुछ धार्मिक गतिविधियां वर्जित हैं.
मुस्लिम महिलाओं को नमाज पढ़ने की मनाही है, लेकिन फिर भी अगर कोई नमाज अदा करती है, तो उनकी नमाज स्वीकार नहीं होगी.
धार्मिक अशुद्धता
मासिक धर्म को "बड़ी धार्मिक अशुद्धता" की स्थिति माना जाता है जिसके कारण नमाज और रोजा रखने से मनाही है, क्योंकि इस दौरान महिलाएं पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं होतीं. हदीस में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान नमाज नहीं पढ़नी चाहिए.
शरीर और आध्यात्मिकता की स्थिति:
यह छूट महिलाओं को शारीरिक पीड़ा और थकान से राहत भी देती है, जो मासिक धर्म के दौरान होती है. इसलिए, इस्लाम में इसे एक दायित्व से मुक्ति के बजाय एक विशेषाधिकार के रूप में देखा जाता है.
अन्य वर्जित कार्य
मासिक धर्म के दौरान, महिलाओं को रोजा रखने और तवाफ (काबा के चारों ओर चक्कर लगाना) जैसे अन्य धार्मिक अनुष्ठानों से भी छूट दी जाती है.
नमाज की भरपाई:
मासिक धर्म के दौरान छूटी हुई नमाजों की भरपाई करना जरूरी नहीं है क्योंकि इस अवधि में महिलाएं नमाज नहीं पढ़ सकती हैं. इस्लाम में, मासिक धर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसके दौरान नमाज पढ़ना अनिवार्य नहीं होता जिसकी वजह से नमाजें छूट जाती हैं,
ऐसे में मासिक धर्म समाप्त होने के बाद, महिला को नमाजें दोबारा पढ़ने की भरपाई करने की कोई जरूरत नहीं होती है.
दुआएं
नमाज की छूट के बावजूद, महिलाएं दुआ कर सकती हैं या अल्लाह से बातचीत कर सकती हैं. कुरान की तिलावत के बजाय, आप कंप्यूटर स्क्रीन से कुरान पढ़ सकती हैं, या दुआ और जिक्र की नीयत से कुरान की आयतें भी पढ़ सकती हैं.
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