Ganga Dussehra Katha: गंगा दशहरा 25 मई 2026 को है. ये वो दिन है जब गंगा जी राजा भागीरथ के पूर्वजों की शापित आत्माओं को शुद्ध करने हेतु पृथ्वी पर अवतरित हुयी थीं. सगर पुत्रों की आत्मा को मोक्ष मिला था. यही वजह है कि गंगा दशहरा पर स्नान-दान करने का विशेष महत्व है. साथ ही गंगा पूजन के बाद इस कथा का पाठ करें. इसके बिना पूजा अधूरी है.

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गंगा दशहरा कथा

पौराणिक कथा के अनुसार श्रीराम के पूर्वज चक्रवर्ती महाराज सगर की दो रानियां थीं केशिनी और सुमति. केशिनी से असमंजस नामक पुत्र हुआ, जबकि सुमति के 60,000 पुत्र थे. असमञ्जस के पुत्र अंशुमान थे, जो धर्मपरायण, विनम्र और देवताओं तथा गुरुओं का सम्मान करने वाले थे. महाराज सगर के अधिकांश पुत्र अहंकारी और अत्याचारी स्वभाव के थे. उनके व्यवहार से स्वयं देवता भी दुखी रहते थे.

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असमंजस के दुष्ट आचरण से व्यथित होकर राजा सगर ने उन्हें राज्य से निष्कासित कर दिया. एक समय महाराज सगर ने भव्य अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया. यज्ञ का घोड़ा पृथ्वी पर विचरण कर रहा था, तभी देवराज इन्द्र उसे चुराकर पाताल लोक में ले गए और कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया. उस समय कपिल मुनि गहन तपस्या में लीन थे और उन्हें इस घटना का कोई ज्ञान नहीं था.

ऋषि ने सगर के 60 हजार पुत्रों को किया भस्म

यज्ञ का घोड़ा खोजते-खोजते सगर के साठ हजार पुत्र पूरी पृथ्वी पर भटकते रहे. जब उन्हें घोड़ा नहीं मिला, तो उन्होंने पृथ्वी से पाताल तक मार्ग खोद डाला. आखिरकार वो कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे. वहां घोड़ा बंधा देखकर उन्होंने बिना विचार किए मुनि को ही चोर समझ लिया और क्रोध में उनके ऊपर आक्रमण करने दौड़ पड़े. तपस्या में विघ्न पड़ने पर कपिल मुनि ने जैसे ही नेत्र खोले, उनके तेज से सगर के सभी साठ हजार पुत्र तत्काल भस्म हो गए.

शिव जी जटाओं से निकलीं गंगा जी

पुत्रों की मुक्ति के लिए राजा सगर के वंशज भगीरथ ने कठोर तपस्या की. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्मा ने गंगा को धरती पर भेजने का वचन दिया लेकिन ब्रह्माजी ने कहा कि गंगा का वेग अत्यंत प्रचंड है और उसे धारण करने की शक्ति केवल भगवान शिव में है. ऐसे में भोलेनाथ से इस समस्या के समाधान की विनती की, इसके बाद भोलेनाथ ने अपनी जटाओं में गंगा जी को धारण कर लिया और फिर अपनी एक जटा से उन्हें पृथ्वी की ओर प्रवाहित किया. इस प्रकार मां गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ. आगे-आगे भगीरथ का रथ चल रहा था और पीछे-पीछे पवित्र गंगा प्रवाहित हो रही थीं.

ऐसे मिली सगर के पुत्रों को मुक्ति

यात्रा के दौरान गंगा का प्रवाह ऋषि जह्नु के आश्रम से होकर गुजरा. वेग इतना तीव्र था कि आश्रम की वस्तुएं बहने लगीं. क्रोधित होकर ऋषि जह्नु ने गंगा नदी को पी लिया. जब भगीरथ ने पीछे मुड़कर देखा और गंगा को नहीं पाया, तब वे ऋषि के आश्रम पहुँचे और विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की. उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर ऋषि जह्नु ने गंगा को अपने दाहिने कान से पुनः प्रकट किया. तभी से गंगा “जाह्नवी” नाम से भी प्रसिद्ध हुईं.

आखिरकार मां भागीरथी गंगा कपिल मुनि के आश्रम पहुंचीं, जहां सगर के साठ हजार पुत्रों की भस्म पड़ी थी. गंगाजल का स्पर्श मिलते ही वे सभी दिव्य स्वरूप धारण कर स्वर्गलोक को प्रस्थान कर गए. इसी कारण गंगा को मोक्षदायिनी और पवित्रता की प्रतीक माना जाता है. गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान करने की परंपरा तभी से चली आ रही है.