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Nag Panchami 2026: महादेव के गले में नाग, विष्णु की शय्या शेषनाग और गणेश के पेट पर सर्प, तीनों प्रतीकों का अर्थ क्या है?

Nag Panchami 2026: हिंदू धर्म में नाग पूजनीय माने गए हैं. शिव जी ही नहीं विष्णु जी, कान्हा जी और गणेश जी से भी नाग का गहरा संबंध है. क्या है इनके नागों का महत्व और प्रतीक.

Nag Panchami 2026: हिंदू धर्म में नागों को केवल विषैले जीव के रूप में नहीं देखा गया. पुराणों में शेष, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक आदि नागों का उल्लेख मिलता है और उन्हें विशेष दिव्य शक्तियों से जोड़ा गया है. भगवान शिव के गले में नाग, भगवान विष्णु की शय्या के रूप में शेषनाग और भगवान गणेश के उदर पर बंधा सर्प अक्सर दिखाई देता है.  पुराणों में इनके महत्व अलग -अलग हैं. 

महादेव के गले में वासुकि नाग

भगवान शिव के गले में धारण किए गए नाग को परंपरा में नागराज वासुकि माना जाता है. वासुकि का संबंध समुद्र मंथन की प्रसिद्ध कथा से भी है. देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकि को रस्सी बनाया था. वासुकि का शिव से संबंध केवल समुद्र मंथन तक सीमित नहीं है. पुराणिक परंपरा में उन्हें शिव के प्रमुख नाग आभूषण के रूप में देखा जाता है.

प्रतीक -  शिव के गले में विषधर नाग का होना ये संदेश देता है कि महादेव ने भय, विष और विनाशकारी शक्तियों को अपने नियंत्रण में रखा है.यह दर्शाता है कि शक्ति का उपयोग नियंत्रण और संयम के साथ होना चाहिए.

विष्णु की शय्या हैं शेषनाग

भगवान विष्णु के साथ दिखाई देने वाले शेषनाग को अनंत भी कहा जाता है. यहां नाग केवल आभूषण नहीं, बल्कि भगवान की शय्या और आधार हैं. श्रीमद्भागवत महापुराण के तृतीय स्कंध 8वें अध्याय में भगवान के शेषनाग की शय्या पर शयन का सुंदर वर्णन मिलता है

मृणालगौरायतशेषभोग, पर्यङ्क एकं पुरुषं शयानम्।

फणातपत्रायुतमूर्धरत्न, द्युभिर्हतध्वान्तयुगान्ततोये॥

इसमें शेषनाग के विशाल, उज्ज्वल शरीर को भगवान की शय्या और उनके फणों को छत्र के समान बताया गया है. फणों में जड़े रत्नों का प्रकाश अंधकार को दूर करता है. 

प्रतीक - शेष का अर्थ ही है, जो अंत में भी बचा रहे, जबकि अनंत का अर्थ है जिसका कोई अंत नहीं. इसलिए विष्णु की शय्या के रूप में शेषनाग को अनंतता, स्थिरता और आधार का प्रतीक माना जाता है. वैष्णव परंपरा में शेष का संबंध भगवान की सेवा से भी है. यही कारण है कि शेषनाग को केवल सर्प नहीं बल्कि भगवान के दिव्य सेवक और आधार के रूप में देखा जाता है.

गणेशजी के पेट पर सर्प क्यों बंधा है?

गणेशजी के उदर पर बंधे सर्प की कथा गणेश पुराण में मिलती है. इसमें बताया गया है कि गणेशजी ने अनलासुर नामक अग्निस्वरूप दैत्य को निगल लिया था. इसके बाद उनके शरीर में भयंकर अग्नि उत्पन्न हो गई. देवताओं ने अनेक उपाय किए, लेकिन अग्नि शांत नहीं हुई तब भगवान शिव ने गणेशजी को एक सहस्रफण वाला नाग दिया. गणेशजी ने उस नाग को अपने उदर पर बांध लिया.

गणेश पुराण में स्पष्ट श्लोक है

अशान्तेऽग्नौ तु वरुणः सिषेच शीतलैर्जलैः.

सहस्रफणिनं नागं गिरिशोऽस्मै ददावथ॥

तेन बद्धोदरो यस्माद् व्यालबद्धोदरोऽभवत्.

