Makar Sankranti 2026: तिल गुड़ से बने मिष्ठान, आसमान में उड़ती रंग बिरंगी पतंगे मकर संक्रांति की बानगी देती है. इनके बिना मकर संक्रांति का त्योहार अधूरा माना जाता है. दिल्ली, गुजरात में इसकी रौनक खास रहती है हालांकि भारत के अधिकांश शहरों में मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाई जाती है.
मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा राम काल से निभाई जाती है, मुगलों से भी इसका संबंध रहा है.
मकर संक्रांति पर पतंग और श्रीराम का नाता
मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की धार्मिक मान्यताएं हैं. तमिल रामायण के मुताबिक, मकर संक्रांति के दिन सबसे पहली बार पतंग भगवान श्रीराम ने उड़ाई थी. ऐसा कहा जाता है कि उनकी पतंग इतनी ऊंची उड़ रही थी कि वह इंद्रलोक तक पहुंच गई थी. तभी से मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने की परंपरा शुरू हो गई.
रामचरितमानस में बालकांड में उल्लेख
‘राम इक दिन चंग उड़ाई।इंद्रलोक में पहुँची जाई॥
‘रामचरितमानस’ में तुलसीदास ने ऐसे प्रसंगों का उल्लेख किया है, जब श्रीराम ने अपने भाइयों के साथ पतंग उड़ाई थी. इस संदर्भ में ‘बालकांड’ में उल्लेख मिलता है-
पतंग उड़ाने का वैज्ञानिक आधार
मकर संक्रांति से ठंड कम होने लगती है. पतंगबाजी के जरिए सर्दी में सूर्य की किरणों का स्वागत करते हुए शारीरिक स्वास्थ्य को भी बेहतर किया जाता है, क्योंकि धूप से विटामिन डी मिलता है. सर्दियों की सुबह पतंग उड़ाने की शरीर को ऊर्जा मिलती है और त्वचा संबंधी विकार दूर होते हैं
पतंगबाजी का इतिहास
पतंगबाजी का इतिहास करीब 2 हजार साल पुराना है. चीन में इसकी शुरुआत हुई और उस समय पतंग को संदेश भेजने के लिए उपयोग में लाया जाता था. भारत में पतंग चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेन त्सांग लेकर आए थे. पहले युद्ध के मैदान में एक-दूसरे को संदेश देने की प्रथा में पतंग का इस्तमाल होता था.दिल्ली में मुगल पतंगबाजी की प्रतियोगिता कराते थे. फिर भारत में धीरे-धीरे नए खेल के रूप में पतंगबाजी लोगों के घरों में पहचान बनाने लग गई.
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