Mothers Day 2026 Sanskrit Shlok: मदर्स डे पर पढ़ें ये संस्कृत श्लोक, मातृत्व का गहरा अर्थ बताते हैं वेद-शास्त्र
Mothers Day 2026 Sanskrit Shlok: मदर्स डे रविवार 10 मई को है. मातृ दिवस का दिन मां के प्रति सम्मान जताने व जीवन में उनके महत्व को समझने का दिन है. वेज-पुराणों में भी मातृत्व का गहरा अर्थ बताया गया है.

Mothers Day 2026 Sanskrit Shlok: हर साल मई महीने के दूसरे रविवार को मदर्स डे या मातृ दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस वर्ष आज 10 मई को मदर्स डे मनाया जाता है. मदर्स डे का दिन हमें यह एहसास दिलाता है कि, हम हमारे जीवन में कितना महत्व रखती हैं. इसलिए मातृ दिवस के दिन को मां के साथ प्यार और सम्मान के साथ मनाया जाता है.
मां को हम अम्मा, माई, महतारी, माता, मम्मी, मम्मा, मॉम, बाईसा, माई जैसे कई भाषाओं में जानते हैं. लेकिन मां के लिए भावनाएं वही रहती है, बस भाषा बदल जाते हैं. मां केवल एक शब्द नहीं, बल्कि जीवन का पहला अनुभव, पहला प्रेम और पहला गुरु होती है.
भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म (Sanatan Dharma) में मां को देवताओं से भी ऊंचा स्थान दिया गया है. वेद (Vedas), उपनिषद, रामायण, महाभारत और अन्य धर्मग्रंथों में मातृत्व की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है. मदर्ड डे पर देखें शास्त्र और वेद-पुराणों में मां को समर्पित संस्कृत श्लोक और अर्थ. शास्त्रों के ये श्लोक हमें मातृत्व का महत्व समझाते हैं और यह बताते हैं कि, जीवन में मां का स्थान की सर्वोपरि होता है.
मातृ दिवस 2026 संस्कृत श्लोक और उसके अर्थ (Mother's Day 2026 Sanskrit Shlokas for mother)
'नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।'
अर्थात- मां के समान कोई छाया नहीं, मां के समान कोई सहारा नहीं. मां के समान कोई रक्षक नहीं है और मां के समान कोई प्रिय चीज नहीं.
'मातृ देवो भवः।'
अर्थात- मां देवताओं से भी बढ़कर होती हैं.
अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥
अर्थात- रामजी लक्ष्मण से कहते हैं, भले ही यह लंका सोने से निर्मित हो. लेकिन फिर भी इसमें मेरी कोई रुचि नहीं. क्योंकि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है.
'अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामः
मातृमान् पितृमानाचार्यवान पुरूषो वेदः।'
अर्थात- जब तीन उत्तम शिक्षक यानी एक मां, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य हो तो तभी मनुष्य ज्ञानवान होगा.
'प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी माता विद्यते यस्य स मातृमान।'
अर्थात- धन्य है वह मां जो गर्भावान से लेकर, जब तक पूरी विद्या न हो, तब तक सुशीलता का उपदेश करें.
'रजतिम ओ गुरु तिय मित्रतियाहू जान।
निज माता और सासु ये, पाँचों मातृ समान।।'
अर्थात- जिस तरह संसार में 5 प्रकार के पिता होते हैं, उसी प्रकार 5 प्रकार की स्त्री भी मां समान होती हैं. ये हैं- राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, अपनी स्त्री की माता और अपनी मूल जननी माता.
आपदामापन्तीनां हितोऽप्यायाति हेतुताम् ।
मातृजङ्घा हि वत्सस्य स्तम्भीभवति बन्धने ॥
अर्थात- जब आपदा आने को होती हैं, तब हितकारी भी उनमें कारण बन जाता है. बछड़े को बांधने मे मां की जांघ ही खम्भे का काम करती है.
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