अर्थात- गणेश पुराण के इस श्लोक के अनुसार जब अनलासुर नामक उग्र अग्निस्वरूप दैत्य को निगलने के बाद जब गणेश जी के पेट की अग्नि शीतल जल से भी शांत नहीं हुई, तब भगवान शिव ने गणेशजी को हजार फनों वाला नाग प्रदान किया. नाग से उदर (पेट) बांधे जाने के कारण गणेशजी का यह रूप व्यालबद्धोदर कहलाया. इसके बाद दूर्वा अर्पित करने से उनकी अग्नि शांत हुई.

प्रतीक - गणेशजी के उदर पर नाग, शक्ति को बांधने, नियंत्रित करने और संतुलित रखने का संदेश देता है.

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Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

जागृति सोनी बरसले (Jagriti Soni Barsaley)

धर्म, ज्योतिष और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं पर शोध आधारित लेखन करने वाली डिजिटल पत्रकार

जागृति सोनी बर्सले धर्म, ज्योतिष, वास्तु और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़े विषयों की अनुभवी डिजिटल पत्रकार और लेखिका हैं. उन्हें डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 10 वर्षों का अनुभव है. वर्तमान में वह ABP Live (Abplive.com) में बतौर कंसल्टेंट कार्यरत हैं, जहां वह व्रत-त्योहार जैसे नवरात्रि, करवा चौथ, दिवाली, होली, एकादशी, प्रदोष व्रत, हरियाली तीज आदि, रमजान, धार्मिक मान्यताओं, ज्योतिषीय घटनाओं, शुभ मुहूर्त, वास्तु और फेंगशुई, पंचांग जैसे विषयों पर शोध आधारित और प्रमाणिक लेख लिखती हैं.

विशेषज्ञता (Expertise)

जागृति सोनी बर्सले विशेष रूप से इन विषयों पर लेखन करती हैं:

  • व्रत-त्योहार और भारतीय धार्मिक परंपराएं
  • वैदिक ज्योतिष और ग्रह-नक्षत्र आधारित घटनाएं
  • शुभ मुहूर्त और धार्मिक विधि-विधान
  • वास्तु शास्त्र और फेंगशुई
  • आध्यात्मिक मान्यताएं और सांस्कृतिक परंपराएं

उनके लेखों में धार्मिक विषयों को केवल आस्था के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि शास्त्रीय स्रोतों और प्रमाणिक ग्रंथों के आधार पर प्रस्तुत किया जाता है.

शिक्षा और पृष्ठभूमि

जागृति सोनी बर्सले ने पत्रकारिता की पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से की है.

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत दैनिक भास्कर डॉट कॉम से की, जहां डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करते हुए उन्होंने धर्म, समाज और संस्कृति से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर लेख लिखे.

डिजिटल मीडिया में काम करते हुए उन्होंने टेक्स्ट और वीडियो दोनों फॉर्मेट में काम किया है और वीडियो सेक्शन में सीनियर प्रोड्यूसर के रूप में भी लंबे समय तक योगदान दिया है. इस अनुभव ने उन्हें आधुनिक डिजिटल पत्रकारिता के विभिन्न फॉर्मेट को समझने और प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करने की क्षमता दी है.

शास्त्रीय अध्ययन और शोध

जागृति सोनी बर्सले की विशेष रुचि धर्म और ज्योतिष के शास्त्रीय अध्ययन में है.

उन्हें प्राचीन धार्मिक ग्रंथों जैसे:

  • धर्म सिंधु
  • मुहूर्त चिंतामणि
  • शकुन शास्त्र
  • वास्तु

का अच्छा ज्ञान है. इन ग्रंथों के आधार पर वह व्रत-त्योहार, पूजा-विधि, ज्योतिषीय घटनाओं और मुहूर्त से जुड़े विषयों को सरल, प्रमाणिक और शोधपरक तरीके से पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास करती हैं.

योगदान

जागृति सोनी बर्सले एक फ्रीलांस लेखक के रूप में भी कई मंचों पर आध्यात्म, भारतीय संस्कृति और ज्योतिष से जुड़े विषयों पर लेख लिख चुकी हैं.

उनका उद्देश्य धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों को सरल भाषा में विश्वसनीय जानकारी के साथ प्रस्तुत करना है, ताकि पाठक इन विषयों को समझ सकें और सही जानकारी प्राप्त कर सकें.

व्यक्तिगत रुचियां

अध्यात्म और भारतीय परंपराओं के अध्ययन के प्रति उनकी गहरी रुचि है. खाली समय में उन्हें आध्यात्मिक और ज्ञानवर्धक पुस्तकें पढ़ना पसंद है. यह अध्ययन उनके लेखन को और अधिक गहन, तथ्यपूर्ण और संदर्भ आधारित बनाता है.

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